बुधवार, 27 मई 2020

जर्मनी की चुनावी यात्रा / त्रिलोकदीप




पश्चिम जर्मनी की राजधानी बोन में चुनावी प्रेस कांफ्रेंस के बाद एक जर्मन पत्रकार से बातचीत बहुत उपयोगी रही। वह भारत रह चुका था और हमारे यहां के लोकसभा चुनाव कवर भी कर चुका था। दोनों देशों के बीच की चुनावी पद्धित के अंतर की जानकारी पहले दी जा चुकी है। उस पत्रकार से बातचीत के बाद मैं ने यह तलाशने की कोशिश की क्या क्या कोई दूसरा पत्रकार भी भारत से आया। वह तो नहीं मिला किंतु जर्मन रेडियो डॉयचे वेले के राम नारायण यादव और सुभाष वोहरा दीख गये। थोड़ी दूर पर रजत अरोड़ा भी खड़े दिखाई दिये। राम नारायण यादव औऱ रजत अरोड़ा दोनों दिनमान के लिए लिखते हैं। अच्छा लगा उनसे मिलकर। सुभाष वोहरा पुराने परिचित हैं। विजय क्रांति से बाद में मुलाकात हुई। इन लोगों से भी कुछ चुनावी टिप्स लिये। इन लोगों से यह वादा भी किया कि जर्मनी छोड़ने से पहले उनसे मुलाकात होगी।रजत ने घर चलने का वचन लिया। इस मुलाकात के बाद अतिरिक्त ऊर्जा महसूस की।

अब हम पत्रकार कई हिस्सों में बंट गये। मेरे साथी बांग्लादेशी पत्रकार हो लिया और हमारी गाइड थी रोनाडा ब्लोक।बहुत ही प्रतिभाशाली और वहां की चुनावी प्रक्रिया की जानकार। उसकी शक्ल कुछ कुछ इंदिरा गांधी से मेल खाती थी।उसने बताया कि यहां का चुनाव कई तरह से होता है जैसे नुक्कड़ सभाएं, हाल में होने वाली मीटिंग्स औऱ सार्वजनिक सभाएं। रोनाडा के अनुसार ये के नेता नुक्कड़ सभाओं को अधिक तरजीह देते हैं। इन सभाओं में 50 से 100 लोग होते हैं जिनसे पार्टियों के बड़े बड़े नेता मिल कर अपनी और अपनी पार्टी के विचार रखते हैं। हमें पहले कार्नर मीटिंग्स में ले जाया गया। बहुत ही दिलचस्प नज़ारा था। किसी पार्टी के मंत्री से लोग तरह तरह के सवाल पूछ रहे थे और वादे ले रहे थे जो जीतने पर पूरे करने लाज़िमी थे। ज़्यादातर नेता अंग्रेज़ी बोलते और समझते हैं हम भी उनसे लगे हाथ प्रश्न पूछ  लेते। इस तरह इन नुक्कड़ सभाओं के चलते मेरे तो कई एक्सक्लूसिव इंटरव्यू तैयार हो गये। रोनाडा से जब मैंने पूछा कि ये नेता जो लोगों से वादे करते हैं जीतने पर उन्हें वाकई पूरा भी करते हैं कि कहत हैं कि चुनाव गये तो उसके साथ वादे भी गये। रोनाडा का उत्तर था कि नेता मुकर नहीं सकते क्योंकि वादा उस स्थान विशेष के बहुत लोगों के सामने किया गया होता है जिसे पूरा करना अनिवार्य होता है।आखिर पार्टी की साख का सवाल होता है।

बोन के अलावा हम लोगों जितने भी शहरों में गये रोनाडा ब्लोक हमारे साथ रही। इसका लाभ यह हुआ कि चुनाव कवर करने के साथ साथ उन शहरों की विशेषता भी जानते रहे। जर्मनी का हनोवर नगर औद्योगिक मेलों के आयोजन के लिये जाना जाता है। जहाजों का निर्माण भी हनोवर में होता है और राजनीतिक तौर पर भी यह महत्वपूर्ण नगर है। रोनाडा ने बताया कि यहां आज एस पी डी की सार्वजनिक सभा है जिस में पूर्व चांसलर विली ब्रांट और वर्तमान चांसलर हेल्मुट श्मिड्ट भाग ले रहे हैं। हमारे लिए यह बहुत ही बढ़िया मौका था। रोनाडा ने हम दोनों को अच्छीजगह बिठा दिया। वहां की जर्मन में होने वाली कार्यवाही को हमें वह अंग्रेजी में बताती रही। ब्रांट और श्मिड्ट के भाषणों का भी उसने सारांश बताते हुए कहा कि जिस तरह से जर्मनी की प्रगति और  विकास की दिशा में पूरी ईमानदारी के साथ उनकी पार्टी कृतसंकल्प है उसमें और बढ़ोतरी होगी। दूर से विली ब्रांट ने मुझे देख लिया और पहचान लिया। एक साल पहले जब वह दिल्ली आये थे2तब मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। आज भी बड़े तपाक से मुझे वह मिले और श्मिड्ट से भी मेरा परिचय कराया।उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस बार फिर उनकी पार्टी की विजय होने वाली है। उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई। बेशक़ ब्रांट को मैं जर्मनी का शिखर और श्लाघा पुरुष मानता हूं।

