बुधवार, 20 मई 2020

साईबेरिया यात्रा के साथ-साथ जुड़ी यादें / त्रिलोकदीप





आज जब साइबेरिया की अपनी यात्रा पर लिखने के लिए बैठा तो तीन नाम अचानक आंखों के सामने कौंध गये। पहला, Denney's
School, रावलपिंडी के गुलज़ार अहमद मास्टर का, दूसरा माधोराव सप्रे हाई स्कूल, रायपुर के भूगोल टीचर बी. सिंह का और तीसरे द्रास के एक फौजी अफसर का। उसका नाम याद नहीं। तीनों में एक लफ्ज़ को लेकर समानता थी और वह शब्द था साइबेरिया। मास्टर गुलज़ार अहमद जब किसी विद्यार्थी से नाराज़ होते तो उसे डांटते हुए कहते, सुधर जाओ वरना साइबेरिया भेज दूंगा। हमारे भूगोल के टीचर बी. सिंह हर दूसरे तीसरे दिन यह पढ़ाना और बताना नहीं भूलते कि दुनिया का सब से ठंडा स्थान साइबेरिया है और सबसे लंबी ट्रेन ट्रांस साइबेरियन रेल । द्रास में फौजी अफसर ने ब्रीफिंग देते हुए जानकारी दी थी कि द्रास दुनिया का दूसरा सब से ठंडा स्थान है। जब उनसे पहले स्थान के बारे में पूछा गया तो उनका उत्तर भी साइबेरिया था औऱ जगह थी व्लादिवोस्टोक। अब दिमाग के किसी कोने में साइबेरिया दर्ज हो गया औऱ उसे देखने की चाह भी।

मेरी यह चाहत 1977 में पूरी हो सकती थी जब मैं सोवियत संघ की यात्रा पर गया था। रास्ते में व्यवधान इस लिए पैदा हो गया कि मास्को के बाद मुझे कई यूरोपीय देशों की यात्रा करनी थी। लिहाज़ा मन मसोस कर रह गया। दस साल बाद अगस्त 1987 को एक बार फिर सोवियत संघ की यात्रा करने का जब निमंत्रण मिला तो मैं ने साइबेरिया को तरजीह दी और साथ ही ट्रांस साइबेरियन ट्रेन देखने की फरमाइश नत्थी कर दी। मेरे अनुरोध को स्वीकार करते हुए ऐसा ही प्रोग्राम बनाया गया। सब से पहले ताशकंद गया। वहां की फिजां में खासा बदलाव महसूस हुआ। लोग खुल कर बातें कर रहे थे। पुरानी सरकारों की दमघोंटू नीतियों की धज्जियां उड़ा रहे1थे। उन्हें राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों का आनंद आने लग गया था। 1977 में ऐसी खुशहाली नहीं देखी गई थी। उस समय लियोनिद ब्रेज़्नेव सत्ता में थे।समरकंद मैं तब हो ही आया था। दो दिन ताशकंद में रहने के बाद मैं साइबेरिया एक महत्वपूर्ण नगर नोवोसिबिर्स्क पहुँचा जिसे नया साइबेरिया कहा जाता है। यहां का अधिक से अधिक तापमान जुलाई में रहता है 17.5 डिग्री सेल्सियस और जनवरी के बाद -20 डिग्री से नीचे। लिहाज़ा किसानों को 105 से 110 दिन मिलते हैं खेती करने तथा इंसानों और पशुओं के लिए खाना और चारा तैयार करने के लिए। गेहूं और राई की फसल होती है। बहुत से पौधे छतों के नीचे तैयार किये जाते हैं ताकि प्रतिकूल मौसम से उन्हें बचाया जा सके।

साइबेरिया एक करोड़ किलोमीटर में फैला हुआ है और उसकी आबादी  तीन करोड़ के आसपास है।इतने बड़े क्षेत्रफल वाले साइबेरिया में कई यूरोपीय देश समा सकते हैं। एक वक़्त था कि सजायाफ्ता लोगों को या सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों को देशनिकाले के तौर पर साइबेरिया भेजा जाता था। आम तौर ये लोग हुनरमंद होते थे और इन लोगों ने सरकारी सज़ा को अनुसंधान  औऱ खोज पड़ताल के तौर पर ग्रहण किया। ऐसे ही हुनरमंदों के चलते नोवोसिबिर्स्क में जितने भी साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र हैं उनका श्रेय इन्हीं प्रवासी लोगों को जाता है।यहां विश्वविद्यालय हैं, थिएटर हैं, कला और पेंटिंग्स प्रदर्शन की गैलरी हैं तथा फ़िल्म और टीवी स्टूडियो भी। आजकल यह नगर विदेशियों में भी लोकप्रिय हो रहा है, अंतरराष्ट्रीय उड़ानें आती जाती रहती हैं, ट्रांस साइबेरियन रेल से भी लोग यहां पहुंच सकते हैं। वैज्ञानिक तौर भी यहां खूब विकास हुआ है। साइबेरिया खनिज पदार्थों  और औषधीय पेड़ पौधों में जितना सम्पन्न है विश्व का शायद ही कोई दूसरा देश हो। यहां पर जितनी तेजी के  साथ वैज्ञानिक और टेक्नोलॉजिकल क्रांति हो रही है उतनी शायद ही किसी दूसरे देश में हो रही होगी। कारण साफ है हर तरह के संसाधनों की भरमार। बावजूद इस क्रांति के आज भी टुंड्रा में रेन्डियर की अहम भूमिका है। उसके वूल के चाहने वालों की कमी नहीं। रेन्डियर के अलावा पोलर लोमड़ी, पोलर भालू, भूरा भालू, वालरस आदि प्रमुख है।

