सोमवार, 23 मार्च 2020

शहीदों की चिताओं पर...../ विवेक शुक्ल



भगत सिंह की चिता को देखने वाला कौन??

विवेक शुक्ल

  आपको शायद ही कोई शख्स मिला हो जिसने भगत सिंह की चिता को जलते हुए देखा हो। आखिर 24 मार्च,1931 को गुजरे हुए अब एक लंबा अरसा हो रहा है। उन्हें उनके दोनों साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च, 1931 को फांसी पर लटका दिया गया था लाहौर में। उसके बाद उनका 24 मार्च,1931 को अंतिम संस्कार किया गया रात के वक्त। भगत सिंह की चिता को सतलज नदी के करीब जलते हुए देखा था पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने। वे तब 12-13 साल के थे।
गुजराल साहब अपने माता-पिता और कुछ पड़ोसियों के साथ लाहौर से बसों में भगत सिंह की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए गए थे। उनके साथ स्वाधीनता सेनानी सत्यावती भी थीं। वो पूर्व उप राष्ट्रपति कृष्णकांत की मां थीं। तब आज की तरह न तो खबरिया चैनल थे और न ही ट्वीटर। ले- देकर अखबारों से लोग अपनी खबरों की प्यास बुझाते थे। पर,  जनता को मालूम चल गया था कि गोरी ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह को उनके साथियों के साथ फांसी पर लटका दिया है और उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया है।
 “भगत सिंह तब तक देश के नायक बन चुके थे। देश चाहता था कि उन्हें फांसी न हो।” ये बातें साल 2006 में गुजराल साहब ने इस नाचीज लेखक को अपने 6, जनपथ स्थित बंगले में एक बातचीत के दौरान बताई थीं। गुजराल साहब ने बताया था कि  भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटकाए जाने के चलते पंजाब समेत सारे देश में गुस्सा था। अवाम गोरी सरकार से सख्त खफा था।

 “ मेरे पिता  श्री अवतार नारायण गुजराल को मालूम चला कि भगत सिंह को फांसीपर लटकाने के बाद उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया है, तो वे अंत्येष्टि स्थल पर जाने के लिए तैयार होने लगे। तब हमारे तक हमारे कई पड़ोसी भी  उनके साथ अंत्येष्टि स्थल पर जाने के लिए आग्रह करने लगे। मैं हालांकि तब बहुत छोटा था, तो भी पिता जी मुझे भगत सिंह की अंत्येष्टि में ले जाने के लिए तैयार थे। मैं भी उनके साथ गया बस में बैठकर। बस से अंत्येष्टि स्थल में पहुंचने में करीब पौना घंटा लगा था। मेरा छोटा भाई सतीश ( चित्रकार सतीश गुजराल) घर में ही रहा। हम जब वहां पर पहुंचे तो पहले से ही काफी लोग उधर पहुंच चुके थे। भगत सिंह की चिता जल रही थी। हालांकि वो कमजोर पड़ गई थी। दिन था 25 मार्च,1931।” गुजराल साहब उस मंजर को याद करते हुए भावुक होने लगे थे। उनकी आंखें नम हो रही थीं।
गुजराल साहब को याद था कि किस तरह से सैकड़ों लोग चिता के पास बिलख-बिलख कर रो रहे थे।
“ भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव के शवों को गोरी सरकार ने उनके परिवारों को नहीं सौपा था। उनका पोस्ट मार्टम करवाने से पहले ही अपने आप स्तर पर अंत्येष्टि कर दी।”
तो देश में लग जाएगी आग
दरअसल सरकार को भय था कि उनके शव उनके परिवारों को सौंपे तो देश में आग लग जाएगी। उनका यह भी कहना था कि इन तीनों शहीदों को फांसी पर लटकाने के बाद इनके शवों पर सांर्डस के परिवार वालों ने गोलियां भी मारी थीं। यानी सरकार ने बर्बरता की सारी हदों को लांघा था। उसके कई दिनों तक गुजराल साहब के घर में चूल्हा नहीं जला था। सारे देश में मातम पसर गया था। किसी को खाना खाने की सुध नहीं थी।
 कब भगत सिंह ने हैट में खिंचवाई फोटो
शहीद भगत सिंह की हैट में फोटो को सारे देश ने देखा है। उस हैट में भगत सिंह ने फोटो दिल्ली के कश्मीरी  गेट के रामनाथ फोटो स्टुडियों में खिंचवाई थी। तब उनके साथ बटुकेश्वर दत्त ने भी हैट में फोटो खिंचवाया था। यह बात 4 अप्रैल, 1929 की है। इन दोनों क्रांतिकारियों ने    चार दिनों के बाद यानी 8 अप्रैल को केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था। बम फेंकने के बाद उन्होंने गिरफ़्तारी दी और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला। इससे पहले भगत सिंह का कोई हैट में फोटो नहीं मिलता। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपबल्किन आर्मी ( एचएसआरए) के सदस्य जयदेव कपूर भी रामनाथ फोटो स्टुडियो गए थे। कहते हैं कि कपूर ने ही उस हमले की सारी योजना की रणनीति बनाई थी।  भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की हैट में फोटो लेने वाला रामनाथ फोटो स्टुडियो  कश्मीरी गेट में सेंट जेम्स चर्च के पास ठीक वहां पर होता था। भगत सिंह केजीवन पर लंबे समय से शोध कर रहे वरिष्ठ लेखक राजशेखर व्यास ने रामनाथ फोटो स्टुडियो से दोनों क्रांतिकारियों की 1980 में फोटो खरीदी थी। रामनाथ स्टुडियो के बाहर ही  भगत सिंह की बड़ी सी फोटो लगी हुई थी। बहरहाल, बम फेंकने की घटना के बाद रामनाथ फोटो स्टुडियों पर भी पुलिस बार-बार पूछताछ के लिए आने लगी थी। जयदेव कपूर ने उपर्युक्त फोटो और नेगेटिव बाद में रामनाथ फोटो स्टुडियो  में जाकर लिए थे।

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