सोमवार, 13 अप्रैल 2020

परम गुरू हुजूर के बचन उपदेश




प्रस्तुति - स्वामी शरण /
आत्म स्वरूप / संत शरण

**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज- रोजाना वाक्यात- 1,2 सितंबर 1932- बृहस्पतिवार व शुक्रवार:- 1 सितंबर की सुबह को 1:00 बजे के करीब बंगलुरु के लिए रवाना हुए। मद्रास तक कोई सत्संगी नहीं मिला। अलबत्ता बल्लारशाह स्टेशन पर संयोगवश प्रेमी भाई रघुनाथ प्रसाद मिल गए जो 3 स्टेशन तक सहयात्री रहे । बेजवाड़ा स्टेशन तक सख्त गर्मी रही लेकिन यहां पहुंचने पर बारिश होने लगी और हवा में खांसी ठंडक आ गई। बल्लारशाह से बेजवाड़ा तक आला हजरत निजाम हैदराबाद  का क्षेत्र है जगह-जगह तुर्की टोपिया प्रकट है। दो मुसाफिर हमारे कंपार्टमेंट में सवार हो गए। हैदराबाद के रहने वाले हैं। ऐसी मीठी उर्दू बोलते हैं कि जिस का बयान नहीं हो सकता । बात-बात पर लफ्ज़ शुक्रिया इस्तेमाल करते हैं । दरयाफ्त करने पर मालूम हुआ रियासत हैदराबाद में अधिक तादाद हिंदुओं की आबाद है । व्यापार व भूमि ज्यादातर हिंदुओं के हाथों में है लेकिन सरकारी मुलाजिमतों  पर अधिकतर मुसलमान तैनात है । मगर हिंदू मुसलमान अमन अमान से जिंदगी बसर करते हैं। 2 सितंबर के दोपहर को बेजवाड़ा स्टेशन आया। अब मद्रास सिर्फ 7 घंटे का सफर रह गया ।     मद्रास स्टेशन भी आ गया। प्रेमी भाई सत्यनारायण सेक्रेटरी मद्रास ब्रांच सत्संग मौजूद थे। डेढ़ घंटे बाद बंगलूरू के लिए गाड़ी जाती थी। उन्होंने उतरने के लिए जोडर दिया इसलिए उतर गए ।रास्ते की गर्मी से तबीयत ज्यादा थक गई थी। रात भर की यात्रा का और भी खराब असर पड़ता इसलिए चंद घंटों के लिए मद्रास में ठहराव करना मंजूर कर लिया।

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**



**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज- सतसंग के उपदेश -भाग 2-( 41)【 बंधन व फर्ज में बड़ा फर्क है।】:- दुनिया का अजीब इंतजाम है।  इधर तो कुदरत ने मां बाप के दिल में औलाद की चाह धर दी है, उधर यह कायदा कर  रखा है कि बहुत से वाल्दैन के कतई औलाद नहीं होती और जिनके होती है तो अक्सर छोटी उम्र में या कुछ बड़ी होकर मर जाती है। जिन शख्सों के औलाद नहीं होती उसके लिए जहान भर की कोशिशें करते हैं । कोई दवा दारू ऐसी नहीं जिसे वे खाने के लिए तैयार न हो, कोई हकीम डॉक्टर ऐसा नहीं है। जिसके दरवाजे की हाजिरी से उन्हें इंकार हो और मालिक से लेकर भूत पलीत तक कोई ऐसे ग्रुप शक्ति नहीं जिसका दरवाजा खटखटाने में उन्हे शर्म हो। " बेचारे गरजबस बावले"  होकर तरह-तरह की मुसीबतें नुकसान उठाते हैं और जब तक मनोरथ पूरा नहीं हो जाता अपनेतई जीते जी मरा समझते हैं। दवा ईलाज या पूजा पाठ कराने पर जब किसी गरीब की आरजू पूरी हो जाती है तो बेहतर खुशियां मनाता है जिस देवता की पूजा करते करते औलाद हुई है उसी को सच्चा करतार और कुल मालिक समझने लगता है। अरसे तक उसके खानदान में बल्कि उसके जुमला संगी साथियों के घर में उसी देवता का सेवन रहता है और इस तरह समझ बूझ का कहना एक तरफ रख कर लोग किस्म किस्म के इष्ट धारण करते हैं और जब कुछ अर्से बाद उनकी औलाद मर जाती है तो वह कष्ट उनको होता है उसका अंदाजा लगाना हर इंसान के लिए कठिन है। ऐसे शख्सों के अलावा बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनके औलाद मामलों तौर से हो जाती है और वे लड़का या लड़की के मर जाने पर सख्त दुख महसूस करते हैं। खासकर बुढ़ापे की उम्र में औलाद का सदभा सख्त रंज का वायस होता है।

 क्रमशः-🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**



**परम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र -भाग 1- कल का शेष:-( 11) यहां पर यह बात बयान करना जरूर है कि शिवाय संत मत के जितने मत की दुनिया में जारी है वह या तो ब्रह्मा और ईश्वर के( जिसको संत ब्रह्मांडी मन कहते हैं)  या पिंडी मन और बुद्धि के बनाए हुए हैं और इन दोनों का असली झुकाव बाहर और नीचे की तरफ है, यानी निज घर का भेद और पता इन मतों में बिल्कुल नहीं है और ना चलने की जुगत का जिक्र है।।          (12) और जो इनकी( यानी मन और माया की हद में किसी दर्जे के हासिल करने के लिए किसी मत में हिदायत भी है, तो उसके चलने की जुगत ऐसी मुश्किल राह से बताई गई है पुलिस की कार्रवाई आमतौर पर मुमकिन नहीं है, यानी पिंड और ब्रह्मांड में भी आला दर्जे किसी को हासिल नहीं हो सकता।  और इसी सबब से किसी का सच्चा उद्धार बिल्कुल नहीं हो सकता यानी जन्म मरण और देह के साथ बंधन नहीं छूट सकता।।                            (13) संत किसी पर जब्र और जबरदस्ती नहीं करते और ना किसी को लोभ और लालच दिखलाते हैं, सिर्फ बचन सुना कर निज घर का भेद और उसके पहुंचने की जुगत समझाते हैं। जो कोई माने तो उसको मदद देकर निज घर में पहुंचाने का अभ्यास कराते हैं और पहुंचाते हैं और जो ना माने तो उन पर उनके आइंदा की बेहतरी के वास्ते दया की नजर फरमाते हैं। पर उनकी मौजूदा हालत के बदलने के वास्ते किसी तरह का जोर या दबाव नहीं डालते।

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**



राधास्वामी
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राधास्वामी

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