शुक्रवार, 8 मई 2020

चुनांचे /रवि अरोड़ा की नजर में





आओ थोड़ा डरें

रवि अरोड़ा

अपने परदादा को मैंने नहीं देखा मगर उनके क़िस्से कहानियाँ ख़ानदान में आज भी कही सुनी जाती हैं । उन्ही के दौर में ही तो फैली थी सदी की सबसे बड़ी महामारी प्लेग । गाँवों में बसता था उस समय का हिंदुस्तान । न पढ़ाई लिखाई और न ही आर्थिक संसाधन, ऊपर से ग़ुलामी का दौर । वायरस क्या होता है आम आदमी तो क्या वैज्ञानिक भी नहीं समझ पाए थे । सरकारी रिकार्ड बताते हैं कि सन 1860 में चीन से ही शुरू हुआ था यह प्लेग । चूहों के ज़रिये चीनी नागरिकों के शरीर में पहुँचा प्लेग और फिर पानी के जहाज़ों से आए माल के साथ हिंदुस्तान में आई यह महामारी । विभाजन से पहले की लगभग बीस-पच्चीस करोड़ की हमारी आबादी में से लगभग एक करोड़ लोग मारे गए थे इससे। रातों रात गाँव के गाँव साफ़ हो गए थे । यह वायरस भी फेफड़ों से शुरू होता था और पीड़ित के कफ से हवा में पहुँचकर दूसरे लोगों को अपनी चपेट में लेता था । लक्षण सामने आने के चौबीस घंटे में मरीज़ की इस बीमारी से मौत हो जाती थी । बेशक बाद में दुनिया ने प्लेग का इलाज ढूँढ लिया और आज इसकी वैक्सीन सहज उपलब्ध है मगर इस महामारी को दुनिया से विदा होने में लगभग सत्तर साल लग गये । ज़रा उस दौर की कल्पना कीजिए जिसमें अंग्रेज़ों को हमारे जीने मरने की कोई ख़ास परवाह ही नहीं थी । दादा जी से सुनी थी उस भयंकर दौर की कहानियाँ । पूरी तरह बर्बाद हो चुके गाँवों में परदादा जी और उनके साथियों की टोलियाँ जाती थीं और अपने मुँह पर अच्छी तरह कपड़ा लपेट कर घरों से लाशें निकालती थीं और उनका ढेर लगा कर घरों के ही लकड़ी के फ़र्नीचर में आग लगा कर सामूहिक अंतिम संस्कार करने पड़ते थे ।

हालाँकि अपना स्वभाव नहीं है मगर आज आपको डराने का मन है । डराना चाहता हूँ हालात से और उनसे मुक़ाबले की हमारी रीति-नीति से । छन छन कर बाहर आ रही केवल सरकारी ख़बरों पर मत जाइये बल्कि ख़बरों के पीछे की ख़बरों को सूँघने की कोशिश कीजिये । लॉकडाउन लम्बा चला नहीं सकते और यदि पूरी तरह हटाते हैं तो कीड़े-मकोड़े की तरह से मरेंगे हम । लॉकडाउन के समय को जिस तैयारी में सरकार को लगाना चाहिये था वह उसने नहीं लगाया है । मरीज़ों की जितनी जाँच होनी चाहिये उसके दस फ़ीसदी भी नहीं हो रहीं । पीपीई किट हैं नहीं और अस्पतालों में भर्ती मरीज़ों के पास स्वास्थ्यकर्मी जा नहीं रहे । दूर से ही तकलीफ़ का अंदाज़ा लगा कर फेंक कर दवा दी जा रही हैं । लाशों के बीच में पड़े मरीज़ों के वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब शेयर हो रहे हैं । दिल्ली जैसी जगहों पर भी लक्षण वाले मरीज़ों को घर पर ही रहने को कहा जा रहा है और एसे में उसकी मौत होने का ज़िक्र सरकारी आँकड़े में होता ही नहीं । कुल मिला कर कितने मरीज़ देश में हैं और कितने अब तक मर चुके हैं इसकी सही सही किसी के पास नहीं । यह स्थिति तो तब है जब हालात बेक़ाबू नहीं हैं । जून और जुलाई माह में स्थिति और बिगड़ेगी यह एम्स जैसे संस्थान के प्रमुख कह रहे हैं ।

लगता है अब तक आप डर चुके होंगे । यदि हाँ तो अब भी संभल जाइये । क़ोविड 19 का इलाज अभी हवा में है । बेशक रोज़ एक नया दावा सामने आ रहा है मगर उसकी सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई । वैक्सीन बनाना इतना आसान होता तो इंसान ने अब तक एड्स की भी बना ली होती जो पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा हउआ बना हुआ है । कुल मिला कर पूरी दुनिया बस एक ही नतीजे पर अभी तक पहुँची है कि कोरोना से बचाव ही उसका इलाज है और बचाव के तरीक़े बच्चे बच्चे को पता हैं मगर मुसीबत यह है कि मानता कोई नहीं । देखिये क़ुदरत ने चाहा तो सब कुछ जल्द ठीक हो जाएगा और परदादा जी के दौर जैसे दिन हमें नहीं देखने पड़ेंगे । मगर यह सब किसी क़ुदरत, किसी सरकार और किसी इलाज से ज़्यादा ख़ुद हमारे अपने हाथ में है ।

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