रविवार, 10 मई 2020

रवि अरोड़ा की नजर में




अपनी मर्ज़ी से या ...

रवि अरोड़ा


शायद चौदह साल हो गए होंगे इस बात को । हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक छोटा सा बच्चा बोरवेल में गिर गया था । नाम था उसका प्रिंस । इस हादसे पर देश के तमाम टीवी चैनल्स ने अपनी छाती पीट पीट कर जो विलाप किया था वह कभी भूलेगा नहीं । बेशक गाँव देहात में बोरवेल के गड्ढे में पहले भी बच्चे गिरते रहे हैं और प्रिंस के बाद भी न जाने एसे कितने हादसे हुए हैं मगर उस मामले में लोगों की संवेदनायें जागृत करने और फिर उसे भुनाने का जो खेल हुआ वह अभूतपूर्व था । वह घटना मीडिया जगत के लिए इसलिए भी उल्लेखनीय है कि उसी हादसे की कवरेज से तय हो गया था कि मुल्क में न्यूज़ चैनल्स से तो कोई उम्मीद करना बेकार है । ये तो टीआरपी बटोरने की दुकानें भर हैं और इन्हें आम आदमी के सुख दुःख से कोई सरोकार नहीं है । बेशक प्रिंट मीडिया ने पूरी तरह अपना ज़मीर अभी तक नहीं बेचा था मगर अब तो शक बड़े अखबारी घरानों पर भी होने लगा है । अब लॉकडाउन की वजह से हुई मौतों की ही बात कर लीजिये । कहीं दिख रही हैं आपको एसी ख़बरें ? टीवी चैनल्स तो चुप हैं ही , बड़े और कथित तौर पर राष्ट्रीय अख़बारों ने भी अपनी आँखें बंद कर रखी हैं । क्या केवल सरकारी विज्ञप्ति ही ख़बर होती हैं जी ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेंद्र मोदी की पहली और दूसरी सरकार के बीच गंगा में बहुत सा पानी बह गया है ।  बहुत कुछ एसा भी बदल गया है , जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। बाक़ी बातें फिर कभी आज तो मीडिया जगत पर ही बात कर लें । मोदी वन ने आठ नवम्बर 2016 को जब नोटबंदी की थी और उसके परिणाम स्वरूप विभिन्न कारणों से सौ से भी अधिक लोगों की मृत्यु हो गई थी । उस समय को ज़रा याद कर लीजिये । तब यह मामला ख़ूब उछला था । अख़बार और टीवी चैनल सारा सारा दिन बैंकों की लाइन में लग कर मरने वालों का ही विलाप करते थे । मीडिया के हमलावर होने पर ख़ुद प्रधानमंत्री सुरक्षात्मक स्थिति में आ गए थे और लगभग गिड़गिड़ाते हुए पचास दिन देने की जनता से गुहार लगाने लगे थे । मगर अब हालात बदल चुके हैं । अब मोदी टू में मीडिया जगत की बची खुची हिम्मत भी जवाब दे चुकी है और वह पूरी तरह आत्मसमर्पण कर चुका है । सवाल करना तो उसने जैसे छोड़ ही दिया है ।

हाल ही में कुछ संस्थाओं ने मिल कर एक सर्वे किया और पाया कि लॉकडाउन के चलते 19 मार्च से लेकर 2 मई तक देश में 338 लोगों की अकाल मृत्यु हुई है ।घर से दूर लॉकडाउन में बंधक जैसे बना दिए गए 80 लोगों ने आत्महत्या कर ली । 51 लोग घरों को पैदल लौटते हुए सड़कों पर मारे गये । 45 लोग शराब न मिलने से हुए विड्रोल सिंड्रोम से मरे और 7 लोग शराब के चक्कर में सेनीटाईज़र अथवा आफ़्टर शेव पीने से काल के मुँह में चले गये । हाल ही में औरंगाबाद की रेल की पटरियों पर मरे सोलह लोगों को जोड़ लें तो यह आँकड़ा साढ़े तीन सौ तक पहुँचता है । यक़ीनन इस तमाम मौतों का आरोप मोदी सरकार के मत्थे नहीं मढ़ा जा सकता मगर इसमें भी तो कोई दो राय नहीं कि पूरी तैयारी से लॉकडाउन किया जाता तो इनमे से अनेक मौतों को टाला जा सकता था । ईश्वर करे कि मौतों का यह आँकड़ा आगे और न बढ़े मगर यह आशंका तो है ही कि कुल मौतों की गिनती इससे भी कहीं अधिक हो सकता है क्योंकि सर्वे करने वालों ने केवल अख़बारों और वेब साइट्स पर छपी ख़बरों के आधार पर ही यह रिपोर्ट जारी की है । ख़ैर आँकड़ा कुछ भी हो । इसे तमाम अख़बारों में छपना तो चाहिये था , न्यूज़ चैनल्स पर कबूतर लड़ाने वालों को इस पर बात तो करनी चाहिये थी । हो सकता है कि यह सर्वे हवाई हो मगर क्या किसी अख़बार अथवा टीवी चैनल ने अपने स्तर पर इस तरह  का कोई सर्वे कराया ? क्या सचमुच कहीं कोई नहीं मरा ? हे चौथे खम्भे वालों सच सच बताओ अपनी मर्ज़ी से यह सब कर रहे हो या .... ?

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें