बुधवार, 22 अप्रैल 2020

बचपन की बात है / गीताश्री





बचपन की बात है .

गीताश्री


स्कूली दिनों की. सरकारी स्कूल में पढ़ती रही. एक नहीं कई शहरों, क़स्बों के कई स्कूल में. बाबूजी का तबादला होता रहता, हम हर दो साल पर ट्रक पर लदे फदे दूसरी जगह पहुँच जाते. अनुभव संसार बचपन से ही बड़ा होता रहा. भाँति भाँति के लोग मिले. दोस्त मिले. गुरु जी मिले. मोहल्ले और कॉलोनी मिली.
उन्हीं दिनों गलियों में कंचे ख़ूब खेलती थी. गुल्ली डंडा, पिट्टो, आइस-पाइस, कट्तटम-कट्टी और भी सड़क छाप खेल .
बाद में क्रिकेट आया तो लकड़ी का चइला को बैट बनाकर खेलते थे.
ख़ैर. जो हमारे मोहल्ला छाप साथी होते थे- वो मुझे चिढ़ाते थे - मुझे, मेरे नाम को लेकर.
“गीता गईली फ़ीता बेचे
फ़ीतों ना बेचाइल
घरे अइली लात खइली
भातो न घोटाइल “

मैं सुलग जाती. नाम का ऐसा मज़ाक़ . फिर हम सबके नाम का मज़ाक़ उड़ाते. नाम नहीं तो जाति का मज़ाक़ उड़ाते. तब कहाँ इतना बोध था कि हम गुनाह कर रहे. एक याद है- कायस्थ का बच्चा, कभी न सच्चा...
या

“लाला बिल्लला, चौबीस रोटी ख़ाला
एक रोटी घट गईल
चौहानी दौड़ल जाला “

ये बचपन के पाप हैं. कान पकड़ के माफी.
तो हम कह रहे थे कि हमको गीता - फ़ीता बहुत सुनना पड़ा है.
सो हम नाम बदलने के फेर में पड़ गए. वो तो भला हो - हमारे शहर के महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री जी का . हम कविता लेकर गए उनके पास. बेला पत्रिका में छपवाने. नाम पर बहुत देर विचार मंथन हुआ . तरह  तरह के सुझाव आए. वो अलग कहानी. हमको तो गीता नाम से ही समस्या ... यही नाम लिए कॉलेज पहुँच गए थे. करे तो क्या !!
कविताएँ छपने लगी थीं. मगर गीता नाम से पीछा नहीं छूटा.
अंत में शास्त्री जी ने कहा -

“ गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै, शास्त्र विस्तरै
या स्वंय पदमनाभस्य मुख पदमानाभस्य मुख पद्मा द्विनी सृता: !”
इसका लंबा -चौड़ा अर्थ समझाया , मुझे कहा कि तुम तो श्री मुख से निकली हुई हो... गीता !
तुम आज से गीताश्री हो जाओ.
शास्त्री जी मुझे बेटी की तरह मानते थे. उन्होंने इसी नाम से बेला पत्रिका में कविता छाप दी.
और इस प्रकार से मैं गीता-फ़ीता से बाहर निकली. मैंने फ़ीता बांधना बंद कर दिया.
आज जब घर में फ़ीता मिला तो मुझे बचपन के सब साथी याद आए...
उनका सुर में मुझे चिढ़ाना ... जीभ दिखाना... मुँह टेढ़ा करना...
और फिर ढेर सारे ताजे शहतूत , तो कभी बेर मेरी मुट्ठी में भर देना. मौसम के अनुसार . कभी टिकोले .
जाने तुम सब कहाँ हो मेरे बचपन के मीत - मीताओं.
तुम्हारी याद में यह तस्वीर !!
अगर आपको बचपन के मीत याद आ रहे तो लगाइए ऐसी तस्वीर और सुनाइए रोचक क़िस्से.

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