रविवार, 17 मई 2020

पत्रकारिता को यह सब भी झेलना होगा?





पत्रकारिता का कठिन समय

 मनोज कुमार

यह समय पत्राकारिता के लिए सबसे कठिन समय है. वैसे तो पत्राकारिता का समय बीत चुका है जो कुछ है, वह कठिन ही है. ऐसा भी नहीं है कि यह अभी और आज की बात है. स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हौले हौले पत्रकारिता के तेवर ढीले पड़ते गए हैं. आज के दौर में यह तेवर तासीर में बदल चुका है. जो जितना मलाईदार बातें करेगा, वह उतना ही कामयाब दिखेगा. हमारी धारणा है कि पत्राकारिता हाशिये पर है और मीडिया का वर्चस्व है. दोनों की नैतिक बुनियाद एक-दूसरे के विपरीत है. पत्राकारिता का धर्म आइना दिखाने से है और मीडिया उस आइने में दूसरे को चमकाता हुआ दिखाता है. हालांकि मीडिया में ऐसे लोग कामयाब जरूर दिखते हैं लेकिन समाज का उन पर विश्वास नहीं होता है. इस कठिन समय में हम और आप एक बार फिर हिन्दी पत्राकारिता दिवस मनाने जा रहे हैं. हम गर्व कर सकते हैं कि तमाम किस्म की तकलीफों के बाद भी हिन्दुस्तान के अवाम की आवाज आज भी हिन्दी पत्राकारिता ही है. हिन्दी प्रकाशनों को पढ़ने और समझने वालों की संख्या हिन्दुस्तान की आबादी में सर्वाधिक है. यह इस बात का प्रमाण है कि अपने ढाई सौ साल के सफर में अपना विश्वास खोया नहीं है बल्कि पाया ही है. इस कठिन समय में इस अर्जित विश्वास को बचाये और बनाये रखने की बड़ी जवाबदारी है. जिस कठिन समय की हम चर्चा कर रहे हैं उसमें सत्ता की हमसे अपेक्षा है कि हम उनकी आंखों से देखें, उनकी जुबान बोलें. जो इसके खिलाफ गया या जाने का दुस्साहस किया, वह सत्ता की आंखों की किरकिरी बन जाता है.
इस समय कोरोना की वैश्विक महामारी से आप और हम सब जूझ रहे हैं. यह कहना नाकाफी है कि सरकारें अपना दायित्व पूरा नहीं कर रही हैं. लेकिन इस बात को कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि जो अपेक्षा सरकार से होती है, वह अपूर्ण है. अपने ही देश के अलग अलग राज्यों में कमाने-खाने गए कामगारों की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है. भूखे-अधनंगे पांव घर लौटते जाने कितने कामगारों की सांसें रास्ते में ही टूट रही हैं. आंखों को नम कर देने वाली खबरें सरकार को हिला रही हैं और इसी के चलते कलम पर कमान तन रही है. सरकारें अपनी नाकामी छिपाना चाहती हैं. ऐसा पहले भी होता रहा है और आगे भी होगा लेकिन पत्राकार सामाजिक सैनिक है और बेखौफ अपने काम को अंजाम दे रहा है. सरकार और सत्ता का दमन वैसे ही पुराना है, जैसे अखबार मालिकों का. जब काम के अवसर कम हो रहे हैं, पत्राकारों को बेकार किया जा रहा है. वेतन-भत्ते कम कर दिए गए हैं. सबके पास ही एक ही गीत है हम घाटे में हैं. अखबारों में वेतन वैसे भी इतना नहीं है कि एक पत्राकार अपनी जिंदगी बसर कर सके. वेतन आयोग फाइलों में दर्ज है. सरकारों के फरमान से अखबार मालिक बेखौफ हैं. उन्हें पता है कि उनका कुछ बिगाड़ नहीं होने वाला है. पत्राकारों की मदद के लिए ना तो सरकार आगे आ रही है और ना पत्राकारों के संगठन. उनसे सहायता की उम्मीद भी बेमानी है. यह समय गुजर जाएगा. यह तो तय है. तय तो यह भी है कि ऐसे कठिन समय पत्राकारों के तेवर को और तेज करते हैं.
शोध पत्रिका ‘समागम’ इन्हीं संकटों को लेकर इस बार हिन्दी पत्राकारिता दिवस पर उन सुधि पत्राकारों के लेखों के माध्यम से चिंतन करने की कोशिश की है. शोध पत्रिका ‘समागम’ के सतत प्रकाशन में यह पहला समय आया है जब लॉकडाउन के चलते प्रिंटिंग प्रेस बंद होने के कारण संयुक्तांक प्रकाशित करने के लिए विवश होना पड़ा है. संकट हमारे साथ भी है लेकिन हौसला रखना होगा. उम्मीद का दामन पकड़े रहेंगे तो कोरोना और अन्य संकटों से हम निपट सकेंगे.  हम प्रशंसा करते हैं डॉक्टर, नर्स, स्वच्छता कर्मचारी, पुलिस जिस तरह से कार्य कर रही है, उनके बेहतर कार्यों को हम समाज तक पहुंचा रहे हैं. समाज को हमारी जरूरत है. और हम और आप कभी अपने दायित्व से पलायन नहीं करेंगे. इस बार हिन्दी पत्राकारिता दिवस सही अर्थों में सार्थक हुआ है. आज दादा माखनलाल और पराड़करजी जैसी पत्राकारिता की महान आत्मा हमें अपना आशीर्वाद दे रहे होंगे क्योंकि उन्होंने पत्राकारिता का जो धर्म बताया था, आज हम उस पत्राकारिता धर्म को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं.
-सम्पादक

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