बुधवार, 13 मई 2020

मां की पीड़ा / दयानंद पांडेय




दयानंद पांडेय

मेरा गांव सड़क पर ही है। हाइवे पर। गांव का नाम  है बैदौली । गोरखपुर-बनारस हाइवे पर गोरखपुर से ठीक पैतीसवें किलोमीटर पर। अब तो इस सड़क पर इतनी ट्रैफ़िक है कि कई बार सड़क पार करना मुश्किल हो जाता है। रोज-ब-रोज दुर्घटनाएं आम हैं। लेकिन तब के दिनों सवारियों की इतनी रेलमपेल नहीं थी। खैर, तब सड़क पर आ कर सवारी का इंतज़ार करते-करते सब लोगों को छोड़ कर मैं पानी पीने के बहाने फिर-फिर घर जाता रहता। और अम्मा मुझे घर के मुख्य दरवाजे के पीछे, एक दरवाज़ा उंठगाए, एक दरवाज़ा खोले बैठी मिल जाती थी। वह जैसे मेरे इंतज़ार में ही बैठी रहती। हम फिर गले लग कर रोते। यह सिलसिला बार-बार का होता। हर बार का होता। जब तक बस नहीं आती यह सिलसिला रुकता नहीं। लोग चिढ़ाते भी खूब थे कि बड़ी प्यास लग रही है ! लेकिन मुझे किसी के चिढ़ाने आदि की परवाह नहीं होती थी तब। बस अम्मा ही अम्मा होती थी। गोरखपुर आ कर भी अम्मा की याद में छुप-छुप कर रोता। रोहिणी नदी के किनारे रोता, मंदिर में बैठ कर रोता। स्कूल में रोता। अम्मा की याद दिन-रात, सांस-सांस में समाई रहती। गांव जब-जब जाता अम्मा को लगता कि क्या बना दे क्या खिला दे ! घटनाएं और किस्से तो अनंत हैं इस सब के। पर एक मासूम सा किस्सा बताऊं। जाड़ों में बड़े दिन की छुट्टी की बात है। मुझे गंजी बहुत अच्छी लगती है। घर में बच्चों की भीड़ बहुत होती तब। अम्मा हमारे लिए तब गंजी भून कर हमारे सिरहाने रख देती थीं रात में। कि मैं सुबह उठ कर चुपचाप खा लूंगा। रात में वह घर का काम काज निपटा कर देर में सोने आतीं। और सुबह जल्दी ही उठ कर काम में लग जातीं। सो मुझे जगाती नहीं थीं। एक सुबह मेरी चचेरी बहन खेलने के लिए जगाने आई तो जगाते-जगाते उसे मेरे सिरहाने गंजी मिल गई। वह अब रोज अम्मा के कमरे में मुझे जगाने आने लगी। एक दिन अम्मा ने धीरे से गंजी के बारे में पूछ लिया तो मैं ने कहा कि नहीं मिलती। तब सुबह अम्मा को उस बहन का रोज मुझे जगाने आने का सबब पता चला। तो वह उसे अलग से गंजी देने लगीं। लेकिन उस बहन ने वह राज़ खोल दिया एक दिन अपनी बेवकूफी में। अम्मा को इया से बहुत डांट खानी पड़ी। पर वह प्रतिवाद में कुछ नहीं बोलीं। अम्मा मुझ से अपने स्नेह के लिए घर में असंख्य बार डांटी गईं, बेज्जत हुईं पर कभी प्रतिवाद भी किया हो मुझे नहीं याद आता। मुनव्वर राना का यह शेर मेरी ज़िंदगी में भी बेहिसाब घटा है। कि अब क्या कहूं।

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है ।

बल्कि वह तो गुस्सा ही नहीं होती थी और मेरे सारे दुख, सारे आरोप भी अपने ऊपर ले लेती थी। संयुक्त परिवारों में तब किसी औरत का जीना क्या गांव, क्या शहर कितना जुल्म भरा होता था यह सोच कर, याद कर आज भी कलेजा मुंह को आता है। एक बार क्या हुआ कि मुझे गोरखपुर में बड़ी वाली चेचक निकल आई। पता चला कि उसी समय गांव में अम्मा को भी चेचक निकल आई। दोनों ही बहुत कमजोर हो गए। जब हम छुट्टियों में गांव आए तो इया ने विशेष प्रबंध किया हमारे स्वास्थ्य के लिए। अम्मा के लिए भी। खास तौर पर खाने-पीने और दूध आदि का। लेकिन उस में से अम्मा सारा कुछ मुझ पर ही न्यौछावर कर देतीं। थोड़ा-थोड़ा कर के सारा दूध भी मुझे ही पिला देतीं। अपने हिस्से का भी। पर मुझे बराबर हिदायत भी देती जातीं कि किसी से बताना नहीं। एक दिन इया ने मुझ से अकेले में पूछ लिया कि मुझे मेरी अम्मा दूध तो नियमित दे रही हैं न ! मैं चुप रहा। वह बार-बार पूछने लगीं। तो मैं ने कह दिया कि नहीं। अब क्या था ! अम्मा की जैसे शामत ही आ गई। इया ने अपने भदेस लहजे में अम्मा को जो-जो नहीं कहना चाहिए, सब कह दिया। सार्वजनिक रुप से। पेटही, डाइन, डाकिन, चुड़इल आदि विशेषणों से भी नवाजा। पर मैं अम्मा की हिदायतों से बंधा चुप-चुप रोता रहा अम्मा के इस अपमान से। और अम्मा अपनी घूंघट में सब कुछ सहती रहीं रोती हुई। लेकिन अम्मा ने एक बार भी पलट कर इया से नहीं कहा कि सारा दूध, अपने हिस्से का भी वह मुझे ही पिला देती हैं। अपने तो एक बूंद भी नहीं छूतीं। फिर तो कभी बड़की माई, कभी फुआ लोग यहां तक कि गांव की और औरतों के बीच भी हमारीे अम्मा पेटही, डाइन, डाकिन, चुड़इल आदि विशेषणों से नवाजी जाने लगींं। उन की वह विवशता, उन का वह अपमान सोच कर आज भी मेरी आंखें भर-भर आती हैं। पर उस का प्रतिकार मैं तभी क्यों नहीं कर पाया यह सोच कर आज भी अपने पर गुस्सा आता है। तब शायद उम्र भी मेरी कम थी। तीसरी या चौथी में पढ़ता था। और कि सोचने समझने की वह क्षमता नहीं थी। बस एक ही धुन और एक ही बात थी मन में कि अम्मा ने मना किया है तो किसी से नहीं कहना है कि अम्मा मुझे दूध देती हैं। लेकिन अम्मा ने क्यों नहीं मुंह खोला तब? इतना कुछ सहने और सुनने के बाद भी? आज तक मैं समझ नहीं पाया। घर में अम्मा को मिले ऐसे  और भी बहुतेरे दंश मेरे मन में रह-रह कौंध जाते हैं। किसी व्याग्र के वध की तरह। लेकिन अम्मा तब चुपचाप सारा जहर अकेले ही पी जाती थीं। कैसे? सारे इतने और तंज और ताने अपने मन पर लिए घूंघट काढ़े वह चुपचाप काम करती रहती थीं। निरंतर। कितना धैर्य और कितनी शक्ति भगवान ने उन्हें दे रखी थी, आज भी सोच कर मैं विचलित हो जाता हूं। ऐसी घटनाएं अनंत हैं। अम्मा के नीलकंठ विषपायी होने की कथा अनंत है।

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