मंगलवार, 19 मई 2020

सेमिनार के संयोग से पाक जाने की सोंधी यादें बातें / त्रिलोकदीप




1990 में पाकिस्तान जाने का मौका मिला।संडे मेल के मालिक संजय डालमिया भारत और पाकितान में गैरराजनीतिक तौर पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करना चाहते थे ताकि दोनों देशों के लोगों के बीच भाईचारे की भावना को विकसित किया जा सके। मुझे पाकिस्तान के कुछ शहरों में जाकर ऐसे गैरराजनीतिकों की तलाश करनी थी जो संजय डालमिया की इस सोच के हिमायती हों। इस सिलसिले में मैंने लाहौर, इस्लामाबाद, रावलपिंडी, पेशावर, कराची आदि नगरों का दौरा कर पाया कि वहां ऐसी सोच वाले तो बहुत नामचीन लोग हैं। ऐसे ही लोगों में एक प्रोफेसर ख्वाजा मसूद से इस्लामाबाद में मिला जो भूतपूर्व कुलपति थे। उन्होंने बड़ी गर्मजोशी के साथ मेरा स्वागत किया और प्रस्ताव सुनते ही उनका चेहरा खिल उठा।

प्रोफेसर मसूद अपने अध्ययन और खुले विचारों के लिए पाकिस्तान भर में जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी खुशी की वजह बताते हुए कहा कि बलराज साहनी औऱ उनका भाई भीष्म साहनी मेरे बहुत अज़ीज़ दोस्त हैं। भीष्म के साथ खतो किताबत तो होती रहती है लेकिन मिलने में कई दुश्वारियां पेश आती हैं। आपने इस बेहतरीन सेमिनार की बात करके मेरी यह मुश्किल हल कर दी। प्रोफ़ेसर मसूद बोले जा रहे थे कि वह और भीष्म साहनी मिलकर 'लोटस' नाम की एक पत्रिका निकाला करते थे जिस में वैचारिक लेख छपा करते थे। भीष्म जी के अलावा उन्होंने बी डी चोपड़ा, गुरुबख्श सिंह और विश्वनाथ सहगल को भी याद किया। प्रोफेसर मसूद ने यह बात भी साफ कर दी कि मेरी मित्रमंडली में वामपंथी विचारधारा के लोग ज़्यादा थे  लेकिन मैं उन्हें खुली और ठोस सोच का शख्स मानता रहा हूं।दिल्ली लौटने पर मैंने भीष्म जी को प्रोफेस मसूद का सलाम अर्ज़ कर दिया। अब दोनों ये दोस्त हमारे सेमिनार में मिलने का इंतज़ार करने लगे। नवंबर 1991 को सेमिनार हुआ, भीष्म जी ने शिरकत की लेकिन एक दिन पहले ही प्रोफेसर मसूद का फोन आ गया कि उनकी बेगम को दिल का दौरा पड़ने से न चाहते हुए भी उन्हें इस सेमिनार में गैरहाज़िर होना पड़ेगा। इस खबर से भीष्म जी भी मायूस हो गये।

भीष्म जी को मैं पहले से भी जानता था लेकिन बज़रिया प्रोफेसर मसूद हमारी दोस्ती और पक्की होती चली गयी। उनसे मिलने के लिए मैं उनके ईस्ट पटेल नगर के घर भी जाया करता था। संजय डालमिया की तरफ से चलाए जाने वाले मंदबुद्धि के  बच्चों के स्कूल'मासूम' में श्रीमती नफीस खान अक्सर उन्हें  बुलाया करती थीं। भीष्म जी भी उन बच्चों से घुलमिल कर उनकी पढ़ाई लिखाई, चित्रकला, संगीत आदि में खूब रुचि लिया करते थे। वाशिंगटन से वॉइस ऑफ अमेरिका के रवि खन्ना जब किसी विषय पर भीष्म जी का  इंटरव्यू लेने के लिए आये तो मैं भी उनके साथ हो लिया। रवि खन्ना को मैं  1979 में वाशिंगटन में मिला था, तभी से हमारी दोस्ती है।  आज भी बैठे बैठे भीष्म जी की याद हो आती है। आपको भूल पाना मुश्किल है भीष्म जी। सादर नमन।

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