शनिवार, 27 जून 2020

कोरोना महाकाल की कथाएं /ऋषभ देव शर्मा






  ऋषभ देव शर्मा:

खुल जा सिमसिम

सिमसिम धीरे धीरे खुल रही है! लॉकडाउन अनंत काल तक नहीं चल सकता न। ताले जड़ने ज़रूरी भी थे, ताकि कोरोना विषाणु की चहुँदिश अदृश्य उपस्थिति के बावजूद कैसे जीना है, यह सीखा जा सके। जिसने सीख लिया होगा, वह आगे भी बचा रह सकता है। जिसने न सीखने की कसम खाई हो, उसका कुछ नहीं किया जा सकता। पर ऐसे लोग अपने साथ साथ अपने इर्द गिर्द वालों की जान भी जोखिम में डाल रहे हैं। इसीलिए 'मन की बात' में माननीय प्रधानमंत्री ने एक बार फिर वही पुराना पाठ दोहराया- मुचका (मास्क) पहनें, हाथ धोते रहें और सामाजिक दूरी बनाए रखें! यही कोरोना-उत्तर काल का सामान्य शिष्टाचार है। गुफ़ाद्वार खोलने की यही कुंजी है। लोग 'अलीबाबा, चालीस चोर' के कासिम जैसी कोई नादानी न करें, इसीलिए उन्होंने याद दिलाना ज़रूरी समझा कि, "बहुत कुछ खुल चुका है। श्रमिक स्पेशल ट्रेन चल रही हैं, अन्य स्पेशल ट्रेनें भी शुरू हो गई हैं. तमाम सावधानियों के साथ, हवाई जहाज उड़ने लगे हैं, धीरे-धीरे उद्योग भी चलना शुरू हुआ है, यानी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अब चल पड़ा है, खुल गया है। ऐसे में हमें और ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है।"

वैसे क्या यह सार्वजनिक खेद का विषय नहीं कि इतनी समझाइश के बाद भी सड़कों से लेकर बाजारों तक लोग इस तरह लापरवाह नज़र आ रहे हैं, मानो उन्हें कोरोना की कोई खबर ही नहीं। ऐसे में हर जागरूक नागरिक को कोरोना प्रतिरोध का राजदूत बनना पड़ेगा। खुद समझें और दूसरों को समझाएँ। लेकिन ऐसा अति उत्साह भी न दिखाएँ कि आपकी समझाइश सामने वाले को अपमानित करने लगे।

यह समझना ज़रूरी है कि कोरोना को रोकने में सक्षम किसी वैक्सीन के आने तक असुरक्षा की विकरालता बढ़ती ही रहेगी। इसलिए इन सावधानियों को जीवन शैली का हिस्सा बनाए रखना होगा। ताले खोलने का पहला चरण तालाबंदी का पाँचवाँ चरण भी है। इसलिए यह ध्यान में रखना होगा कि अपनी नादानी से हम निरुद्ध क्षेत्रों की संख्या फिर से न बढ़ा बैठें। जिन तेरह शहरों और तीस नगरपालिकाओं की निशानदेही हुई है, कोरोना को अगर वहाँ से बाहर नहीं फैलने दिया गया, तो हालात कुछ हद तक काबू माने जा सकते हैं। वैसे हालात काबू में होने का एक सरकारी पैमाना यह मान लिया गया है कि भारत में कोरोना से मरने वालों का प्रतिशत दुनिया के अन्य देशों की तुलना में कम है। यह अलग बात है कि आम लोग आँकड़ों पर खास यकीन नहीं करते! खैर, अब जब कार्यालयों से लेकर व्यावसायिक प्रतिष्ठान तक खुलने शुरू हो गए हैं, यात्राओं ही नहीं मनोरंजन तक पर से बंदिशें हट रही हैं, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अर्थव्यवस्था का फँसा हुआ पहिया भी फिर से कुछ चाल पकड़ेगा।

यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं लॉकडाउन हटाने से देश में कोरोना विस्फोट की स्थिति तो पैदा नहीं हो जाएगी। इसका समाधान करने के लिए सयाने दुनिया के ऐसे कई देशों के नाम गिना रहे हैं, जिन्होंने बिना तालाबंदी के ही कोरोना के फैलाव को रोकने में सफलता पाई है। पर वे भूल जाते हैं कि उन देशों का आकार और जनसंख्या घनत्व भारत की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरता है। इसलिए भारत सरकार के लॉकडाउन के फैसले की आलोचना में वक़्त बरबाद करने के बजाय जनसेवकों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को लोगों को नई जीवन शैली के लिए प्रशिक्षित करने पर ध्यान देना चाहिए।

अंततः यह भी कि भेड़ियाधसान की प्रवृति में अतुलनीय इस महान लोकतंत्र के नागरिकों को लॉकडाउन में छूट मिलते ही अनुशासनहीन बनने से रोकना भी शासन-प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा। अब समय है कि जनता और सरकार बेहतर तालमेल का उदाहरण पेश करें!


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 ऋषभ देव शर्मा:

भाँतियाँ कोरोना से भी घातक!

लॉकडाउन के पाँचवें चरण के समांतर अनलॉक-1 भी आ गया, लेकिन कोरोना अभी तक अनसुलझी पहेली ही बना हुआ है। अनसुलझी चीजें रहस्यपूर्ण तो दिखती ही हैं। उनके साथ अनेक भ्रम भी जुड़ जाते हैं। कोरोना के साथ भी अनेक भ्रांतियाँ जुड़ कर और अधिक भय उपजा रही हैं। कोई कारगर वैक्सीन या दवा आने तक ऐसा ही चलता रहेगा। क्योंकि कोरोना से बचना है, तो यह मान कर चलना ही होगा कि कोविड-19 विषाणु हर स्थान पर है। हर मिलने वाले को कोरोना का एजेंट समझिए और बचिए! इससे भी इनकार नहीं कि निरंतर इस असुरक्षा भाव को ढोने से कोई अवसाद ग्रस्त हो सकता है, तो किसी की आक्रामकता बढ़ सकती है। झुंझलाहट लापरवाह बनने की 'प्रेरणा' भी दे सकती है। इसलिए कोरोना को समझें; भ्रांतियों से बचें। लॉकडाउन खुलने पर सामाजिकता का निर्वाह भले ही करें; लेकिन 'सामाजिक दूरी के नियम' का दृढ़ता से पालन करें।

इतिहास के हवाले से सयाने बता रहे हैं  कि महामारियों के समय में लोगों को सही जानकारी न मिल पाना हमेशा घातक सिद्ध हुआ है। 'बीएमजे ग्लोबल हेल्थ' नामक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में 14 मई, 2020 को प्रकाशित एक शोधपत्र में दिए आंकड़ों के अनुसार प्रसिद्ध वीडियो प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर कोरोना वायरस से जुड़े विषयों पर बड़ी संख्या में भ्रामक और गलत जानकारियों वाले वीडियोज उपलब्ध हैं। ये अशुद्ध जानकारियाँ खुद कोरोना से ज़्यादा खतरनाक हो सकती हैं। इसलिए इन पर आँख मूँद कर विश्वास न करें!

और हाँ, अनलॉक होने से यह भ्रम भी न पालें कि प्रधानमंत्री मोदी के ओजस्वी भाषणों से डर कर कोरोना कहीं भाग गया है और अब किसी भारतीय को छूने की हिम्मत नहीं कर सकता। कुछ लोग सचमुच इतने 'भोले' हैं कि उन्हें ऐसा ही लग रहा है। आपके निकट ऐसे लोग हों, तो सतर्क हो जाइए। सच्चाई यह है कि अभी और काफी वक़्त तक हमें घर की लक्ष्मण रेखाओं में रहने की ज़रूरत थी। लेकिन छूटें देना और भी ज़रूरी हो गया। क्योंकि बहुत बड़ी जनसंख्या भूखों मरने की ओर बढ़ती दिख रही है। जिन्हें  अपने लिए रोज़ कुआँ खोदना है, उन्हें कब तक बंदिशों में रखा जा सकता है? अर्थ व्यवस्था को चारों खाने चित होने से बचाने के लिए बाजारों और उद्योग धंधों को खोलना मजबूरी है।