हनोवर के बाद हम लोग हैम्बर्ग गये। यह सुंदर शहर अपनी बंदरगाहों, अनेकानेक पुलों और ऑटोबान के लिए प्रसिद्ध है।यहां की ऑटोबान व्यवस्था को देखने के लिए दुनिया भर से न सिर्फ सैलानी ही आते हैं बल्कि परिवहन के क्षेत्रों में रुचि रखने वाले मंत्री और विशेषज्ञों की टोलियां भी। ऑटोबान ने केवल हैम्बर्ग की ही नहीं पूरे  यूरोप की यातायात व्यवस्था संतुलित कर रखी है। अलावा इसके यह शहर अपनी रंगीली रातों के लिए भी जाना जाता है। यहां का रिपेबन रंगीन मिज़ाज़ लोगों से भरा रहता है। रोनाडा ने कहा कि आप चाहें तो एक चक्कर लगा आयें मैं बाहर का इंतज़ार करूंगी। रस्मअदायगी के तौर पर रिपेबन को देखने के बाद बाहर आकर रोनाडा के साथ हो लिये। यह भी बताया गया कि लंदन औऱ पेरिस जैसे सारी रात जागने वाले नगरों में हैम्बर्ग भी शामिल हो गया है।राजनीतिक तौर पर भी हैम्बर्ग जागरूक और महत्वपूर्ण नगर है और चांसलर श्मिड्ट यहां से ही चुनाव जीतते आये हैं। उस1सार्वजनिक सभा के अतिरिक्त कुछ नुक्कड़ सभाएं भी देखीं जो बोन जैसी ही दीखीं।
जर्मनी अपने विश्वविख्यात विश्विद्यालयों के लिए भी ख्यात है। यहां के कोलोन और हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय जग प्रसिद्ध हैं। भारतीय संस्कृति और साहित्य के बारे में ये विश्विद्यालय अक्सर चर्चित रहे हैं। यहां मुझे हिंदी के विद्धवान मयान मिले जिन्होंने बताया कि हिंदी के साहित्यकार सच्चिदानंद वात्स्यायन कई बार विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर इस विश्वविद्यालय में आ चुके हैं। यह भी पता चला कि हिंदी और बांग्ला के जर्मन विद्वान लौठार लुत्से वात्स्यायन जी के अनन्य मित्रों में हैं और दोनों का एक दूसरे के देश में आना जाना लगा रहता है। यहां पर एक विशाल हाल में चुनावी सभा हुई सी डी यू की। वहां लोगों को व्यवस्थित तरीके से बिठाया गया। नेताओं ने आकर अपनी पार्टी औऱ उम्मीदवार की खूबियों का बखान किया।तालियां बजीं। कुछ उत्साही लोगों ने मेरा भी स्वागत किया। 40 बरस पहले शायद वहां कोई सिख नहीं पहुंचा था।
पश्चिम बर्लिन की चुनावी रौनक देखने के बाद मैं पूर्व बर्लिन भी गया।जर्मन दीवार पार करने के बाद मैं पूर्व जर्मनी की राजधानी पूर्व बर्लिन में प्रवेश कर गया। घंटे भर चहलकदमी करने के बाद मुझे कुछ ऐसी खुशहाली या जगमग दिखाई नहीं दी जो पश्चिम बर्लिन के जोड़ की हो।वहां सन्नाटा पसरा हुआ ही नज़र आया। दोनों भागों की शासन प्रणाली और लोगों के चेहरों के हावभाव से दोनों ओर के फ़र्क़ को महसूसा जा सकता था। लौटने पर मेरी बर्लिन वाली गाइड ने शरारती अंदाज़ में पूछा, कहो कैसा लगा हमारा बिछुड़ा भाई।

बहुत ही मज़ेदार रही पश्चिम जर्मनी की यह चुनावी यात्रा। जीत एस पी डी की हुई। श्मिड्ट पुनः चांसलर बने। एफ डी पी के साथ
गठबंधन सरकार। दिल्ली में जर्मनी के उपराजदूत रहे जॉन वेगनर से बोन में मुलाकात हुई। उनके घर भी गया। बहुत स्वागत सत्कार हुआ। रजत अरोड़ा के घर भी गया। उनकी जर्मन पत्नी औऱ दो बच्चों से भी मिला। एक औऱ यादगार मुलाकात। रेडियो जर्मन भी गया। विजय क्रांति और सुभाष वोहरा के साथ उनके जर्मन बॉस भी मिले। यात्रा के बारे और जर्मन जीवन शैली पर कुछ रिकॉर्ड कराया। वहां पर आपको एक मशीन के सामने बिठा दिया जाता है। उसमें सारी व्यवस्था होती है कि कैसे अपनी गलती कैसे ठीक करनी है। बाहर शीशे के बाहर आपको इशारे देने वाला कोई  व्यक्ति नहीं मिलेगा।

अगले दिन मैं लंदन के लिए रवाना हो गया। पहली बार मैं अकेला वहां गया था। हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतर कर इमीग्रेशन की राष्ट्रकुल वाली लाइन में मैं खड़ा हो गया।मैं दिल्ली से वीज़ा लेकर नहीं गया था। तब राष्ट्रकुल देशों के लिए वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होती थी। इमीग्रेशन अधिकारी ने मुस्कराते हुए स्वागत किया और मेरे पासपोर्ट पर एक मोहर लगा दी जिसके अनुसार मुझे  6 माह तक वहां रुकने की इजाज़त थी। 1975 से लेकर 1983 तक मैं जितनी बार भी लंदन गया बिना वीज़ा के ही गया। ब्रिटेन की अपनी पांच यात्राओं पर फिर कभी।

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