रविवार, 24 मई 2020

मेरी पहली विदेश यात्रा भाग- 3 / त्रिलोकदीप






माफ करें आज मेरा फोन मेरा साथ नहीं द पाया  । मैं यह बताना भूल गया कि विमान पर सवार होने से पहले नई दिल्ली नगरपालिका के एक विशेष कक्ष से टीका लगवा कर इस आशय का अंतरराष्ट्रीय प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता था जिसे देखने के बाद ही एयरपोर्ट पर तैनात इमीग्रेशन अधिकारी विमान पर सवार होने की अनुमति दिया करते थे। दो तीन बार मुझे टीका लगवाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। अब शायद यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। जैसा मैंने पहले कहा कि फ्रैंकफर्ट एक ऐसा नगर है जो आपको अंतरराष्ट्रीय मिज़ाज़ और अंदाज़ का परिचय देता है।इसका भव्य एयरपोर्ट कभी दुनिया के बड़े औऱ व्यस्ततम हवाई अड्डों में शुमार था। यहां की ऊंची ऊंची इमारतें, खान पान की किस्में, बहुराष्ट्रीय निगमों के आफिस, दुनिया भर की नस्लें, परिवहन और यातायात के सभी साधन उपलब्ध हैं जो केवल पूरी जर्मनी को ही नही बल्कि पूरे यूरोप को जोड़ते हैं। फ्रैंकफर्ट है तो हेस्से राज्य का हिस्सा लेकिन सैलानियों के लिए अपने आप किसी राज्य से कमतर नहीं है। सभी लोगों की सुविधाओं का फ्रैंकफर्ट ख्याल रखता है लेकिन अपने सीनियर सिटीजन्स के लिये उसकी विशेष सहूलियत उसके पास है। मैं  होटल फ्रैंकफर्ट हाफ में ठहरा था।उस होटल की गहमागहमी औऱ बालकोनी से बाजार का दिलकश नज़ारा देख कर मन खुश हो जाता था।

जैसा मैंने पहले कहा कि जिस तेजी के  साथ पश्चिम जर्मनी में प्रगति की गति है उससे ऐसा1लगता ही नहीं कि इसने विश्व युद्ध में कितना कुछ खोया है। लोग वर्तमान में जीते हैं औऱ उसे सवारने में जुटे हुए हैं। जब मैं नवनिर्मित राजधानी बोन पहुंचा तो कहीं से यह लगता ही नहीं था कि इस पूरे शहर का निर्माण हाल ही में हुआ है। मुझे बताया गया कि बोन जर्मनी के सब से घने राज्य नार्थ राइन-वेस्टफलिया का एक कस्बा था । जिस तरह से उसका निर्माण हुआ था उसे देखकर लगता ही नहीं था कि उसमें राजधानी जैसी गरिमा नहीं है। वहां का संसद भवन, राष्ट्रपति निवास, मंत्रियों के आवास इस तरीके से बनाये गए थे मानो बोन पश्चिम जर्मनी की पुरानी राजधानी है। क्योंकि मैं जितनी बार भी गया हूं पश्चिम जर्मनी ही और बोन ही गया हूं। वहां के लोगों से कुछ औपचारिक और गैरऔपचारिक बातचीत से पता चला कि पश्चिम जर्मनी की मौजूदा शक्ल गढ़ने के पीछे विली ब्रांट की अहम भूमिका रही है।कुछ लोग विली ब्रांट को पूरी जर्मनी की रूह मानते हैं। उनका तर्क है कि चाहे वह 1957 से 1966 तक बर्लिन के मेयर रहे हों, 1966 से 1969 तक देश के वाईस चांसलर यानी उपप्रधानमंत्री और विदेशमंत्री या 1969 से 1974 तक चांसलर अर्थात प्रधानमंत्री उन्होंने दो ही सपने देखे थे। एक, दोनों जर्मनी का पुनः एकीकरण करना तथा पूरे यूरोप में एकता औऱ शांति स्थापित करना। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पहले 1966 में क्रिस्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सी डी यू) के साथ मिल कर अपनी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एस पी डी) का विराट गठबंधन करना और विदेशमंत्री का पद सम्हालना। उस समय  चांसलर थे कुर्त किसिंगर। विदेशमंत्री रहते हुए ही उन्होंने पूरे यूरोप में शान्ति स्थापित करने के 'देतें ' का मंत्र दिया। दूसरे देशों के नेताओं को तैयार किया और चांसलर बनने के बाद उस पर अमल करना शुरू कर दिया। 1970 में उन्होंने सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि की, 1970  में ही पोलैंड की राजधानी वारसा में जाकर  यहूदियों की याद में बने स्मारक के समक्ष झुक कर अपने देश के नेताओं
 की गलतियों के लिये माफी मांगी और1971 में मैत्री संधि भी की । यहां तक कि पूर्व जर्मनी के साथ भी संधि कर बर्लिन में दोनों देशों क नागरिकों के बेरोकटोक आने जाने का रास्ता साफ किया तथा 1973 में चेकोस्लोवाकिया से भी मैत्री संधि की। इस तरह से विली ब्रांट ने पूर्व और पश्चिम के बीच का फर्क मिटाते हुए यूरोप में शांति का1मार्ग प्रशस्त किया। इन्हीं प्रयासों के चलते विली ब्रांट को  1971 का शांति नोबेल पुरस्कार दिया गया।