नोवोसिबिर्स्क से विदा होकर साइबेरिया के दूसरे ख़ूबसूरत शहर इरकुत्स्क पहुंचा। कुछ लोग इस शहर को 'साइबेरिया का पेरिस' भी कहते हैं। यहां भी बहुत से रूसी कलाकार, कुलीन वंश के लोग, शिक्षाविद तत्कालीन शासक जार निकोलस के आदेश पर देश निकाले की वजह से आ गए थे। इन निर्वासित लोगों की वजह से ही आज यह नगर बुद्धिमत्ता, कला और  संस्कृति का केंद्र बन गया है।आज भी इन निर्वासित लोगों के बंगले, लकड़ी की छत और फर्श  वाले लकड़ी के  ये मकान  शहर की शोभा बढ़ाते हैं जो रूस के कंक्रीट के बने फ्लैटों से अलग और दिलकश दिखाई देते हैं। इरकुत्स्क की  खुली खूबसूरत सड़कों के किनारे यूरोपीय वास्तुशिल्प से सजी दुकानें बरबस ही ध्यान आकर्षित करती हैं।  यहां पर भी कई विश्वविद्यालय औऱ रूसी विज्ञान अकादेमी की शाखाएं हैं। इरकुत्स्क साइबेरिया की पुरानी राजधानी है। यहां के पुराने खंडहर यह बताते हैं कि इरकुत्स्क ने कई खूनी हमले झेले हैं।

इरकुत्स्क ट्रांस साइबेरियन रेल के बीचोबीच स्थित है यानी मास्को और व्लादिवोस्टोक के बीच। यहां से व्लादिवोस्टोक 4500 किलोमीटर दूर है। यहां आ कर यह भी पता चला कि साइबेरिया कहां तक फैला हुआ था। एक समय इसका कब्ज़ा अलास्का औऱ कैलिफोर्निया तक था। इरकुत्स्क में भी एक व्हाइट हाउस है जिस का निर्माण भी वाशिंगटन के वाइट हाउस के साथ ही हुआ था। इरकुत्स्क के व्हाइट हाउस का इस्तेमाल आज एक पुस्तकालय के तौर पर होता है। इरकुत्स्क में एक टैंक भी देखने को मिलता है जिसे हिटलर की हार का प्रतीक माना जाता है। एक दिलचस्प वाकया यह जानने को भी मिला कि कभी मिखाइल गोर्बाचेव इरकुत्स्क में भी काम किया करते थे। इरकुत्स्क में पुराने लकड़ी के बने मकान कतार दर कतार देखने को मिल जायेंगे। ऐसे मकानों की दीवारें, छत, फर्श सभी लकड़ी के हैं।इरकुत्स्क के मध्य में तो एक तीन सौ साल पुराना मकान भी देखने को मिला। इस तरह के मकानों का निर्माण वहां की जलवायु को ख्याल में रखकर लोग करते रहे हैं औऱ आज भी कर रहे हैं।

ट्रांस साइबेरियन रेल को देखने की स्कूल के दिनों से इच्छा थी।मुझे बताया गया कि ट्रांस साइबेरियन रेल एक ऐसा नेटवर्क है जो यूरोप औऱ एशिया को जोड़ता है। कहने को यह ट्रेन व्लादिवोस्टोक औऱ मास्को के बीच चलती है लेकिन इसके माध्यम से चीन, जापान औऱ कोरिया तक पहुंचा जा सकता है।व्लादिवोस्टोक और मास्को के बीच चलने वाली ट्रेन का नाम है 'एशिया' जो हर दूसरे दिन मास्को से चलती है। उसे व्लादिवोस्टोक पहुंचने में छह रातें लगती हैं और वह 9285 किलोमीटर का सफर तय करती है।इस ट्रेन की फर्स्ट क्लास में दो बर्थ तथा सेकंड क्लास में चार बर्थ होते हैं जिसे कूपे भी कहा जाता है। मुख्य ट्रांस साइबेरियन रेल तो मास्को और व्लादिवोस्टोक के बीच ही चलती है लेकिन1कुछ ट्रांस मंगोलियन और ट्रांस मंचूरियन ट्रेनें ऐसी हैं जो मंगोलिया और चीन को भी जाती हैं। मास्को-व्लादिवोस्टोक ट्रेन का स्टॉप इरकुत्स्क में है लिहाजा मुझे ट्रेन देखने और यात्रियों से मिलने का अवसर भी मिला। कुछ यात्रियों ने बताया कि इस आरामदायक ट्रेन के माध्यम से पूरा रूस देखा जा सकता है। इस ट्रेन में 20  से 22 डिब्बे होते हैं और सीटें गद्देदार। डिब्बे के साथ ही शावर औऱ शौच की व्यवस्था है औऱ घर जैसा ही सुख है।विदेशियों को हर नगर का वीजा लेना होता है औऱ उन्हें बीच में उतरने की अनुमति नहीं होती। चूंकि ट्रेन सुविधाजनक है इसलिए खचाखच भरी रहती है। इरकुत्स्क से मंगोलिया 600 किलोमीटर दूर है, बीजिंग 1600 किलोमीटर जबकि मास्को 5000 किलोमीटर है। मास्को से इरकुत्स्क के समय में 5 घंटे का अंतर है, जब मास्को में शाम के पांच बजे होंगे तो इरकुत्स्क में रात के दस। एक दिन मैं डिनर करने के बाद होटल ल
लौटा तो आधी रात हो गयी थी लेकिन सूरज अभी तक चमक रहा था। लिहाज़ा सोने से पहले खिड़कियों औऱ दरवाजों को अच्छी तरह से पर्दों से ढकना पड़ा ताकि सूरज की रोशनी से बचा जा सके। ऐसा है अपना साइबेरिया।

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