ठीक अभी कुछ नहीं हुआ है। बस दो महीने से ज़्यादा की तालाबंदी में भारत ने अगले कुछ और महीनों तक खुद को कोरोना से लड़ते रहने के लिए तैयार कर लिया है। यह तैयारी तब बिलकुल भी नहीं थी, जब आकस्मिक रूप से कोरोना का कहर पहले पहल टूटा था। लेकिन इस विडंबना से भी मुकरा नहीं जा सकता कि बहुत बड़ी तैयारी हो चुकने पर भी इस महादेश की विशाल जनसंख्या की तुलना में संसाधन अब भी बेहद कम हैं। ध्यान रहे कि जून-जुलाई में, यानी अनलॉक की छूटें बढ़ने के साथ साथ देश में कोरोना संक्रमण जब अपने चरम (पीक) पर होगा, तब अस्पताल, चिकित्सक और बेड सब कम पड़ जाने वाले हैं। ऐसे में अफरा तफरी न मचे, इसलिए इस व्यापक भ्रम का निवारण सबसे पहले ज़रूरी है कि कोरोना अनिवार्यतः जानलेवा है। जानना होगा कि सामान्य शुचिता के नियम और सामाजिक दूरी का निर्वाह करके कोई भी निजी रोग प्रतिरोध शक्ति के सहारे 2 सप्ताह में इससे मुक्त हो सकता है। इतने से संयम का पालन न करने पर ही हालात बेकाबू और मारक होते हैं।

अतः अनलॉक होने की सरकारी घोषणा के बावजूद अब ज़रूरी होगा कि हम सब अपने चारों ओर हर समय लक्ष्मण रेखा रखें। न खुद लाँघें, न दूसरे को लाँघने दें। (तनिक सी भावुकता सीता हरण का कारण बन सकती है न!)





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ऋषभ देव शर्मा: संपादकीय///


*सकते में बाजार!*

खबर है कि कोरोना संकट काल में लोगों तक नकदी पहुँचाने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से लोन बाँटने पर जोर दिया जा रहा है। इसीलिए रिजर्व बैंक लगातार रेपो रेट में कटौती कर रहा है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि लोग कर्ज लेने को तैयार नहीं हैं। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन रजनीश कुमार ने खुद स्‍वीकार किया है कि बैंक कर्ज देने को तैयार हैं, लेकिन ग्राहक कर्ज लेने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। बाज़ार सदमे और सकते की हालत में है। यानी ग्राहक अभी किसी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं। हालाँकि एसबीआई चेयरमैन सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) को तीन लाख करोड़ रुपये की लोन गारंटी योजना को लेकर आशान्वित हैं कि लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा लोन लेकर अपने कारोबार को चलाएँगे और विस्‍तार करेंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि, बाजार में इस योजना को लेकर भी कोई खास जोश दिखाई नहीं दे रहा!

दरअसल, 'अनलॉक' का अर्थ यह नहीं कि सचमुच किसी मुख्यद्वार पर ताला लटका था, जिसे एक झटके में तोड़ दिया गया है। काश, ऐसा होता तो कितना अच्छा होता! उधर ताला खुलता और इधर अर्थव्यवस्था रातोंरात सेहतमंद हो जाती। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। बाजार में चहल पहल, भीड़ भाड़, अफरा तफरी तो है। लेकिन व्यवसाय बढ़ नहीं रहा। कहते हैं न, पैसा नहीं पास तो मेला लगे उदास।

लोगों को डर है कि कोरोना अभी जाने वाला नहीं है, इसलिए वे और बुरे वक़्त के लिए इंतज़ाम कर लेना चाहते हैं, पर जेब खाली है, तो करें क्या! इसीलिए यथास्थिति बनाए रखना उनकी मजबूरी है। जब तक यह यथास्थिति नहीं टूटेगी, तब तक आप चाहकर भी बाजार को सरपट नहीं दौड़ा सकते!