जर्मनी अपनी हरियाली के लिए जगप्रसिद्ध है। उस देश में साफ सफाई, पर्यावरण, लोगों का सदा हंसता हुआ चेहरा, विनयशीलता, काम के प्रति प्रतिबद्धता और समर्पण की भावनाबऔर अनुशासन जैसे ऐसे गुण हैं जो जर्मनी की समृद्धि के कारक हैं। कहने को तो लोग बवेरिया को अनुदारवादी राज्य कहते हैं लेकिन इसकी राजधानी म्युनिक की प्रसिद्धि और पहचान किसी की मोहताज नहीं।यहां की बियर सारी दुनिया में मशहूर है ही, अलावा इसके बीएमडब्ल्यू, ऑडी और साइमन के निर्माताओं के शहर  के तौर पर भी जाना  जाता है। मुझे बताया गया कि म्युनिक में जितने प्रकाशक हैं, जर्मनी में और कहीं नहीं।
अगर ऑडी का निर्माण म्युनिक में होता है तो मर्सेडीज़ के निर्माण का गौरव स्टुटगार्ट को प्राप्त है। यहां मर्सेडीज़ की फैक्टरी देखने में पूरा एक दिन गुज़र गया फिर भी वह पूरा देखा नहीं जा सका। स्टुटगार्ट अपने ब्लैकफारेस्ट के लिए भी मशहूर है।दूर दूर तक जंगल फैले हुए हैं। यहां की एक सौगात जो स्टुटगार्ट आने वाले हर बन्दे को भाती है वह है कुकू वाच। वाल क्लॉक, टेबल क्लॉक या हैंड वाच के तौर पर उपलब्ध है। चलते चलते बीच बीच में यह घड़ी कू कू की सुरीली आवाज़ करती रहती है। हर राज्य की अपनी खूबी औऱ सिफत होती है। बर्लिन को पढ़े लिखों का शहर कहा जाता है।उच्च शिक्षा के यहां बहुत संस्थान हैं। बर्लिन को फिल्मी नगरी भी माना जाता है। यहां पर अक्सर फ़िल्म समारोह आयोजित होते रहते हैं। मेडिसीन बनाने वाली बायर समेत कई कंपनियां यहाँ कार्यरत हैं।
कमाल का है पश्चिम जर्मनी।अगली बार जर्मनी के बारे और दिलचस्प जानकारी।
क्रमशः - - - - -

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