शनिवार, 27 जून 2020

अनलॉक्ड दौर में अपना भारत








देशबन्धु में संपादकीय आज.

#विद्यार्थी #बन #प्रकृति #से #सीखें

लगभग 3 महीने बाद देश अनलॉक मोड में आ गया है और अब कई शहरों में होटल, मॉल्स, रेस्तरां, धार्मिक स्थल खुल रहे हैं। हालांकि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में धार्मिक स्थलों को खोलने पर अब भी विचार-विमर्श चल रहा है। उत्तराखंड में चार धाम तीर्थ पुरोहित हक - हकूकधारी महापंचायत ने प्रदेश सरकार से कहा है कि किसी भी सूरत में 30 जून से पहले चार धाम यात्रा शुरू न करें। उन्हें डर है कि अगर कोरोना संक्रमण धामों में भी पहुंच जाएगा तो रोज़ी-रोटी के साथ ही यात्रा से जुड़े लोगों का जीवन भी संकट में पड़ जाएगा।

हिमाचल प्रदेश में भी कुछ इसी तरह का मंथन किया जा रहा है कि होटल, धार्मिक स्थल कब से खोले जाएं और किन सावधानियों, किन शर्तों के साथ खोले जाएं। इससे पहले हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मई के अंतिम दिनों में सुझाव दिया था कि हिमाचल कोरोना वायरस के इस दौर में क्वारंटीन सेंटर यानी पृथक वास का केंद्र हो सकता है। उनके इस प्रस्ताव का विपक्षी दल कांग्रेस ने तो विरोध किया ही, होटल व्यवसायी भी इसे सही नहीं मान रहे हैं। उनका ये मानना है कि हिमाचल को क्वारंटीन डेस्टिनेशन के तौर पर प्रचारित करने से बेहतर है कि बाद में पर्यटन के अलग-अलग रूपों को बढ़ावा देने पर विचार किया जाए। राज्य की क्षमता के अनुरूप प्राकृतिक पर्यटन, रोमांचकारी पर्यटन, धार्मिक पर्यटन, स्वास्थ्य पर्यटन आदि को विकसित किया जाए।

व्यवसाय की दृष्टि से यह सही लगता है। क्योंकि बीते दो-तीन दशकों में जिस तेजी के साथ पर्यटन उद्योग बढ़ा, उसमें इसके अलग-अलग रूपों को भी बढ़ाया गया ताकि सैलानी अपनी पसंद के मुताबिक घूमने-फिरने और अपने शौक पूरे करने आ सकें। लेकिन जयराम ठाकुर ने जो सुझाव दिया, वह पर्यटन की पुरानी शैली का ही विस्तारित रूप नजर आता है। जब पर्यटन, उद्योग के तौर पर विकसित नहीं हुआ था, तब भी लोग पहाड़ों पर आबोहवा बदलने जाया करते थे। पुरानी फ़िल्मों और उपन्यासों में कई जगह इसका चित्रण है कि डाॅक्टरों की सलाह पर नायक या नायिका पहाड़ों पर स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए जाते हैं।

अंग्रेज़ों ने भी अपने शासनकाल में उत्तर भारत के कई छोटे कस्बों और शहरों को हिल स्टेशन्स के रूप में विकसित किया था। आजादी के बाद भी बहुत से लोग सपरिवार इन इलाकों में जाकर 15 दिन, या महीने भर तक रुकते और प्रकृति के सान्निध्य में स्वास्थ्य लाभ लेते, वहां की संस्कृति, जैव विविधता का अध्ययन करते। इससे स्थानीय लोगों को भी आमदनी का जरिया मिलता और प्रकृति को संरक्षण भी मिलता।

लेकिन जैसे-जैसे पर्यटन ने बारहों महीने चलने वाले व्यवसाय का रूप धरा, इन पर्वतीय इलाकों की सूरत बदलने लगी। अब शिमला, मनाली, मसूरी, धर्मशाला आदि शहरों में मॉल रोड हों या बाज़ार या नदी के किनारे, हर जगह भीड़ ही भीड़ नज़र आने लगी। रोहतांग दर्रे की ऊंचाई पर जीप के सहारे जाना आसान हो गया और भूख लगने पर दो मिनट में मिलने वाली मैगी सैलानियों के लिए पेश होने लगी। लोग चीड़ों पर चांदनी देखें न देखें, घाटी के नज़ारों को देखें न देखें, हर जगह की उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर ज़रूर नज़र आ जाती हैं।

पैराग्लाइडिंग, राफ्टिंग आदि में तमाम सुरक्षा उपकरणों से लैस होकर जोखिम उठाने का मज़ा भी पर्यटक लेते रहे। इन सबसे स्थानीय लोगों की आमदनी का जरिया भी बढ़ा, साथ ही बड़े होटल व्यवसायियों को भी कारोबार विस्तार का मौका मिला। जिन इलाकों में अपने पेड़ों, फूलों, खास वनस्पतियों और पशु-पक्षियों के साथ प्रकृति विरल आबादी के बीच सुरक्षित महसूस करती थी, उसे सर्वसुविधायुक्त पांच-सात सितारा होटलों से ख़तरा महसूस होने लगा। ऊंची कीमत देकर इनकी सुविधाओं का लाभ लेने और प्रकृति की सुंदरता का पान करने वाले साधिकार इन हिल स्टेशनों की निजता का अतिक्रमण करते रहे और पर्यावरणविद चिंता ही करते रहे कि हिमालय की जैव विविधता को खतरा हो रहा है, कि गंगा मैली हो रही है, कि पहाड़ दरक रहे हैं, कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है।

कोरोना के कारण जब तीन महीने आवाजाही काफी हद तक रुक गई थी, तो ऐसी कई तस्वीरें आईं, जिनमें पंजाब या उत्तराखंड के शहरी इलाकों से हिमालय की चोटियां दिखने लगीं। वन्य जीव-जंतु सड़कों पर बेधड़क निकलने लगे थे। गंगा, यमुना जैसी नदियां खूब साफ हो गईं और दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर में आसमान साफ हो गया। अब जैसे ही कारखाने शुरु होंगे, व्यापार के गति पकड़ने के साथ जीवन अपने ढर्रे पर आ जाएगा, प्रदूषण भी लौट ही आएगा। इसके बाद फिर सैर-सपाटे के लिए लोग हिल स्टेशनों का रुख़ करेंगे। लेकिन अब उन्हें थोड़ा रुककर सोचना चाहिए कि उनकी मौज-मस्ती प्रकृति पर भारी न पड़े। उपभोक्ता की जगह अगर विद्यार्थी बनकर प्रकृति के करीब जाएं तो जीवन के कई सबक सीखने मिलेंगे। कोरोना काल की फिजिकल डिस्टेंसिंग की सीख प्रकृति के साथ भी आजमाएं, इंसान और धरती दोनों का भला होगा।

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