बुधवार, 17 जून 2020

लद्दाख यात्रा में यूरोपियन विद्वान चोमा की खोज का महत्व / त्रिलोकदीप




1969 में पहली बार लद्दाख गया था फौजियों के साथ। रास्ते में मुझे दो जानकारियां ऐसी मिलीं जो उस समय मेरे लिए नई थीं। एक, द्रास दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा स्थान है और दूसरी लद्दाख में एक ऐसा यूरोपीय विद्वान अपना पूर्व निश्चित रास्ता न पाकर लद्दाख पहुंच गया और यहां तिब्बती भाषा के शब्दकोश और व्याकरण को लिखने में ऐसा जुटा कि उसे अपना मूल लक्ष्य बिसर गया। मैंने उसी वक़्त मन ही मन अपने से दो वादे किये। एक, दुनिया का सब से ठंडा स्थान देखने का और दूसरे उस यूरोपीय जिज्ञासु विद्वान की तपोभूमि के साथ साथ उनसे जुड़े  कुछ इलाकों को देखने का  भी जहां का रास्ता उसने ज़्यादातर  पैदल चल कर तय किया था। दुनिया का सबसे ठंडा स्थान साइबेरिया जाने का अवसर मुझे 1987 में प्राप्त हुआ था। अपने फेसबुक के मित्रों से अपनी साइबेरिया यात्रा मैं पहले ही शेयर कर चुका हूं।

अब बात करते हैं अपने आपसे किए गए दूसरे वादे की। उस यूरोपीय विद्वान के बारे में कुछ जानकारियां लद्दाख में मिलीं, कुछ शिमला में, कुछ लाहौर में, कुछ कलकत्ता (आज का कोलकाता) और अंत में दार्जीलिंग में। मुझे हंगरी जाने के तीन अवसर मिले। एक अवसर पर राजधानी  बुदापेश्त में मेरा उस समय का साथी पीटर अकादेमी ऑफ साइंसेस दिखाने ले गया। उस भवन के बाहर लगी मूर्ति को देखकर मेरे मुंह से सहसा निकल गया कि 'यह तो चोमा की मूर्ति है। ' अब उसके चौंकने की बारी थी। बोला, सर अभी हम अकादेमी के भीतर गये नहीं और आपने उस व्यक्ति की मूर्ति पहचान ली जिस के विषय में बताने के लिए मैं आपको यहां लाया हूं। उसकी समस्या का समाधान करते हुए मैंने उसे बताया कि चोमा की एक मूर्ति दार्जीलिंग में भी है । जी हां , मैं जिस यूरोपीय विद्वान का ज़िक्र कर रहा था उसका नाम है अलेक्जांडर चोमा दे कोरोश जिन्हें हंगरी में कोरोशी चोमा शानदौर  के नाम से जाना जाता है। दिल्ली से रवाना होने से पहले उस समय के हंगरी के सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक योसेफ साबो ने मुझे बताया था कि'चोमा भारत में हंगरी की सांस्कृतिक धुरी हैं और उनकी खोजी और जिज्ञासु सोच ने दोनों देशों को निकट लाने में अहम भूमिका निभाई है। यही कारण है कि भारत आने वाला हरकोई हंगेरी दार्जीलिंग की यात्रा के बिना अपने सफर को अधूरा मानता है। हमारे लिए दार्जीलिंग पुण्य भूमि है जहां चोमा के रूप में हमारे देश की रूह दफन है और उन्हें श्रद्धांजलि देना हमारा पुनीत कर्त्तव्य।'

