शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

फणीश्वर नाथ रेणु से प्रेम / भारत यायावर




रेणु से प्रेम
भारत यायावर

प्रेम क्या है? एक लगाव ही तो है ।एक समर्पण ।सबकुछ खो देने का भाव । त्याग और निष्ठा की निष्कंप दीपशिखा । मन- प्रांतर को आलोकित करती हुई । जब भाव की ऐसी स्थिति में व्यक्ति लम्बे समय से जी रहा हो ,तब सवाल तो उठता है ।

कुछ हमदर्द सवाल उठाते हैं कि मन नहीं ऊबता ? रेणु की एक कहानी है, ' उच्चाटन ' । व्यक्ति है और उसका मन है तो कभी-कभी उच्चाटन तो होगा ही । उच्चाटन होता है अपनी जीवन-स्थितियों से ऊब जाने पर या अपने सुख के आधार को खो देने पर ।

प्रेम एक अद्भुत मायाजाल है । जो उसमें फँसा, फँसकर निकल नहीं पाया । दिन-रात बेचैनी और तड़प ! अपने को बंधा हुआ महसूस करना । आजादी, सुविधा और सुख का तिरोहित हो जाना । नहीं भाई,नहीं !
हर आदमी चाहता है कुछ सुख मिले ।सुख पाने के लिए वह शादी करता है । नौकरी करता है । सुख के लिए ही वह जीता है ।
सुख क्या है?
जो हमारे अनुकूल हो वह सुख है ।
हमारी कामना की पूर्ति से प्राप्त आनन्द ही सुख है ।
सुविधा से रहना,
चैन की नींद सोना,
आरामदेह जीवन जीना,
सुख है ।
सुख वह अनुभूति है जो तन- मन को अच्छा लगे ।

लेकिन प्यार के पथ पर चलने वाले को सुख कहाँ?
मैं रेणु को चाहता हूँ और पाने की खोज में भटकता रहता हूँ । उनसे विमुख न हो जाऊँ, इसलिए निराला की इस प्रार्थना को संकल्प की तरह मन में धारण किए रहता हूँ :

सुख का दिन डूबे डूब जाए
तुमसे न सहज मन ऊब जाए

खुल जाए न मिली गाँठ मन की
लुट जाए न उठी राशि धन की
धुल जाए न आन शुभानन की
सारा जग रूठे रूठ जाए

उलटी गति सीधी हो न भले
प्रति जन की दाल गले न गले
टाले न बान यह कभी टले
यह जान जाए तो खूब जाए

निराला का यह गीत एक कामना है । इस कामना में मैं अपना स्वर भी मिलाना चाहता हूँ । सुख का दिन डूबे अर्थात तिरोहित हो जाए ,कोई चिंता नहीं, रेणु से मेरा मन कभी न ऊबे! जो मन की डोर में रिश्ते की गाँठ पड़ी है, वही मेरे जीवन के धन की राशि है, वही मेरा शुभ आनन है, वह रहे! पूरा जग मुझसे रूठ जाए, कोई चिंता नहीं । और , यह जान भी चली जाए तो कोई बात नहीं ।

रेणु को मैंने पाया है ।पर इसके लिए मुझे कितना भटकना पड़ा है! कितने दुर्गम मार्ग पर चलना पड़ा है । फिर भी मैंने पूरी तरह से उन्हें आत्मसात कहाँ किया है ? लेकिन अब तक मन नहीं ऊबा है, भले ही सुख के अनेक मुहूर्तों की तिलांजली देनी पड़ी है ।

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