गुरुवार, 21 मई 2020

रवि अरोड़ा की नजर में





सर्वे भवन्तु दुखिनः

रवि अरोड़ा

सामाजिक जीवन के चलते उठावनी अथवा तेरहवीं में हम सब का जाना होता ही है । यदि परिवार सनातनी परम्पराओं वाला हो तो शांति पाठ भी इस आयोजन में अवश्य होता है ।

शायद यही वजह है कि किसी अन्य श्लोक के मुक़ाबले हमें यही अधिक याद  रहता है ' सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥ मगर क्या वाक़ई हम इस श्लोक में कही गई बात के पक्षधर हैं ?

पूरी दुनिया और ख़ास तौर पर हमारे मुल्क में कोरोना वायरस के इस संकट को कैश करने की जो होड़ मची हुई है , उससे तो यही लगता है कि हम अपने लोगों का सुख नहीं दुःख चाहते हैं और हमारी कामना लोगों के स्वास्थ्य नहीं वरन उनकी बीमारियों से जुड़ी है ।


बाज़ार में इंफ़्रारेड थर्मामीटर इनदिनो तीन से चार हज़ार रुपये का बिक रहा है । कोरोना संकट से पहले इसका दाम हज़ार रुपये था । मार्च अप्रेल महीने में तो यह दस-दस हज़ार रुपये का बिका । हैंड सेनीटाईज़र का दाम अब केंद्र सरकार ने पाँच सौ रुपये लीटर तय कर दिया है मगर शुरुआती दिनो में वह दो- दो हज़ार रुपये लीटर तक बिका।

दाम कम होने के बावजूद सैकड़ों तरह के लोकल सेनीटाईज़र बाज़ार में छा गए हैं और उनकी गुणवत्ता की किसी को ख़बर नहीं । तीन प्लाई वाले मास्क का दाम बेशक अब दस रुपये तय कर दिया गया है मगर शुरूआती दिनो में यह पच्चीस रुपये में बिका । एन 95 मास्क क्या बला है यह किसी को नहीं पता मगर उसके नाम पर मुँह माँगे दाम पर पचासों तरह के मास्क बिक रहे हैं । ऐसे मास्क के लिए अभी तक न कोई गाइड लाइन है और न ही इनसे दाम तय किए गये हैं । घर घर मास्क बन रहे हैं और उनमे से कितने मानक पर खरे हैं , यह न तो कोई जानता है और न ही कोई बताता है ।

पीपीई किट की गुणवत्ता सम्बंधी तमाम शिकायतें अखबारी सुर्खियों में हैं । घर, दुकान और पूरे शरीर को सेनीटाईज करने वाले भी पचासों तरह के प्रोडक्ट बाज़ार में हैं और मेडिकल स्टोर ही नहीं परचून की दुकानों पर भी यह माल सहज उपलब्ध है । चीन और कोरिया से रोज़ाना कोई नया प्रोडक्ट मार्केट में आ जाता है और इंपोर्टर्स का जाल मुँह माँगे दामों पर इसे डरे सहमें लोगों को चिपका देता है । पता नहीं सरकार का इस ओर ध्यान क्यों नहीं है ?

दुनिया भर में कोरोना को भुनाने की होड़ सी देखने को मिल रही है । इस वायरस के प्राकृतिक होने अथवा चीन की वुहान अथवा ऐसी ही किसी अन्य लैब में बने होने की बहस के पीछे भी कारण आर्थिक ही हैं । अपने यहाँ लगी विदेशी कम्पनियों के शेयर एक तिहाई दामों में चीन द्वारा ख़रीदे जाने से यूँ भी चीन पर दुनिया का शक गहरा रहा है । उधर यह सवाल भी उठ रहा है कि इस महामारी से जहाँ दुनिया के तमाम देशों की मुद्रा कमज़ोर हुई है एसे में अमेरिकी डालर कैसे मजबूत हो रहा है ? सूँघने वाले तो इस महामारी के पीछे भी कोई बड़ा अमेरिकी खेल बता रहे हैं । यह बात भी किसी के पल्ले नहीं पड़ रही है कि माईक्रोसॉफ़्ट के बिल गेट्स कई साल से कह रहे थे कि तीसरा विश्व युद्ध नहीं होगा बल्कि कोई वायरस दुनिया को तबाह करेगा । अब उनकी ही संस्था के आर्थिक सहयोग वाली दवा कम्पनियाँ कैसे सबसे पहले वैक्सीन की खोज के दावे कर रही हैं ? जिस दवा कम्पनी मॉडर्ना ने सबसे पहले मानवीय परीक्षण में अपनी दवा एमआरएनए-1273 को सफल बताया है उसकी आर्थिक सहयोगी गेट्स की संस्था सीईपीआई ही है । क़ोविड 19 में जिस दवा रेमडीसीवीयर को उपयोगी माना जा रहा है उसकी निर्माता कम्पनी गिलीयड साइंस की फ़ंडिंग भी गेट्स की इसी संस्था ने की है । ज़ाहिर है कि सब कुछ एसे ही चला तो ये कम्पनियाँ अरबों खरबों कमाएँगी । चलिये छोड़िए दुनिया को, हम अपनी ही बात करें । हम सुबह शाम शांति पाठ करके सबके सुखी और निरोगी रहने की कामना करने वाले क्यों इतने लोभी हो गए हैं ? यदि हम सचमुच एसे ही हैं तो फिर यह ड्रामा क्यों ? सीधा सीधा क़ुदरत से माँगे- सर्वे भवन्तु दुखिनः ।

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