सोमवार, 18 मई 2020

भारत से इतना समीप है उज्बेग और समरकंद/त्रिलोकदीप




ताशकंद में उज्बेग़ भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक तौर पर अपने आप को भारत के निकट पाते हैं। हिदी के विद्वान मीर कासिमोव ने बताया था कि उज्बेग़ और हिंदी में तमाम ऐसे शब्द हैं जो हम और आप एक ही तरह से बोलते हैं। मीर कासिमोव बहुत देर तक मेरे साथ रहे औऱ ताशकंद के महत्व के साथ साथ भारत और उज्बेकिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों पर चर्चा करते रहे।

वह ऐसी फर्राटेदार  हिंदी बोल रहे थे मानो वह हमारे यहां के ही किसी प्रदेश से संबंध रखते हों।उन्होंने शास्त्री स्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी। शास्त्री स्कूल में पहले बच्चों को रूसी लिपि में हिंदी सिखाई जाती है और उसके बाद हिंदी वर्णमाला में। शब्दों को जोड़ने का काम दूसरी कक्षा से शरू होता है। सैकड़ों की संख्या में बच्चे हिंदी पढ़ने के प्रति रुचि रखते हैं।

1987 में म दूसरी बार ताशकंद गया। शास्त्री स्कूल भी गया तथा आम लोगों से भी मेलमुलाकात हुई। इस बार के ताशकंद को कुछ बदला बदला महसूस किया।खुशहाली भी कुछ ज़्यादा नज़र आयी। कारण बताया गया राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव की पेरेस्त्रोइका औऱ ग्लासनोस्त पर आधारित नीतियां।वह मानते थे कि न तो समाज जड़ होता है और न ही उसका ढांचा तरक्की सिर्फ गतिशील रवैया रखने वाले देश ही करते हैं।

ज़रूरी नहीं हमारे पुरखों के समय जो नीतियां कारगर थीं वे आज भी हों।वह कहा करते थे कि क्रांति ऊपर से होनी चाहिए औऱ सब को अपना हक़ मांगने का अधिकार होना चाहिए।

 शायद गोर्बाचेव की इन क्रांतिकारी नीतियों के चलते ही सोवियत संघ का विघटन हुआ औऱ उज्बेकिस्तान सहित सभी रूसी गणतंत्र आज स्वाधीन देश है। 1990-91 में उज्बेकिस्तान भी स्वाधीन देश के तौर पर वजूद में आया औऱ मीर कासिमोव को भारत में राजदूत नियुक्त किया गया।

उज्बेकिस्तान का दूसरा बड़ा और ऐतिहासिक नगर है समरकंद। यहां की भाषा और  संस्कृति भी भारत के बहुत करीब है। कई ऐसे पर्व तीज त्यौहार हैं जो भारत की तरह यहां भी मनाये जाते हैं। कुछ लोग समरकंद को संस्कृति का चौराहा भी कहते हैं। समरकंद में शाही ज़िंदा के मकबरे अपनी वास्तुकला के नायाब1औऱ बेशकीमती नमूने पेश करते हैं।

समरकंद का बाजार शहर के बीचोंबीच एक किले जैसी चहारदीवारी में बंद सा दीखता है।उज्बेगी लिबास पहने यहां के स्थानीय लोगों को पहचाना जा सकता है।मर्द लम्बा कोट पहनते हैं सर पर कुल्लेदार पगड़ी या नक्काशी से जड़ी टोपी जबकि औरतों को चोटी दर चोटी बनाने का1बेहद शौक है।


इसी बाजार के साथ ही है बीबी खनम द्वारा निर्मित मशहूर मस्जिद जो 1399-1404 के बीच बनी थी। यहां का शासक था तैमूर लंग। बीबी खनम तैमूर की बेहद ख़ूबसू बेगम थी। तैमूर जब हिंदुस्तान पर हमला करने के लिये गया तो बीबी खनम ने सोचा कि जब उनका शौहर जीत हासिल करके लौटे तो वह उनकी जीत की खुशी में एक नायाब तोहफा  पेश करें।

उन्होंने कई वास्तुकार बुलाकर  अपनी प्रस्तावित मस्जिद के नमूने लाने को कहा। काफी कोशिशों के बाद उन्हें एक नमूना पसंद आया।उस पसंददीदा नमूने के आधार पर  जल्दी औऱ तेज़ी से काम शुरू हो गया। इस निर्माणकार्य पर बेगम खुद निगरानी रखती थी।

एक दिन बेगम को संदेश मिला कि तैमूर जल्दी समरकंद लौट रहा है। यह खबर सुन बेगम के हाथ पैर फूल गये। मस्जिद की अभी दो मंजिलें बननी बाकी थीं। जब बेगम ने वास्तुकार को जल्दी से जल्दी काम खत्म करने के लिये कहा तो उसने अपनी मजबूरियां गिनानी शुरू कर दीं।इस पर बेगम ने उससे वादा किया कि अगर वह वक़्त पर का खत्म कर देगा तोउसे मुँह मांगा इनाम मिलेगा। अब वास्तुकार ने अपनी एक शर्त जड़ दी। उसने कहा कि  समय रहते काम तो पूरा हो सकता है बशर्ते इस के बदले बेगम अपनी गाल पर एक चुम्बन लेने की इजाज़त दें तो। बेगम पेशोपेश में पड़ गयी।

बेगम ने वास्तुकार से कहा कि मुझे छोड़ वह राजधानी की किसी भी लड़की पर हाथ रखे वह उसे दिला देगी क्योंकि हर औरत एक जैसी ही होती है। अपनी दलील पेश करते हुए बेगम ने दो तश्तरियों में अंडे रख कर उन्हें अलग अलग रंगों से रंग दिया। जब उन्हें फोड़ा गया तो सभी में एक जैसा माल निकला। वास्तुकार प्रभावित नहीं हुआ। उसने अपना तर्क देने के लिये दो बोतलें लीं, एक में पानी भर दिया और दूसरी में वोडका। वास्तुकार ने कहा कि रंग तो दोनों का एक है लेकिन पानी पीने से तो कुछ नहीं होगा, वोडका से नशा होगा।

मजबूरी में बेगम ने हामी भर दी क्योंकि उसने अपने शौहर की वापसी के लिये यह नायाब तोहफा जो बनवाया था। माना जाता है कि जब वास्तुकार बीबी खनम के गालों का चुम्बन लेने के लिए झुका तो उसने अपनी , गालों पर हाथ रख लिया, बावजूद इसके वास्तुकार के चुम्बन में इतनी गर्मी थी कि वह अपना निशान बीबी खनम के गाल पर छोड़ गया।बीबी खनम ने उस लाल रंग के निशान को भरसक छुपाने का प्रयास किया लेकिन तैमूर की नज़रों से वह  बच न सका।


तैमूर ने हुक्म दिया कि चुम्बन के बाद बनने वाले हिस्से को गिरा दिया जाये और वास्तुकार को उसकी हिमाकत के लिए मौत की सज़ा हो।  तैमूर ने यह भी ऐलान कर दिया कि आज से सभी औरतें अपने चेहरे को ढक कर रखेंगी और उसी दिन से बुरके की रवायत शुरू हो गयी। हालांकि 1897 में भूकंप से मस्जिद का बहुत सा हिस्सा ढह गया बावजूद इसके उस मस्जिद की खूबसूरती को बनाये रखने के प्रयास किये जाते हैं , क्योंकि यह बेशकीमती ऐतिहासिक धरोहर है।


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