सोमवार, 18 मई 2020

अनंत यादों में एक मित्र गुजराल की याद / त्रिलोकदीप




जहां तक मुझे याद पड़ता है इंदर कुमार गुजराल से मेरी पहली मुलाकात टेंट कॉफी हाउस में हुई थी। सत्तर के दशक में वह कॉफी हाउस सभी संस्कृतियों का मिलन स्थल हुआ करता था। वहां आपको राजनीतिक नेता भी मिल जाएंगे, नामी गिरामी कलाकार भी, कवि , लेखक  और पत्रकार भी।


 कुछ लोग सीनियर टेबल वाले कहलाते थे तो कुछ जूनियर और upcoming। इन सब में घालमेल भी होता रहता था। इस कॉफी हाउस को शुरू करने में उस वक़्त के बेहतरीन पत्रकार ओ. पी. कोहली और इंदर वर्मा की अहम भूमिका रही लेकिन वे दोनों नेतागिरी से दूर रहे, अलबत्ता जग प्रवेश चंदर यह जिम्मेदारी निभाते रहे।

 उस कॉफी हाउस में हर कोई देखा जाता था डॉ. राम मनोहर लोहिया से लेकर चंद्रशेखर, खुशवंत सिंह, सतिंदर सिंह से लेकर अमृता प्रीतम औऱ तारा सिंह कोमल, विष्णु प्रभाकर से लेकर देवेंद्र सत्यार्थी के साथ साथ कमलेश कुमार कोहली औऱ त्रिलोक दीप जैसे रंगमंच औऱ पत्रकारिता से जुड़े लोग भी। दुआ सलाम हरेक की हरेक से कमोबेश रहा करती थी इसीलिए कुछ लोग इसे विभिन्न संस्कृतियों का संगम भी कहा करते थे। ऐसे ही माहौल में मेरी इंदर कुमार गुजराल से मुलाकातें हुआ करती थीं। अपनी मित्रमंडली में वह इंदर कहलाना पसंद करते थे, गुजराल साहब नहीं।

इसी पृष्ठभूमि के संदर्भ में 1977 में मैं मास्को में जब उनसे शिष्टाचार के नाते मैं भेंट करने के लिए गया तो मुझे किसी तरह की दिक्कत पेश नहीं आयी। बेशक़ भारत के राजदूत इंदरकुमार गुजराल अपने देश के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की राजकीय यात्रा को लेकर बहुत व्यस्त थे लेकिन मित्र इंदर ने मेरे लिए कुछ समय निकाल ही लिया। सोवियत संघ आने की वजह जानी, कहां कहां जाना है उस बाबत पूरा प्रोग्राम जाना और मुझे कुछ हिदायतों के साथ मशविरा भी दिया जो मेरे बहुत काम आया।

दिल्ली में भी इंदरकुमार गुजराल से मुलाकातों का दौर जारी रहा। उनकी व्यस्तता काफी बढ़ गयी लेकिन वक़्त ज़रूरत पड़ने पर वह उपलब्ध हो जाया करते थे। उन दिनों मुझे आकाशवाणी से देश के स्वाधीनता संग्रामियों पर एक श्रृंखला करने का दायित्व सौंपा गया। उसमें गुजराल साहब ने मेरी बहुत मदद की। इसी प्रकार जब कभी भी ज्वलंत विषयों पर हमारे मित्र माहेश्वरी जी कोई चर्चा रखते तो मुझे बहुत बुलाया करते थे। ऐसी चर्चाओं में भी गुजराल साहब से भेंट हो जाती। एक बार तो माहेश्वरी जी ने कमाल कर दिया। पंजाब में आतंकवाद पर चर्चा रखी जिस में भाग लेने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी, हरकिशन सिंह सुरजीत, इंदरकुमार गुजराल और दरबारा सिंह को बुलाया गया। इन दिग्गजों के साथ चर्चा करना सहज नहीं था लेकिन जिस तरह इन नेताओं के बीच आत्मीयता के भाव थे उसे देखकर कोई भी अभिभूत हो सकता था। अब माहेश्वरी जी हमारे बीच नहीं रहे।

दिनमान में भी हम लोग गुजराल साहब से विभिन्न विषयों पर लिखने का जब अनुरोध करते तो वह कभी मना नहीं करते थे।वह2अपनी स्क्रिप्ट उर्दू में लिख कर भेजा करते थे जिसका हिंदी रूपांतरण हमारे सहयोगी रामसेवक श्रीवास्तव कर दिया करते थे।

1988-89 में दिनमान में अतिथि संपादक की परंपरा शुरूहुई। उस कड़ी में पहले1संपादक इंदर कुमार गुजराल को बनाया गया। उनकी सलाह पर बहुत से लोगों से लिखवाया गया। उस समय वीओए के ब्यूरो चीफ रवि खन्ना ने भी अपना योगदान दिया। कई बरसों के बाद जब मैं औऱ रवि खन्ना उनके महारानी बाग निवास पर उनसे मिलने के लिए  गये तो उन्हें दिनमान के अतिथि संपादक वाला वाकया याद था औऱ उस में रवि खन्ना के योगदान का भी। तब रवि खन्ना वाशिंगटन से किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में आये थे और गुजराल साहब का उन्हें पूरा सहयोग प्राप्त हुआ। ऐस थे हमारे गुजराल साहब।


बेशक़ वह ग्यारह माह ही देश के प्रधानमंत्री रहे लेकिन उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। उनकी याद को सादर नमन।।


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