शनिवार, 27 जून 2020

चौथा खंभा बनने से इंकार -3 / ललित सुरजन





देशबन्धु: चौथा खंभा बनने से इंकार-3

मध्यप्रदेश की राजधानी बनने का अवसर भले ही जबलपुर से चूक गया हो लेकिन नए मध्यप्रदेश में वह राजनैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से प्रमुख और जीवंत केंद्र था। इंदौर, ग्वालियर, भोपाल, रीवा में सामंतशाही थी, जबलपुर और रायपुर जनतांत्रिक आंदोलनों के गढ़ थे। उन दिनों रायपुर को भी महाकौशल का ही हिस्सा मान लिया जाता था।  यह दोनों अंचल वैसे तो कांग्रेसी थे, लेकिन कांग्रेस के भीतर समाजवादियों का यहां वर्चस्व न सही, महत्वपूर्ण रोल तो था ही। यदि रायपुर में पंडित रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह और डॉ खूबचंद बघेल जैसे प्रबुद्ध नेता थे, तो जबलपुर में भी एक लंबी दीर्घा थी।

भवानी प्रसाद तिवारी, कवि, गीतकार, स्वाधीनता सेनानी, 8 बार जबलपुर के महापौर निर्वाचित हुए। इसी तरह कवि रामेश्वर गुरु महापौर बने। पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र तो अंग्रेजों की जेल में रहते हुए ही जबलपुर नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए थे। सेठ गोविंद दास 1923 से 1974 तक केंद्रीय धारासभा और बाद में लोकसभा के लगातार सदस्य रहे। पड़ोसी सिहोरा के काशीप्रसाद पांडे इसी तरह लगातार 50 साल तक प्रांतीय विधानसभा के सदस्य रहे। जबलपुर में जो पहली मूर्ति स्थापित हुई, वह सुभद्रा कुमारी चौहान की थी।

यहीं से माधवराव सप्रे ने कर्मवीर का प्रकाशन प्रारंभ किया था, जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी और पंडित सुंदरलाल जैसे उनके सहयोगी थे। कहने का आशय यह है कि राजनीति के अपने अंतर्विरोधों के बावजूद जबलपुर या महाकौशल की राजनीति वृहत्तर और उदात्त लक्ष्यों से प्रेरित थी, जहां राजनेता और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के बीच, खासकर के नेतृत्व में, कोई भेद समझ पाना लगभग असंभव था। यह अतिशयोक्ति हो सकती है लेकिन प्लेटो ने 'द रिपब्लिक' में जिस फिलॉसफर किंग की अवधारणा पेश की थी, जबलपुर का राजनैतिक नेतृत्व अपनी सीमाओं में वैसे ही उच्च आदर्श से परिचालित था।

स्वाभाविक ही उस समय ऐसे पत्रकार भी थे जिनके लिए अखबार में नौकरी करना किसी तात्कालिक स्वार्थपूर्ति का साधन न होकर एक ऊंचे आदर्श के लिए काम  करना था। 1950 में बाबूजी नागपुर से जबलपुर इन आदर्शों को साथ लेकर आए थे और ताजिंदगी अपने कौल पर कायम रहे। जबलपुर में राजनीति और पत्रकारिता की युति में कुछ और तथ्य जोड़े जा सकते हैं जैसे द्वारिका प्रसाद मिश्र ने ''सारथी'' और ''श्री शारदा'' जैसे पत्रों का संपादन किया। इन का वित्तीय पोषण जहां तक मुझे पता है, सेठ गोविंद दास करते थे। भवानी प्रसाद तिवारी ने साप्ताहिक ''प्रहरी'' का संपादन प्रकाशन किया और हरिशंकर परसाई नामक एक युवा लेखक को पहला प्रश्रय वहीं मिला। आगे चलकर जब परसाई जी और उनके मित्र श्रीबाल पांडे ने ''वसुधा'' की स्थापना की तो मुक्तिबोध उसके स्थायी स्तंभकार बने तथा  ''एक साहित्यिक की डायरी'' का प्रकाशन वहीं हुआ। एक समय में ''हितकारिणी'' और ''शुभचिंतक'' जैसी आदर्शवादी नामों वाली पत्रिकाएं भी जबलपुर से प्रकाशित हुई।

जब 1950 में बाबूजी नवभारत लेकर जबलपुर गए तो लगभग उसी समय उनके मित्र मोहन सिन्हा ने ''प्रदीप'' नामक सांध्य दैनिक प्रारंभ किया, जिसमें रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता प्रतिदिन छपती थी - एक नन्हे दिए ने डूबते सूरज से कहा कि हर रात आपका काम मैं संभालूंगा। जबलपुर में बाबूजी की तीन पारियों में बाबूजी को जो साथी सहयोगी मिले वे लगभग सभी लोक कल्याण के आदर्शों से प्रेरित थे और पत्रकारिता इनके लिए महज रोजी-रोटी कमाने का माध्यम नहीं थी।

