शनिवार, 7 अगस्त 2021

बात बे बात -52 / परशुराम शर्मा

 छोटी लाइन के सुनहले दिन - २


बात बे बात (५२) : आरा-सासाराम के ग्रामीण और शहरी बुजुर्ग आज भी अपने बच्चों को छोटी लाइन की कहानी सुनाते नहीं अघाते। सत्तर के दशक या बाद में जन्मे बच्चों को विश्वास नहीं होता कि कभी ऐसी कोई छोटी रेलगाड़ी उनके इलाके में चला करती थी। यह रेल सेवा साढ़े छह दशक तक इलाके की लाइफ लाइन‌ थी। उसे बंद कर दिया गया। काफी मशक्कत के बाद अब वहां बड़ी लाइन बिछ गयी है। उस रुट से भी बड़ी लाइन वाली बड़ी रेलगाड़ी दौड़ने लगी है। अब बच्चों के लिए पहले वाला आकर्षण नहीं रहा।


अंग्रेजी राज में बहुत पहले से सासाराम और आरा के बीच सस्ते में छोटी लाइन वाली छोटी रेलगाड़ी की सेवा उपलब्ध  थी। वह बड़े लोगों को भी लुभाती थी। समर्थवान लोग भी उससे शौकिया यात्रा करते थे। वीआईपी के लिए उसमें फर्स्ट क्लास का डिब्बा लगता था। उसमें सवार होकर कम्पनी के लोग सफर का आनंद उठाते थे। इस इलाके के मूल निवासी और उन दिनों लंदन में रह रहे एक अर्थशास्त्री जगन्नाथ गिरि ने अपनी आत्मकथा में छोटी लाइन की सुखद यात्रा के अनुभव का जिक्र किया है। वे कभी-कभी छुट्टियों में अपने लोगों से मिलने-जुलने एंव खेतीबारी का काम देखने गांव आया करते थे। उस किताब में छोटी लाइन की गाड़ी से सफर कर अपने गांव तक पहुंचने का उन्होंने रोचक वर्णन किया है।


छोटी लाइन बंद कर इस रुट पर नये सिरे से बड़ी लाइन बिछाने की बात शुरु हुई। पर यह प्रोजेक्ट लम्बे समय तक अधर में लटका रहा। इस दौर में आम लोगों को यहां भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। घनी आबादी वाला भोजपुर का यह बड़ा भूभाग पूरे तीस साल तक रेल सेवा से वंचित रहा। सन् १९७८ में छोटी लाइन  बंद हुई। तीस साल बाद २००८ में बड़ी लाइन चालू हुई । अगर समय रहते पहले अधिग्रहण हुआ रहता तो जनसाधारण को इतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती, जो एकाएक सीधे सड़क पर आ गये थे। 


देश में यह इलाका 'चावल का कटोरा' के नाम से मशहूर रहा है। इलाके में भारी मात्रा में धान की उपज होती है। यहां धान कूटने एवं चावल बनाने के अनेक छोटे-बड़े मिल और कारखाने लगे हैं। मुख्य रूप से चावल के तिजारत को बढ़ावा देने के लिए ही अंग्रेजी सरकार ने १९०९ से छोटी लाइन बिछाने का काम शुरू किया था। महज पांच साल में लाइन बिछाने का काम पूरा कर लिया गया। १९१४ से उस पर रेलगाड़ी दौड़ने लगी। इस काम के लिए कलकत्ता के मार्टिन एण्ड बर्न कम्पनी का सहारा लिया गया। बिहार तब तक बंगाल से अलग नहीं हुआ था। निजी क्षेत्र के इस कम्पनी ने स्थानीय जिला प्रशासन की मदद से जमीन लेकर फटाफट लाइन बिछाने का काम पूरा किया था।


कम्पनी की ओर से बिहार के दो अन्य जगहों पर भी छोटी लाइन की रेल सेवा शुरु हुई। आरा-सासाराम लाइट रेलवे के अलावा फतुहा-इस्लामपुर और राजगीर तक चलने वाली बख्तियारपुर-बिहार लाइट रेलवे के परिचालन का काम भी सौंपा गया। कम्पनी के लिए यह मुनाफे का सौदा रहा। बाद के दिनों में घाटा के चलते इसन अपनेे हाथ खींच लिए। वह कोई सरकारी संस्था तो थी नहीं, जो नुकसान सहती। जब रेल परिचालन के काम में घाटा होने लगा तो उसने समय रहते सरकार को प्रोजेक्ट बंद करने की बात बता दी। थोड़े ऊहापोह के बाद सरकार ने इसकी अनुमति दे दी। जबकि भारतीय रेल तारणहार हो सकती थी। पर रेलवे बोर्ड का रुख सकारात्मक नहीं हुआ। स्थानीय जनता को पांव पैदल कर दिया गया।


