शुक्रवार, 22 मई 2020

घातक है सुरक्षा बलों की आत्मघाती प्रवृत्ति



Haribhoomi

 सुरक्षा बलों के जवानों को खुदखुशी करने से रोको


अभी कुछ दिन पहले एक खबर जम्मू-कश्मीर से आई थी कि केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के राज्य में तैनात दो जवानों ने क्रमश: अनंतनाग और अकूरा में खुदखुशी कर ली है। ये जवान राजस्थान और उत्तराखंड से थे। जब हर तरफ कोरोना वायरस से जुड़ी खबरें छप रही हों तब सीआरपीएफ के दो जवानों के अपनी जीवनलीला को समाप्त कर लेने संबंधी खबर को किसी भी स्तर पर प्रमुखता नहीं मिली।

पर मामला तो बेहद गंभीर है। इसकी अनदेखी करना सही नहीं होगा। दरअसल बात ये है कि केनद्रीय सुरक्षा बलों के जवान लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं। केन्द्रीय सुरक्षा बलों से मतलब केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ),
सीमा सुरक्षा बल ( बीएसएफ),  भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल  ( सीआईएसएफ), असम राइफल्स वगैरह से है। इनसे जुड़े जवानों का अपनी जान  लेने का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है। सरकार ने 22 मई 2018 को संसद में बताया था  विगत छह सालों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों के करीब 700 जवानों ने आत्महत्या कर ली। महत्वपूर्ण ये है कि इसी समय के दौरान इतने अधिक जवान तो अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हुए शहीद नहीं हुए। ये जानकारी केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने एक संसदीय समिति को दी थी। उस समिति के अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी थे।

आखिर क्यों सुरक्षा बलों के जवान जान दे रहे है?इसकी वजह मोटा-मोटी ये बताई गई थी कि अपने घरों से दूर अकेलेपन, पारिवारिक कलह और जीवन में अस्थिरता के कारण ये जवान मौत को गले  लगा लेते हैं। तब गृह सचिव ने संसदीय समिति को बताया था- “ अपने घरों से 10-11 माह तक दूर रहने के कारण बहुत से जवानों के परिवारों में कलह-क्लेश और परस्पर शक की भावनाएं पैदा होने लगती है। ये भी आत्महत्याका कारण बनती है।”
गृह मंत्रालय के अनुसार, साल 2012 में सीआरपीएफ के 189 जवानों ने आत्महत्या की। उस दौरान इसके 175 जवान देश के दुश्मनों से लडते हुए शहीद हुए। आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सीआरपीएफ देश के केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में सबसे बड़ा है। वर्तमान में सीआरपीएफ के जवान माओवादियों से लेकर जम्मू-कश्मीर में देश के शत्रुओं को धूल चटा रहे हैं। देश को आजादी मिलने के बाद 28 दिसंबर 1949 को सीआरपीएफ अधिनियम के लागू होने पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का गठन हुआ था।
अगर बात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की करें तो उसके 2001 के बाद 529 जवानों ने आत्म हत्या की। जबकि इसी समय के दौरान बीएसएफ के 491 जवान शहीद हुए थे। इधर भी आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा बहुत अधिक है। इस बीच, 1965 में गठित सीमा सुरक्षा बल को विश्व का सबसे बड़ा सीमा रक्षक बल माना जाता है। इसके जवान
 देश की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं  की निगाहेबानी करते हैं। इन सरहदों में दुर्गम रेगिस्तान, नदी-घाटियां और हिमाच्छादित प्रदेश शामिल है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के 62 जवानों ने 2006 के बाद  अपने खुद की जीवन लीला समाप्त कर ली। जबकि 16  रणभूमि में लड़ते हुए शहीद हो गए। आईटीबीपी  की स्थापना 24 अक्टूबर 1962 में  गई थी। ये बल  काराकोरम दर्रा से लिपुलेख दर्रा और भारत-नेपाल-चीन त्रिसंगम तक 2115 कि॰मी॰ की लंबाई पर फैली सीमा की रक्षा करता है।
 और अब बात दिल्ली मेट्रो की भी सुरक्षा करनेवाली केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की। 1969 में गठित सीआईएसएफ के 63 जवानों ने 2013 के बाद आत्म हत्या की। हालाकिं उसका एक ही जवान इस दौरान शहीद हुआ। सीआईएसएफ का मुख्य कार्य सरकारी कारखानो एवं अन्य सरकारी उपक्रमों को सुरक्षा प्रदान करना है। इसके जवान  परमाणु संस्थान, ऐतिहासिक धरोहरों आदि की भी सुरक्षा करते हैं। असम राइफल्स के 27 जवानों ने 2014 के बाद जान दी और उसके 33 जवान शत्रुओं से लड़ते हुए शहीद हुए। निश्चित रूप से असम राइफल्स भी भारत का अति महत्वपूर्ण अर्धसैनिक बल है।  ये देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र की आंतरिक सुरक्षा और भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा  पर नजर रखतीहै। अंत में बात श्रेष्ठ सीमा बल ( एसएसबी) की भी कर लेना जरूरी है। उसके 32 जवानों ने 2013 के बाद से खुदखुशी की। इस दौरान उसके चार जवान शहीद हुए।
मतलब सभी अर्धसैनिक बलों के जवान आत्महत्या करते रहे हैं।एक बात ये भी पता चली है कि उपर्युक्त बलों के जवानों पर काम का बोझ और दबाव सदैव बना रहता है। इन्हें बड़ी ही मुश्किल से छुट्टी मिल पाती है।सीआरपीएफ,बीएसएफ और आईटीबीपी के जवानों को असम से केरल और केरल से कश्मीर में भेजा जाता रहता है। मतलब इनके जीवन में स्थायित्व का भाव नहीं आ पाता। ये भी एक बड़ा कारण है जिसके चलते ये जवान परेशान रहते हैं।
 देश के सभी अर्धसैनिक बलों के जवानों का खुदखुशी करना
कहीं ना कहीं चिंता का विषय तो है। इन्हें सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद बेहतर सैलरी और दूसरे भत्ते मिलने लगे हैं। क्या   इन्हें ट्रेनिंग के दौरान ये  सब नहीं बताया जाता कि इन्हें नौकरी के दौरान घर से दूर रहना होगा? ये मानसिक रूप से अपने को क्यों नहीं तैयार करते?
इसके साथ ही एक बात और भी देखने में आ रही है कि उपर्युक्त बलों के जवानों में आपसी संघर्ष भी होने लगा है। कुछ समय पहलेछत्तीसगढ़ में तैनात आईटीबीपी ( तब इसकी एक बटालियन वहां पर थी) के जवानों में हुए आपसी संघर्ष में गोलियां चलीं जिसमे छह जवान मारे गए थे। तब कहा गया था कि एक जवान ने इसलिये गोलियां चलाई क्योंकि उसे घर जाने की छुट्टी नहीं मिली थी। इस तरह की घटनाएं हमारे सशस्त्र बलों में बार बार हो रही हैं। ये खबरें कुछ समय तक सुर्खियों में  रहने के बाद गायब हो जाती  हैं। ये सही नहीं है। उन कारणों की जांच की जानी जरूरी है जिसके चलते जवान आत्म करने लगे हैं या आपस में किसी दूसरे को मार देते हैं। इन मसलों के तुरंत हल खोजने होंगे।

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