हीरालाल गुप्त, कृष्ण कुमार तिवारी, प्रसन्न शंकर धगट, श्याम सुंदर शर्मा, रघुनाथ प्रसाद तिवारी, सोमदत्त, सुभाष चंद्र बोस, गंगा प्रसाद ठाकुर, गुलाबचंद नारद इत्यादि नाम मुझे याद आते हैं। इन सब नामों को पढ़कर अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि पत्रकारिता में मेरा अपना प्रशिक्षण किस दिशा में जा रहा था। हुकुमचंद नारद जबलपुर के प्रतिष्ठित पत्रकार थे और उन्होंने सरकारी विक्टोरिया अस्पताल में अपनी प्रेरणा और जनसहयोग से बीमारों के परिचारकों के लिए एक वार्ड का निर्माण कराया। समाजसेवा की ऐसी भावना थी। रामेश्वर गुरु का जिक्र ऊपर हुआ है, वे कभी अध्यापक और मेयर होने के साथ-साथ अमृत बाजार पत्रिका के संवाददाता थे।

जो भी हो, मेरे लिए तो नयी-नयी शुरुआत थी। मैं हाशिए पर खड़े होकर घटनाएं देखने वाला गवाह भर था। सांप्रदायिक दंगे या चीन का भारत पर आक्रमण, ऐसे मौकों पर अपने अखबार की जो भूमिका थी वह मेरे लिए प्रेरणादायी थी कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी अंतरात्मा से समझौता किए बिना पत्रकारिता का धर्म कैसे निभाया जाता है। इस बीच एक-दो सामान्य से हटकर प्रसंगों का मैं साक्षी बना। भारत-चीन युद्ध के तुरंत बाद राष्ट्रीय एकता परिषद का पुनर्गठन हुआ।

सागर विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में समय बिता रहे कद्दावर राजनेता पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र को उसका सदस्य मनोनीत किया गया। जिसकी तरह-तरह से व्याख्या होने लगी। एक शाम सागर से फोन आया और बाबूजी मिश्राजी से मिलने के लिए कुछ देर बाद निकल पड़े। वहां आधी रात को उनके बीच क्या चर्चाएं हुईं, मैं नहीं जानता। अपनी पुस्तक ''मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के'' में बाबूजी ने उसका विवरण दिया है। कुछ समय बाद ही कामराज योजना के अंतर्गत भगवंतराव मंडलोई ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और डीपी मिश्रा प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। मिश्र जी ने अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया, उसमें प्रदेश के चार भागों से 4 नए मंत्री उन्होंने लिए।

महाकौशल के सिवनी क्षेत्र से आदिवासी वसंतराव उईके, छत्तीसगढ़ के मालखरौदा से दलित वेदराम, विंध्यप्रदेश के चुरहट से अर्जुन सिंह और चौथे शायद करेरा (शिवपुरी) के गौतम शर्मा थे। यह एक तरह से प्रदेश की राजनीति में नया शक्ति संतुलन साधने की कोशिश थी। मंत्री बनने के बाद वेदराम जबलपुर आए थे, उन दिनों राजू दा यानी राजनारायण मिश्र जबलपुर में ही थे। मैं उनके ही साथ उनके पूर्व परिचित वेदराम जी से मिलने सर्किट हाउस नंबर- 2 गया था। एक नौसिखिए पत्रकार के रूप में किसी मंत्री से आमने-सामने मिलने का यह मेरा पहला मौका था। मुझे अब भी याद है कि वेदराम के दलित होने के कारण उनके बारे में बहुत से भद्दे चुटकुले चलने लगे थे, जो मुझे नागवार गुजरते थे। हमारे वर्ग-वर्ण विभेदी समाज में आज भी तो स्थितियां बहुत अधिक नहीं बदली हैं। यह एक तरह से जबलपुर में मेरा आखिरी साल था।

पं. द्वारका प्रसाद मिश्र 1963 से 1967 के बीच चार साल की अवधि के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए वे पहले बड़े राजनेता थे जिनके कार्यकाल को देखने का कुछ अवसर मुझे मिला। यह देखना भी दूर से ही था। वे मेरे दादाजी के उम्र के थे और जिस व्यक्ति से बाबूजी का संवाद होता रहा हो, वहां अपने पहुंचने का सवाल ही नहीं था। फिर भी उनके समय की कुछ घटनाएं मेरी याददाश्त में हैं और मैं अपनी भरसक बुद्धि उनका विश्लेषण करने का प्रयत्न करता हूं। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस के नेहरू विरोधी आठ बड़े नेताओं ने 1951 में उन्हें नेहरू जी के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उकसाया था और बलि का बकरा बना दिया था। यह तो उस दौर में राजनीति में किसी हद तक विद्यमान उदार परंपरा थी जिसके कारण मिश्र जी पूरी तरह से हाशिए पर नहीं गए, बल्कि सागर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उन्हें अपनी अंतर्निहित बौद्धिक प्रतिभा के बल पर एक नए किस्म की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।  इसके बाद यह 1962 में इंदिरा गांधी की उदारता थी जो उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में वापस लाईं और उनके लिए  मुख्यमंत्री का पद प्रशस्त किया। (अगले सप्ताह जारी)
#देशबंधु में 25 जून 2020 को प्रकाशित

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