गौरतलब है कि आय घटने पर लोग दो प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं। एक तो यह कि उधार लेने की प्रवृत्ति बढ़ती है। यह उधार किसी और से लिया जा सकता है या अपनी ही बचत से भी निकाला जा सकता है।  इस तरह लोग अपने खर्चों को वर्तमान स्तर पर बनाए रखते हैं।  दूसरी प्रतिक्रिया यह होती है कि लोग अपनी बचत बढ़ाने का प्रयास करते हैं और खर्चों को कम करते हैं। पहला रास्ता वे तब अपनाते हैं, जब उन्हें लगे कि आय में कटौती तात्कालिक है। दूसरा रास्ता तब अपनाया जाता है,  जब लगे कि आए हमेशा के लिए घट गई है । लंबे लॉकडाउन से और बहुत बार नौकरियाँ छूटने तथा बाजार के कमजोर होने के कारण इस समय लोग यह महसूस कर रहे हैं कि आय में कटौती स्थायी है। इसलिए आमतौर पर लोग दूसरे विकल्प को अधिक चुनते दिखाई देते हैं। ऐसे में कंपनियों के पास देने को लोन वगैरह हो, तो भी बिक्री नहीं होगी। क्योंकि लोग खरीदना नहीं चाहेंगे। इसलिए सही रास्ता यह है कि लोगों की जेब में पैसा पहुँचे, ताकि वे खरीदने के लिए बाजार में उतर सकें। माँग पैदा हो, क्योंकि इस समय माँग घटी हुई है। मजे की बात यह है कि हम माँग बढ़ाने के बजाय इस समय उत्पादन बढ़ाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं और इसी का असर शायद यह है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन को यह कहना पड़ रहा है कि हमारे पास पैसा है पर किसी को चाहिए नहीं!

ऐसा इसलिए हो रहा है कि सरकार इस पूरे मसले को आपूर्ति का मसला बना रही है और कंपनियों के जोखिम को कम करने पर ज्यादा ध्यान दे रही है। जबकि वास्तविक मुद्दा माँग से संबंधित है। खरीददार जब खरीदना ही नहीं चाहता, तो फिर उत्पादन करते जाने का क्या फायदा या क्या तुक है?  सरकार में बैठे हुए आर्थिक नीतिकारों को इस दृष्टिकोण से भी सोच कर देखना चाहिए।


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 ऋषभ देव शर्मा: 23062020///संपादकीय///


कोरोना : राजनीति नहीं चलेगी!

राजनीति के संक्रमण से बच पाना कोरोना जैसी अबूझ विश्वमारी के लिए भी संभव नहीं! कम से कम दिल्ली के ताज़ा घटनाक्रम को देख कर तो यही लगता है। सबने देखा कि होम क्वारंटीन के मुद्दे पर उपराज्यपाल को क्यों और कैसे पलटी मारनी पड़ी। नए फैसले के मुताबिक, अब केवल गंभीर मरीजों को ही क्वारंटीन सेंटरों और अस्पतालों में रखा जाएगा, जबकि लक्षणहीन या अगंभीर स्तर के मरीजों को उनके घरों पर ही होम क्वारंटीन किया जा सकेगा।

