शुक्रवार, 22 मई 2020

विवेक शुक्ला की नजर में दिल्ली - नयी दिल्ली






Navbharatimes /22052020

सांई का सिंधी पान

विवेक शुक्ला


जरा सोचिए कि इस लॉकडाउन काल में मनपसंद पान ना मिलने से पान के कद्रदानों पर क्या गुजर रही होगी। सभी पान वालों के अपने-अपने चाहने वाले हैं। दिल्ली में सिंधी पनवाड़ियों का भी अपना एक संप्रदाय है। जो एक बार इसका सदस्य बना तो फिर बाहर नहीं निकला। दिल्ली को सिंधी पान से रु-ब-रु करवाने का श्रेय टीकमचंद ललवानी को जाता है। देश बंटा तो ललवानी अपने शहर कराची  से दिल्ली आ गए। डेढ-दो साल दिल्ली की खाक छानने के बाद उन्होंने दरियागंज मेन रोड पर अपनी पान की दूकान खोली। वह दिल्ली में किसी सिंधी पनवाड़ी की पहली दूकान थी। उनके सादी पत्ती,किमाम और मीठे पान के शैदाई बनने और बढ़ने लगे।

ललवानी पान में डलने वाली सामग्री जैसे छव्वारा, सौंफ,सुपारी खुद बाजार से खरीद के लाते। उसकी क्लाविटी से कभी समझौता नहीं करते। ललवानी के पान को खाने और बीड़ा बंधवाने वालों को विस्तार होता गया। ललवानी की सफलता से प्रेरित हुए दिल्ली में हैदराबाद सिंध, लरकाना ( बेनजीर भुट्टो का शहर), मीरपुर खास जैसे शहरों से आए बहुत से नौजवानों ने राजेन्द्र नगर,आर.के.पुरम, मिन्टो रोड, पंजाबी बाग,ग्रेटर कैलाश वगैरह में अपने ठिये लगाने चालू कर दिए। सब ने अपनी जगह बनाई।
सिंधी पान की एकबात से दिल्ली हैरान रही कि इसको खाने के बाद मुंह लाल नहीं होता। पीक करने की भी नौबत नहीं आती। सिंधी पनवाड़ियों को बतरस में भरपूर आनंद आता है। ये अपने ग्राहकों से देश-दुनिया के मसलों पर लंबी करना पंसद करते हैं। इनसे शेयर बाजार की हलचल से लेकर अमेरिका के आगामी चुनावों पर विस्तार से बात कीजिए। यानी आप साईं से पान खाने जा रहे हैं तो फुर्सत से जाइये। वह आप से गप करेगा। आपके दिल में जगह बना लेगा। पर इन्हें खल जाता है जब इनका कोई पुराना चाहने वाला इनसे कहता है ‘ साई,मेरा फलां तरह का पान बनेगा।’ ये सुनते ही इनके मुंह से निकल जाता है- ‘साईं, अब ये आपको बताना पडेगा। आपने हमें पहचाना ही नहीं’।
 इसलिए इनके पास जाकर खड़े हो जाइये। आपका काम हो कायदे से होगा। पर जल्दी से बचें। कुछ सिंधी पनवाड़ी दावा करते हैं कि उनके चूने से किसी की जीभ कट नहीं सकती। वे उसमें मक्खन मिलाते हैं। चूंकि सिंधी के खून में बिजनेस करना और आगे बढ़ना है, इसलिए सिंधी पनवाड़ी दाल-रोटी कमाकर    संतुष्ट नहीं हुए। ये आगे बढ़ने की निरंतर योजनाएं बनाते रहते । दिल्ली में कई सिंधियों ने अपने पान पार्लर तक खोले। ललवानी की बेटी किरण ने पंजाबी बाग में पान पार्लर खोला।
कुछ पान मसाला के बिजनेस में आए। वहां इन्होंने मोटा पैसा कमाया। लेकिन इन्होंने अपनी पहली दूकान को नहीं छोड़ा। कहते हैं कि सांई अपनी जड़ों और सिंधी कढ़ी को नहीं भूलते। सिंधी कढ़ी का स्वाद दिव्य होता है। कभी अपने किसी सिंधी मित्र से बोलिए, साईं सिंधी कढ़ी खिलवा दो। यकीन मानिए वह आपको दुबारा याद दिलाने का मौका नहीं देगा। अब कोरोना जाए तो खाएं साईं का पान भी। समाप्त।

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