मंगलवार, 12 मई 2020

रवि अरोड़ा की नजर में




ये तेरा घर ये मेरा घर

रवि अरोड़ा

आज मैंने घर पर रसमलाई बनाई । वैसे मुझे खाना बनाना ज़रा सा भी नहीं आता मगर भला हो यूट्यूब का जिसने मुझ जैसे अनाड़ियों को भी थोड़ा बहुत सिखा दिया । वैसे आप भी आजकल अपने घर की रसोई में कुछ न कुछ तो तजुर्बा कर ही रहे होंगे । अजी मैं और आप ही क्या देश के तमाम पुरुष लॉकडाउन का सदुपयोग आजकल अपने घर की रसोई में कर रहे हैं । जिनकी खाना पकाने में रुचि नहीं है वे घर के अन्य कामों में हाथ बँटा रहे हैं । अपनी पत्नी को सहयोग करने की ग़रज़ से कोई कपड़े धो रहा है तो कोई बर्तन साफ़ कर रहा है । किसी ने साफ़ सफ़ाई की ज़िम्मेदारी ली है तो कोई अन्य छोटे मोटे काम कर रहा है । बेशक यह क़ोविड 19 महामारी एक हज़ार मुसीबतें ले कर आई है मगर इसकी यह सिफ़त  तो है ही कि इसने हम भारतीय पुरुषों में सहयोग की भावना तो भर ही दी है। क्या बड़ा और क्या छोटा , क्या अमीर क्या ग़रीब , क्या अफ़सर क्या व्यापारी हर कोई आजकल कोई न कोई घर का काम अवश्य कर रहा है । हालाँकि सरकारी आँकड़े कहते हैं कि इस दौरान देश में घरेलू हिंसा के मामले बढ़ गए हैं मगर पुरुषों द्वारा घर के कामों में पत्नी अथवा परिवार की अन्य महिलाओं को सहयोग कितने फ़ीसदी बढ़ा है , एसा कोई सर्वे अभी तक नहीं हुआ है ।

सदियों से भारतीय पुरुष घर के कामों को हेय दृष्टि से देखता रहा है । गाँव में कुँए पर पानी भरने वाली अथवा तालाब पर कपड़े धोने वाली महिलाओं के वर्णन से तो साहित्य भरा पड़ा है मगर पुरुषों द्वारा यह सब करने के उदाहरण आम तौर पर नहीं मिलते । न साहित्य में और न ही समाज में । कुँए पर पानी भरने वाली पनिहारियों के गीत लोक संस्कृति में ख़ूब हैं मगर कहीं कोई ‘ पनिहारा ‘ देखने सुनने में नहीं आया । ग्रामीण संस्कृति ने घरों में खाना बनाना , कपड़े धोना, घर की साफ़-सफ़ाई और आटा चक्की चलाने जैसे सभी काम महिलाओं के ही हिस्से आए। बेशक पुरुष भी खेत में जी तोड़ मेहनत करता रहा मगर चौमासे में जब वह घर तक ही महदूद हो जाता था तब भी घरेलू कामों को उसने तुच्छ ही माना और उसने हाथ बँटाना अपना अपमान समझा । धीरे धीरे गाँवों में से शहर उग आये मगर संस्कृति नहीं बदली । सदियों बाद भी शहरी पुरुष घरेलू कामों को अपने लायक़ नहीं समझता और इसे महिलाओं का क्षेत्र मानता रहा है । भला हो इस कोरोना का , जिसने समाज में कम से कम सोच का यह परिवर्तन तो दिया ही है । हालाँकि इसके पीछे छोटे परिवार और पति-पत्नी दोनो के कामकाजी होना प्रमुख कारण है मगर देखा-देखी ही सही मगर सामान्य हिंदुस्तानी भी इस दिशा में कुछ सकारात्मक तो हुआ ही है ।

मुझे एसी कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि भारतीय समाज में पौरुषता का अहंकार इतनी मामूली सी चोट से चकनाचूर हो जाएगा । बेशक यह अहंकार अपने चरम से लौट रहा है मगर उसे समभाव की ज़मीन तक पहुँचने में अभी काफ़ी वक़्त लगेगा । अब यह पौरुषता का अहंकार ही तो है आजकल प्रतिदिन एसे सैंकड़ों चुटकुले पुरुष वर्ग सोशल मीडिया पर छोड़ रहा है जिसमें घरेलू कार्यों को वह अपनी दुर्गति के रूप में परिभाषित कर रहा है । सवाल यह है कि अगर वाक़ई घरेलू कार्य कोई दुर्गति हैं तो हमें स्वीकार करना होगा कि अब तक यह दुर्गति हमने अपने परिवार की महिलाओं की करी है । सोचने का विषय यह भी है कि आज जब पूरी दुनिया में कार्य क्षेत्र को लेकर स्त्री-पुरुष का भेद मिट रहा है तब हम भारतीय पुरुष कब तक अपने पौरुषता के अहंकार के साथ जीएँगे ? यूँ भी देश में पिछले कुछ दशकों से स्त्री सशक्तिकरण की बयार चल रही है तो हम कब तक मध्ययुगीन अहंकार की संगत करेंगे ।दुआ कीजिए कि इस लॉकडाउन में ही नहीं  वरन उसकी समाप्ति के बाद भी हम भारतीय पुरुष घर के कामों में अपनी पत्नी , माँ , बहन और बेटी का हाथ यू ही बँटाते रहें और उन्हें अहसास कराते रहें कि हम उनसे सच्चा प्यार करते हैं । उन्हें बतायें कि जब घर हमारा उनका साँझा है तो उसके काम भी तो साँझे हैं । 

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