गुरुवार, 21 मई 2020

बेकल झील के लिए मन की अबूझ बेकली / त्रिलोकदीप




इरकुत्स्क पहुंचने के बाद अगर बेकल झील को नहीं देखा तो साइबेरिया की यात्रा अधूरी रह जायेगी।मॉस्को प्रस्थान करने से पहले एक सुबह दुनिया की सबसे पुरानी इस झील को देखने का मन बनाया।

 बेकल झील साइबेरिया के दक्षिण पूर्व में स्थित है जो करीब ढाई करोड़ साल पुरानी बताई जाती है।इस झील की गहराई 1637 मीटर है जबकि लंबाई 635 किलोमीटर और चौड़ाई 80 किलोमीटर है।इसे दुनिया की दूसरी सब से लंबी झील माना जाता है, पहले स्थान पर कैस्पियन झील है। कुछ लोग तो इसे झील नहीं पूरे का पूरा समुद्र मानते हैं। यह झील जंगल और पहाड़ों से घिरी हुई है और 800 मीटर की ऊंचाई पर खड़े होकर देखने से इस झील की खूबसूरती देखते ही बनती है।

 जंगल को यहां टैगा कहते हैं। माना जाता है कि कभी यहां बौद्ध अनुयायियों का खासा जमावड़ा हुआ करता था। झील के पास की एक चट्टान पर सफेद पत्थर है जिसे बौद्ध बहुत पवित्र मानते हैं।

 जापानी तो उस पत्थर के आसपास धागे, रिबन और कपड़े बांध कर मनौती मांगते हैं। शायद यही कारण है इस झील को देखने आने वालों में जापानी, चीनी और मंगोलियन सैलानी अधिक होते हैं। जापानी सैलानी रेल, जहाज या चार्टर्ड विमानों से भी आते हैं।

बेकल विश्व की सब से स्वच्छ और निर्मल जल वाली झील है जो रूस की अस्सी फीसदी ज़रूरतों की पूर्ति करती है। इस झील के पानी को बिना छाने या साफ किये बेधड़क पिया जा सकता है। इस पानी में इतने खनिज मिले होते हैं जिससे मनुष्य की कई बीमारियां दूर होती हैं। यहां तक कि यूनेस्को ने बेकल झील के पानी के कई परीक्षण करने के बाद पाया कि इस झील का जल दुनिया का सब से स्वच्छ और स्वस्थ जल है।

बेकल के जल में 2500 प्रकार के पौधे और जानवर ऐसे हैं जिन्हें प्राचीन काल का माना जाता है। कुछ खोजी और अनुसंधानकर्ता इन पौधों और जानवरों को दो करोड़ बरस पुराना मानते हैं। इन पुरानो  के साथ नये प्रकार के पौधों और वनस्पतियों को भी उन में अपने आपको खपाने का मौका मिल जाता है। भूमि का कटाव न के बराबर है लिहाज़ा बेकल की खूबसूरती बरकरार रहती है और उसका बहाव निर्विघ्न और सामान्य बना रहता है।

इस बेकल झील की खूबसूरती की वजह यहां की जलवायु भी है जिसे सुकून भरा माना जाता है। झील के आसपास जंगल और पहाड़ों की भरमार से यहां का वातावरण सुखद और शीतल रहता है। यही बड़ी वजह है कि सैलानी इरकुत्स्क की ओर आकर्षित होते हैं। यह झील खनिज पदार्थों का भी भंडार है जैसे तांबा, सोना, निकेल के साथ साथ यहां के पहाड़ों का सफेद मार्बल भी बहुत1प्रसिद्ध है।जब सफेद पहाड़ों का प्रतिरूप झील के पानी पर पड़ता है तो उसमें चंद्रमा का प्रतिबिंब दिखाई देने का भ्रम और एहसास दोनों होते हैं। इस दृश्य को देखने औऱ अपने कैमरो में कैद करने के लिए पर्यटक दूर दूर से आते हैं।

जहां बेकल झील में प्राचीन पौधों और जानवरों की असंख्य किस्में हैं वहीं 50 हज़ार जानवर हर साल इसमें जुड़ते हैं, ऐसी जानकारी दी गयी। इस झील में विश्वप्रसिद्ध मछलियां भी पायी जाती हैं जैसे ट्राउट, छुलिन, हैरियर, साइबेरिया की फोका, सालमन सहित तीन सौ किस्म की मछलियां हैं।