कभी कभी कुछ लोग अनोखे अंदाज में यह भी कहते पाये जाते हैं कि चोमा चले तो थे अपने देश की उत्पत्ति, उद्भव का स्रोत या कह सकते हैं अपने देश का कुल देवता ढूंढ़ने लेकिन भटक कोलंबस की तरह गये। जैसे कोलंबस निकले थे हिंदुस्तान की खोज में लेकिन खोज डाला उन्होंने अमेरिका। परन्तु चोमा के साथ ऐसी तुलना न तो रुचती है और न ही सटीक बैठती है। हंगरी की अकादेमी में एक चोमा कक्ष है जहां चोमा से जुड़ा साहित्य, उनकी पांडुलिपियां, उनके एकत्र किये अनेक दस्तावेज, जगह जगह उनकी पहनी गयीं पोशाकें आदि शामिल हैं। बताया गया कि चोमा ऐसी विलक्षण बुद्धि का छात्र था जिस के ज़ेहन में स्कूल के दिनों से ही एक ख्वाब सा ही आना शुरू हो गया था कि क्यों न हम अपने देश के अस्तित्व और उसके मूल के बारे में जानने की कोशिश करें। कोई कहता हम लोग हूण हैं तो कोई हमें मंगोल बताते हुए मध्य एशिया का कहते। चोमा के दो और सहपाठी भी इस सपने को साकार होते देखने की गर्ज़ से उसके हो लिये। वह यह भी  जानना चाहते थे कि अगर यह सच है तो हम यूरोप से कैसे जुड़े। उम्र बढ़ने के साथ चोमा का सपना तो उनके साथ जवान होता चला गया लेकिन उनके दूसरे दो साथियों के लिए वह स्कूली खेल से ज़्यादा कुछ नहीं था। हंगरी के ट्रांसिलवनिया के कोरोश में अप्रैल 1784 में चोमा का जन्म एक गरीब घर में हुआ जो सैकड़ों वर्षों से सैनिक जागीरदारों से जुड़ा था और राष्ट्रभक्तों का परिवार माना जाता था। छुटपन से ही पढ़ाकू और जिज्ञासु प्रवृति का होने से चोमा का ध्यान शस्त्रों के बजाय शास्त्रों में रमा रहता। उन्हें लोग बेचैन रूह और तबियत का इंसान मानते थे। चोमा के एक अध्यापक थे प्रोफेसर सैमुएल हेंगेदुश जो उनकी रुचियों और दृढ़ विचारधारा से परिचित थे। उनकी कोशिशों से चोमा ने जर्मनी के गोटिंगें विश्वविद्यालय में लंबे समय तक अध्ययन किया औऱ इतिहास और प्राच्य विद्या के विद्वान बन गये।उन्होंने ने लैटिन, जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं का ज्ञान भी अर्जित किया। विदेश में गहन अध्ययन करने के बाद जब चोमा स्वदेश लौटे तो कई नौकरियां उनका इंतजार कर रही थीं। उनके प्रोफेसर हेंगेदुश अब उनके जिगरी दोस्त बन चुके थे। जब चोमा से नौकरी का उल्लेख हुआ तो उन्होंने साफ बता दिया कि पहले वह स्लोवेनिक भाषा सीखेंगे और उसके बाद अपनी यात्रा शुरू करेंगे, अपने अतीत की खोज की यात्रा। चोमा ने मध्य एशिया और वह भी अकेले  तथा पैदल यात्रा का उनको फैसला सुना कर एकबारगी हिला दिया। इसपर चोमा ने हंसते हुए अपने प्रोफेसर बनाम दोस्त हेंगेदुश को उत्तर दिया, 'यही तो ज़िंदगी है भाई। 'हेंगेदुश का चोमा से इतना लगाव था कि वह उसकी हर गतिविधि और आगे के कदम से वाकिफ रहा करते थे। प्रोफेसर हेंगेदुश ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि चोमा एक दिन आये और बोले 'मैं कल से अपनी यात्रा पर निकलने वाला हूं।' उनकी आंखों में एक अजब विश्वास भरी चमक थी और लगता था कि उनकी आत्मा कुछ कर गुज़रने को फड़फड़ा रही है। हम दोनों ने दोस्ती भरी बातें की और।अलविदा के जाम टकराये। अगले दिन चोमा फिर आये। खड़े खड़े ही बोले 'एक बार फिर आपको देखने का मन किया, चला आया। ' बेपनाह मोहब्बत थी दोनों में। हेंगेदुश काफी दूरी तक चोमा को छोड़ने के लिए गये। जब तक चोमा उनकी आंख से ओझल नहीं हो गए प्रोफेसर हेंगेदुश डबडबाई आँखों से उसे निहारते रहे।