याद रहे कि इससे पहले दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने सभी कोरोना मरीजों को अनिवार्य रूप से न्यूनतम पाँच दिन क्वारंटीन सेंटर में रखने का आदेश जारी किया था। उससे सभी हलकों में असंतोष था। वैसा करना व्यावहारिक भी नहीं था। यही नहीं, सयाने बताते हैं कि उराज्यपाल का वह आदेश गृहमंत्री अमित शाह को भी नागवार गुज़रा। गौरतलब है कि इस बीच दिल्ली की सभी महत्त्वपूर्ण गतिविधियों को गृहमंत्री की ही निगरानी में  आगे बढ़ाया जा रहा है। स्वाभाविक है कि इस नाज़ुक दौर में वे कोरोना जैसे गंभीर मामले पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच किसी तरह का टकराव देखना नहीं चाहेंगे। किसी भी समस्या का ठीकरा मुख्यमंत्री के सिर फोड़ना आसान भले हो, लेकिन इस समय ऐसी खींचतान का भाजपा और गृहमंत्री दोनों की छवि पर विपरीत असर होगा। शायद इसीलिए उन्होंने उपराज्यपाल के  फैसले को रद्द करवाया होगा। वैसे विशेषज्ञों के समझाए बिना भी उपराज्यपाल महोदय की समझ में यह बात आ जानी चाहिए थी कि अगर सभी मरीजों को क्वारंटीन किया जाए, तो जिस तेज़ गति  से दिल्ली में कोरोना के केसों की संख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए वहाँ रोगी-शय्याओं का भीषण संकट पैदा जाएगा और  जरूरतमंद मरीजों को  इलाज से वंचित रहना पड़  सकता है।  पर राजनीति जो न कराए...!

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर होम क्वारंटीन में 'सामाजिक दूरी' और निजी स्वच्छता के नियम पालन में तनिक भी कोताही हुई, तो कोरोना के अगले विस्फोट के लिए भी दिल्ली को तैयार रहना होगा। इसलिए इस पर सख्त निगरानी रखनी होगी कि जिन लोगों को होम क्वारंटीन किया जा रहा है, वे नियमों का "सख्त" पालन कर रहे हैं या नहीं। इसके लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए, जिससे होम क्वारंटीन का असली फायदा हो सके। अगर यह पाया जाए कि किसी मरीज के पास इस 'एकांतवास' को घर पर ठीक से निभाने की व्यवस्था नहीं है, और ऐसे बहुत से केस हो सकते हैं, तो उन्हें तो क्वारंटीन सेंटर में रखना ही बेहतर होगा। ताकि दूसरों को संभावित संक्रमण से बचाया जा सके। इस पर, नो पॉलिटिक्स प्लीज़!

केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि कोरोना की गिरफ्त में आए कई अन्य बड़े राज्यों के कोविड-19 ग्राफ को देखते हुए यह भी कहना ज़रूरी है कि टेस्ट की संख्या बढ़ने के साथ देश भर में कोरोना के नए मामले दैनिक स्तर पर जिस गति से सामने आ रहे हैं, उनसे तो यही लगता है कि महामारी से लड़ने के बजाय बड़ी हद तक अब देश को रामभरोसे छोड़ दिया गया है। इतने विशाल देश की भाँति भाँति की आर्थिक और व्यावसायिक से लेकर यातायात और रोजगार तक की समस्याओं के कारण तालाबंदी को और लंबा नहीं खींचा जा सकता न!

अंततः, इस बीच यह अच्छी खबर आई है कि हल्के और मध्यम प्रकार के कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए असरकारी पाई गई एंटीवायरल दवा  को ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से अनुमति मिल गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस दवा के व्यापक इस्तेमाल से अब बढ़ते कोविड केसों की रफ्तार धीमी पड़ेगी। तथास्तु!

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कोरोना और घरेलू हिंसा


संयुक्त राष्ट्र की मानें तो विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के दौरान वैश्विक स्तर पर घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोत्तरी देखी गई है।  रिपोर्ट है कि कोरोना जनित तालाबंदी और अन्य पाबंदियों के चलते ज़्यादा संख्या में महिलाओं को घर में ही रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बहुत सी महिलाएँ तो उनके साथ दुर्व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार व्यक्तियों के साथ ही अपने घरों में कैद होकर रह गई हैं। इस बीच संयुक्त राष्ट्र की उपमहासचिव आमिना जे. मोहम्मद ने कहा है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाओं पर आँखें मूँद लेने वाले पुरुषों और लड़कों को यह स्वीकार करना होगा कि वे भी इस हिंसा में भागीदार हैं। उन्होंने सब पुरुषों का आह्वान किया है कि सच की उपेक्षा करने की प्रवृत्ति त्यागें और स्त्रियों के खिलाफ किसी भी रूप में हो रही हिंसा के विरोध में मुखर हों।

