शुक्रवार, 22 मई 2020

सीपी यानी कनाट प्लेस के जलवों की धूम /विवेक शुक्ला




Navbharatimes

कोई लौटा दे कनॉट प्लेस के बीते हुए दिन

अगर रोबर्ट टोर रसेल और सोबा सिंह अब भी हमारे बीच होते तो वे लॉकडाउन के कारण  उजाड़ पड़े कनॉट प्लेस के सन्नाटे को देखकर दहल जाते। टोर ने सीपी को डिजाइन किया था और सोबा सिंह ने इसके एक बड़े भाग को ठेकेदार की हैसियत से खड़ा किया था। जिस सीपी में दिन-रात रौनक रहती थी दिल्ली वालों के आने-जाने से वहां पर वीरानी और उदासी छाई हुई है। कनॉट प्लेस के बरामदों में सिर्फ थके-भूखे कुत्ते बैठे हुए मिलते हैं। कनॉट प्लेस की सड़कों पर कभी-कभी कोई कार या कोई अन्य निजी वाहन फर्राटे से निकल जाता है। उनकी आवाज से सन्नाटा भंग होता है। ये ही स्थिति जनपथ की भी है। दिल्ली की कई पीढ़ियां  इधर जींस,टी शर्ट खरीदने और कोल्ड कॉफी पीने के लिए आईं है। जनपथ पर जान निसार करती रही है दिल्ली। इधर भी कोई इंसान दिखाई नहीं देता।

सुबह की हलचल के बाद सीपी की वीरानी

कनॉट प्लेस, जनपथ लेन, हनुमान रोड वगैरह में रहने वालों को सुबह दूध-सब्जी देने वाले अवश्य घूम रहे होते हैं।ये सातेक बजे तक आ जाते हैं। तब ही अखबारों के हॉकर अपने मिशन पर निकले हुए दिखाई देते हैं। ये कनॉट प्लेस जनपथ, अतुल ग्रोव रोड,वकील लेन वगैरह में अखबारों-पत्रिकाओं को बांटने का काम सुबह आठ बजे से कुछ पहले समाप्त करके निकल जाते हैं। उसके बाद कनॉट प्लेस में फिर से उदासी छाने लगती है। कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर और शिव मंदिर भी बंद हैं। इसलिए इधर भक्त नहीं आ रहे। कहां गए मंदिरों के बाहर बैठने वाले भिखारी, मेंहदी लगाने वाली महिलाएं, ब्रेड पकौड़ा-कचौड़ी बेचने वाले खोमचे वाले? पर इन मंदिरों के आसपास घूमने वाले बंदर दिखाई दे रहे हैं। क्या वे सोचते होंगे कि उनसे मिलती-जुलती शक्ल वाले मनुष्य कहां चले गए? इन बंदरों-कुत्तों को भी सन्नाटा खलता तो होगा।

कनॉट प्लेस में आने वाले साधू कहां होंगे

अगर बात कनॉट प्लेस स निकलकर उससे सटे हेली रोड, अतुल ग्रोव रोड,टेलीग्राफ लेन, वकील लेन वगैरह की करें तो वहां भी सन्नाटा पसर रहता है। अब दिन में तो फिर भी  कोई इंसान दिखाई भी दे जाता है, पर शाम ढ़लते ही इधर सिर्फ इमारतें ही दिखाई देती हैं। तब कोई पैदल चलता हुए इँसान भी खोजने पर नहीं मिलता। कोरोना से डरे मनुष्य ने अपने को घर के अंदर कैद कर लिया है। बाराखंभा रोड के एक पुराने बंगले के पिछले हिस्से में सुबह से खड़े हो जाने वाले साधू भी ना जाने कहां होंगे? इस बंगले मे उन्हें एक लंबे अरसे से भोजन मिलता रहा है। सुबह भोजन के साथ न्याय करने के बाद ये साधू कनॉट प्लेस में निर्विकार भाव से टहलते हुए अपनी मंजिल की तरफ निकल जाते थे।

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