मंगलवार, 30 जून 2020

30/6 को सुबह शाम के सतसंग का पाठ और वचन







**राधास्वामी!! 30-06-2020-


आज सुबह के सतसंग में पढे गये पाठ - 

                     

(1) आनँद मंगल आज, साज सब आरत लाई। राधास्वामी हुए है दयाल, काल डर दूर बहाई।।-(सत्तनाम धुन अगम, हिये बिच आन समाई। काया नगर मँझार, पुरुष की फिरी दुहाई।।)-. (सारबचन-शब्द-6,पृ. सं. 123)                                                 

 (2) सुरतिया लखत अधर घर। गुरु के संग चली।।-(संत देस निज धाम सुरत का। पावे जो कोई शब्द पिली।।)- (प्रेमबानी-2-शब्द-131,पृ सं. 262)       
                 

 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**





**राधास्वामी!! 30-06-2020-


आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-

(1) होली के दिन आये सखी। उठ खेलो फाग नई।। लाल गुलाल रुप गुरु देखा। त्रिकुटी जाय रही।।- (ऐसु होली खेल राधास्वामी से। अचल सुहाग लई।।)-( प्रेमबानी, भाग-3,शब्द-7,पृ।सं.298)                                                 

 (2) सावन मास सुहागिन आया। रोम रोम अँग अँग हरषाया।। प्रेम घटा के बदला छाये। रिमझिम रिमझम बरषा लाये।। प्रेमभरी हुई नाम की लोई। सुरत निरत दई चरन समोई।। प्रेमसरुप शब्द की छुनछुन।साहबगोद मगन रहे सुन सुन।।-(चरनअम्बु में गोता मारा। हैरत हैरत वार न पारा।।)-(प्रेमबिलास--शब्द-2,पृ.सं.3)     

 (3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला -कल से आगे-

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

**राधास्वामी !! 30-06 -2020 -


आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-


कल से आगे -(35 )

 प्राय सभी मतों की धर्म पुस्तकों में अनहद शब्द का उल्लेख किया गया है। मैत्री उपनिषद के छठे प्रपाठक में आया है कि कुछ लोग शब्द ब्रह्म का दूसरी रीति से वर्णन करते हैं। हाथों के अंगूठे से कानों को बंद करके वे लोग हृदयाकाश का शब्द सुनते हैं।

 ये सात प्रकार निषाद प्रकार के शब्द है। इन सात प्रकार के शब्द शब्दों से पार होकर वे अव्यक्त में समा जाते हैं । वहाँ पहुंचकर वे निर्गुण और एक रूप हो जाते हैं जैसे भिन्न-भिन्न फूलों का रस मिलकर एक शहद बन जाता है ।।क्योंकि कहा है- दो ब्रह्म जानने के योग्य है- शब्दब्रह्म और उससे परे का।  जो लोग शब्दब्रह्म को जानते हैं वे परे के ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।                           

22 -किसी और स्थान पर निर्देश किया गया है कि शब्दब्रह्म ओउम् है।।..........

(23 )- (देखो मिस्टर ह्यूम का अंग्रेजी अनुवाद)।  इसके अतिरिक्त अथर्ववेद की हंस उपनिषद में वर्णन है कि " हंस" मंत्र के करोड़ जप समर्पन करने वाले को नाद का अनुभव होता है । फिर नाद के दस भेद वर्णन करके बतलाया कि उनमें से नौ प्रकार के नाद का त्याग और दसवीं प्रकार के नाद का, जिसकी बादल की गरज से उपमा दी गई है, अभ्यास करना चाहिये क्योंकि इससे ब्रह्म के स्वरूप की प्राप्ति होती है। और 'हठयोगप्रदीपिका ' में तो बीसों श्लोक अनहद शब्द की महिमा में लिखे हैं।' सत्संग के उपदेश' नामक पुस्तक के प्रथम भाग के 48लें बचन उनमें से ऐसे बहुत से श्लोक अर्थसहित लिखे गये हैं । विस्तार के भय से उन्हें यहां उद्घृत नहीं किया जाता है।।   
                                                    

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻

यथार्थ प्रकाश- भाग पहला-

 परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**



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