दरअसल, कोविड-19 के बहाने दुनिया की कई तरह की कालिख भी सामने उजागर हो रही है। कुछ देशों से ऐसी खबरें आईं कि कोरोना जनित अनिवार्य तालाबंदी के कारण महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले बढ़ गए, तो कुछ जगहों  पर यह देखने में आया कि लॉकडाउन के हटते ही छेड़खानी और बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हो गया। यानी, ताला बंद रहे या खुला, 'पुरुषों' की दुनिया में मरण औरत का ही है! यह दुनिया 'मनुष्यों' की दुनिया कब बनेगी? घरेलू हिंसा चाहे किसी भी रूप में हो, असभ्यता और बर्बरता है तथा इससे तभी बचा जा सकता है, जब पुरुष समाज कम से कम इतना शिष्टाचार सीख ले कि स्त्री भी उसी की तरह मनुष्य है। भारतीय परंपरा ने इसीलिए स्त्री को रक्षणीय माना था। वह अवध्य और आदरणीय थी। लेकिन कालांतर में इस परंपरा को दूषित करते हुए स्त्री को वस्तु (ऑब्जेक्ट) बना दिया। स्त्री का वस्तूकरण ही आज स्त्री-समुदाय की सबसे बड़ी समस्या है। उसे फिर से 'मनुष्य' का दर्जा भोगवादी मानसिकता को बदले बिना नहीं मिल सकता। संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आमिना जे. मोहम्मद ने इसी तरफ इशारा किया है।

उल्लेखनीय है कि भारत में भी राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू)  लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की घटनाएँ बढ़ने पर चिंता प्रकट कर चुका है। आयोग का कहना है कि बहुत सी महिलाएँ इसके खिलाफ मामला दर्ज  कराने में सक्षम नहीं हैं, तथा कि लॉकडाउन की पूरी अवधि में आयोग को ईमेल के जरिए ऐसी अनेक शिकायतें मिली हैं। यह बात अलग है कि इस दावे को केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी स्वीकार नहीं करतीं। वे इस अक्षमता की बात को कुछ गैर-सरकारी संगठनों की फैलाई भ्रांति मानती हैं। वे बताती है,  'यह गलत है। प्रत्येक राज्य में पुलिस कार्यरत है। हर राज्य के प्रत्येक जिले में एक 'स्टॉप क्राइसिस सेंटर' है। मैं उन महिलाओं के नाम और पहचान नहीं जाहिर करूँगी, जिन्हें हमने बचाया है। हर राज्य और जिले में उन पीड़ितों के राहत और पुनर्वास  का विवरण मौजूद है।'  लेकिन दुनिया के बहुत से देशों की महिलाएँ इतनी भाग्यशाली नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव ने उनके लिए ही आवाज़ उठाई है। उन्होंने सभी का, विशेषत: पुरुषों और लड़कों का, महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने और माताओं, बहनों, बेटियों, साथिनों और सहकर्मी महिलाओं के साथ खड़े होने के लिए आह्वान किया है। क्योंकि दुनिया भर में महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा तथा बलात्कार के मामले आसमान छू रहे हैं। आमिना जे.मोहम्मद ने ठीक ही उन लोगों की भर्त्सना की है, जो इस असामान्य आपत्काल में स्त्री-समुदाय के प्रति अपना दायित्व निभाने के बजाय उल्टे दोष मढ़ने. कोविड-19 और लॉकडाउन को जिम्मेदार ठहराने. सामाजिक और आर्थिक दबावों का रोना रोने और  अनिश्चितता पर दोषारोपण करने में व्यस्त हैं। अंततः, उनकी इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यौन हिंसा – हिंसा का कोई भी रूप – हिंसा ही है तथा इसे  किसी भी बहाने से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। 000

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