रविवार, 10 मई 2020

मृत्युदंड का कैसा शोक / यशवंत सिंह




एक बड़े भाई ने पूछा- आप शोक नहीं मना रहे?

हमने कहा- उस (मृत्यु) का क्या शोक मनाना जिसके रास्ते हम सब बारी बारी कदम दर कदम बढ़े चले जा रहे!

फूफाजी ऐसे इंसान थे जो सरल सहज सुंदर सुडौल सेंसटिव लॉयल जैसे शब्दों के रोल मॉडल थे। कोई बुराई ऐब सतहीपना उन्हें छू न सका था। ममता संवेदनशीलता इतनी कि उनके बेहद गरीब मरीज उनका पैर छूकर उन्हें प्रणाम करके चले जाते बिना फीस दिए और तब वे हंसकर कहते- अगर खाना टाइम से पूरा नहीं खाए और नशा ये सब न छोड़े तो फिर प्रणाम करने आना पड़ेगा!

वो निःशब्द लोगों के चिकित्सक थे। वे बिगड़ैल गरीबों के भगवान थे।

हम जब भी ग़ाज़ीपुर जाते, फुआ फुफ्फ़ा से ज़रूर मिल आते।

स्कूटी से नोएडा यात्रा के वक़्त मेरा पहला पड़ाव फुआ का घर था जहां फुफ्फ़ा क्लीनिक में मरीज देखते मिले।

स्कूटी से जाने की ज़िद के आगे फुआ की सलाह अनसुनी कर दी तो फुफ्फ़ा ने फुआ की तरफ देखते हुए कहा था- ई केहू क मनले हउवन कि तोहार मनीहन!

मेरे पिताजी फूफाजी से उम्र में बड़े होंगे या हमउम्र होंगे। फौज में रहे। जल्दी रिटायर होकर आए तो कोई नशा छोड़ा नहीं। अब भी ध्यान से डेली गांजा शराब मारते हैं और जब मैँ गांव पहुंचता हूँ तो उनके जश्न में शरीक़ हो जाता हूँ।

पिताजी की शाम खुद की होती है, मस्ती की होती है, नशे की होती है। बाकी पूरा दिन वो परिश्रम करते हैं। गाय गोबर खेत खलिहान खाद बीज पेंशन गांव शहर... वे सब कुछ में डूबे रहते हैं पूरी तल्लीनता के साथ पूरी मस्ती के साथ।

वो 67-68 साल की उम्र में भी मुझे अपने खुद के कोच लगते हैं जो हर बार मुझे बैठे लेटे सोए देखकर कहते हैं कि- चला करो दौड़ा करो भागा करो... कुछ परिश्रम (शारीरिक) कर लिया करो। ई शरीरवा तब्बे बचल रही!

फुफ्फ़ा कुर्सीजीवी थे। दिन भर मरीज देखना। रात में सोना। डॉक्टर के पेशे और गृहस्थ जीवन के बीच बस एक एक फार्मूला ही जीते थे- मरीज देखो और सो जाओ!

जीवन का कोई फॉर्मूला नहीं।
मृत्यु का कोई जड़तोड़ नहीं।

इसलिए किस बात का शोक!

एक शानदार मनुष्य शानदार तरीके से चला गया नई यात्रा पर!

इसके लिए शोक कम से कम मैं नहीं मना सकता!



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