कभी कभी तो इस झील से 120 किलोग्राम तक की मछली भी मिल जाती है। ये सभी ताज़ा और स्वच्छ पानी की मछलियां हैं। कमाल की बात यह है कि बेकल झील में तमाम तरह के पौधों, जानवरों औऱ मछलियों के बावजूद यहां का पानी साफ और निर्मल रहता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ये सभी जीव जंतु, पेड़ पौधे पानी को साफ रखने का काम करते हैं और उसे किसी तरह से गंदा नहीं होने देते।अलावा इसके इंसानी नज़रें भी बहुत सतर्क व चौकस रहती हैं।

बेकल के आसपास पक्षियों का भी बसेरा है। एक अनुमान के अनुसार सवा तीन सौ पक्षी यहां आते जाते रहते हैं । कई ऐसे पक्षी भी होते हैं जो सर्दियों में बेकल झील  के किनारे ही आ कर रहना ही पसन्द करते हैं क्योंकि यहां की स्वस्थ जलवायु के अलावा सुरक्षा अधिक है। एक तो यहां के पानी में मिठास, दूसरे पहाड़ों औऱ जंगलों का आगोश और तीसरे आपसी चहचहाहट उन्हें सुकून का अहसास कराती है।

बेकल झील के पास शमौन पत्थरों की कहानी भी सुनने को मिली।इन पत्थरों को झांवा अर्थात होली स्टोन भी कहा जाता है। इस बाबत यह किस्सा सुनने को मिला कि सोवियत क्रांति से पहले अपराधियों को बेकल किनारे लाया जाता थाऔऱ उन्हें बेकल की कीर्ति के बारे में जानकार देकर उन्हें सुधरने का एक अवसर दिया जाता। इसका असर भी होता।

 काफी लोग सुधर कर सामान्य जीवन की ओर लौट भी जाते और सज़ा से बच जाते। अलावा इसके एक दूसरी कथा के अनुसार इन शमौन पत्थरों के पास एक पवित्र आत्मा रहती थी। कुछ लोग उसे पादरी भी कहते हैं। वह अपराधियों के लिए प्रार्थना करता और एक रात इन पत्थरों के बीच उन्हें गुजारने को कहा जाता।अगले दिन अपराधियों के जुर्म के बारे में जब पूछा जाता तो उनके मुंह से सच ही निकलता।

 जो अपना जुर्म कबूल करता उसे सजा दी जाती और जो अपने आप को बेगुनाह बताता उसे छोड़ दिया जाता।कहा जाता है कि इन पत्थरों में ऐसी चुम्बकीय शक्ति है जो मनुष्य के भीतर तक उसे झकझोरती है। आज भी बेकल झील के किनारे के इन पत्थरों को लोग अपने अपने तरीके से पूजते हैं। ये आराध्या माने जाते हैं।

इरकुत्स्क में एक मस्जिद और एक सिनागोग भी है और वे दोनों धार्मिक स्थान कार्यरत हैं। यहां दस हज़ार तातारी औऱ बीस हज़ार यहूदी रहते हैं। तुर्कों की तरह तातारी लोगों की भाषा है और वे लोग अपने आप को तातार वंशज का कहलाते हैं।

 यह भी पता चला कि यहां से बीस यहूदी इजराइल गये थे लेकिन वहां का माहौल और जीवनशैली उन्हें पसंद नहीं आई और उन्होंने फिर वापसी की अनुमति मांग ली। लगता है उन्हें बेकल छोड़ कर जाना गवारा नहीं था या यह भी हो सकता है कि बेकल की शक्ति उन्हें वापस खींच लाई हो।

इरकुत्स्क को विभिन्न संस्कृतियों का संगम माना जाता है। यहां करीब पांच सौ चीनी रहते हैं और एक हज़ार कोरियाई, जापानियों की संख्या भी खासी बताई गयी। साइबेरिया में बड़े अधिकार से यह दावा किया जाता है कि जितने संसाधन इस क्षेत्र में भरे पड़े हैं यदि उनका पूरी  तरह से दोहन हो तो विश्व में कहीं भी गुरबत दिखाई न दे।

बेकल झील खुद बेशकीमती खनिजों का भंडार है यह तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सिद्ध हुआ माना जाता है।।।

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