यह तीर्थयात्री विद्वान अपनी एकाकी यात्रा पर  35 साल की उम्र में एक चुनौती भरी खोज में निकल पड़ा। उसने1सादे कपड़े पहने हुए थे तथा हाथ में एक छड़ी थी और बगल में एक छोटा सा झोला। नवंबर 1819 को इस एकांतवासी वीर ने हंगरी की पहाड़ी सीमा पार की। उद्देश्य था कांस्टेण्टिनोपल से एशिया में प्रवेश करना। लेकिन तुर्की में प्लेग का प्रकोप होने की वजह से अपना रास्ता बदलना पड़ा। अब वह यूरोपीय तट से होकर मिस्र पहुंचा।सिकंदरिया उतर कर कुछ समय तक अरबी भाषा का अध्ययन किया। वहां भी प्लेग की बीमारी आ पहुंची जिस के चलते चोमा सीरिया के अलेप्पो पहुंच गया। जहां भी चोमा जाते दो काम करते। एक तो वहां की स्थानीय भाषा सीखते और दूसरे वहां की पोशाक पहनते। इसके बाद परियों के देश बगदाद पहुंचे। कुछ पैदल चले तो कुछ यात्रा नाव से की।  लेकिन बगदाद में परियों जैसा उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।अलबत्ता वहां के अंग्रेज़ रेजिडेंट से उन्हें आर्थिक सहायता मिली जिससे उनका आगे का सफर काफी हद तक आसान हो गया। उन दिनों एक मुल्क से दूसरे मुल्क जाने के लिए काफिले चला करते थे। ऐसे ही एक काफिले में शामिल होकर चोमा तेहरान पहुंच गया। वहां तक पहुंचने में करीब एक साल लग गया  14 अक्टूबर 1820  को एशिया की सरहद में पहुंच कर चोमा की आंखों में चमक आ गयी। उनकी योजना के अनुसार उन्हें आगे का रास्ता नहीं सूझा, पैसा भी खत्म हो चुका था।  लिहाज़ा ब्रितानी दूतावास का दरवाजा खटखटाया जहां उन्हें सर हेनरी और मेजर जॉन विललोक मिले जो किसी एनजीओ से संबद्ध थे। उन्होंने चोमा की पैसों, कपड़ों और किताबों से मदद की। उनके संरक्षण में चार माह रहे। चोमा ने वहां दो प्रमुख कार्य किये। एक अपनी अंग्रेज़ी को मांझा और दूसरे फारसी बोलने की आदत डाली। मार्च 1821 को वहां से निकल कर चोमा ने अपना नाम बदल कर सिकंदर बेग रख लिया। भारत में अलेक्जांडर को सिकंदर के नाम से जाना जाता है। स्थानीय कपड़े पहने और मुंह मंगोलिया की ओर किया। चोमा ने अपनी बची खुची पूंजी, अपने प्रमाणपत्र, अपना पासपोर्ट, अपने कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज तथा अपना यूरोपीय सूट अपने मददगारों के पास इस पुर्ज़े के साथ छोड़ दिया कि अगर मैं बुखारा के रास्ते मर जाऊं या फनाह हो जाऊं तो मेरी यह अमानत मेरे परिवार के पास पहुंचवा दीजिएगा। चोमा बुखारा तो पहुंच गया लेकिन यहां पहुंच कर अफवाह सुनी कि  रूसी सेना की नाकेबंदी के कारण वह पूर्व की तरफ नहीं जा सकते।
 (मैटर जारी)

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