जहां तक पुराने शाहाबाद की बात है, तो उसके दोनों छोर, आरा और सासाराम, से होकर बड़ी लाइन पहले से गुजरती थी। आरा शहर हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर स्थित था। सासाराम भी ग्रैंड कोर्ड लाइन पर था। लेकिन बीच की एक बड़ी आबादी रेल सेवा से वंचित थी। खाद्यान्न उत्पादन बहुल इस इलाके को ध्यान में रख कर छोटी लाइन की रेल सेवा शुरू की गयी थी। इस खाली हिस्से को मार्टिन लाइट रेलवे से जोड़ा गया। इसका स्थानीय लोगों ने दिल खोल कर स्वागत किया। इस खुशी में भोजपुरी के लोकगीत बनाये गये। उन दिनों टोलियों में ग्रामीण ये गीत गाया करते थे। बचपन में हमें भी इस छोटी गाड़ी की सवारी बहुत प्यारी लगती थी। उस पर चढ़ना एक अलग मनोरंजन होता था। जिसे आज शायद हमलोग 'फील गुड' कहते। इसमें मनोरंजन भी था और साथ में यह एक सुहाना सफर था। ठीक वैसे ही, जैसे एक टिकट पर दो खेल चल रहा हो। हमारे लिए तो यह खिलौना रेलगाड़ी ही थी।


उधर, जब गाड़ी चली तो ग्रामीण जनता पहली बार अपने इलाके में सुगम और सस्ता रेल परिवहन की सुविधा पाकर बहुत खुश थे। आरा और सासाराम तक अब वे आसानी से आ-जा सकते थे। धान पैदा करने वाले किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिलने का फायदा दिखने लगा था। देश के दूसरी जगहों तक माल भेज कर अब  ज्यादा नकद कमा सकते थे। साथ ही स्थानीय जनता को अब दूर तक आने-जाने का सुगम जरिया मिल गया था। तब की बात तो छोड़ दें, अभी हाल तक यहां ग्रामीण इलाकों में सड़कों की बहुत कमी थी। लोग पैदल यात्रा करने को विवश थे। याद है कि बचपन में हम एक गांव से दूर के गांव बैलगाड़ी से या पैदल ही जाया करते थे। बारातियों को लड़की वालों के गांव तक पहुंचने में सारा का सारा दिन निकल जाता। सुबह चल कर शाम तक मंजिल तक पहुंचते। पैदल चलने में थक कर हम चूर हो जाते थे। तब ऐसी स्थिति नहीं रहती कि रात भर जग कर वहां हम समारोह का आनंद उठा सके। अक्सर हम पेट में दाना-पानी डाले बिना थके-मांदे शामियाना में घुसते ही सो जाते। नाच-गाना तक नहीं देख पाते। विवाह समारोह में शामिल होने का सारा मजा किरकिरा हो जाता। इलाके की ऐसी स्थिति हाल तक थी। गांवों की बात छोड़ भी दी जाये, तो वहां आवागमन के समुचित साधन नहीं रहने के कारण लोगों को जिला मुख्यालय आरा अथवा अपना व्यवसायिक शहर सासाराम भी तब परदेस प्रतीत होते थे। पर,अब वैसी बात नहीं रही। ज्यादातर गांवों में सड़कों का जाल बिछ गया है। 


पर सौ साल पहले यहां दयनीय हालत थी। आम लोगों की स्थिति कूप-मंडूक वाली थी। इसे देख आवागमन की  सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अंग्रेजी सरकार ने जिस तत्परता से कदम उठाये थे, ठीक इसके उलट आजादी के बाद की अपनी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार की शिथिलता लोगों को आश्चर्य में डाल देती है। वरना लोक कल्याण के ऐसे सार्वजनिक कार्य के लिए लोगों को इस मामले में तीस सालों का लम्बा इंतजार भला क्यों झेलना पड़ता ? केन्द्र की सेवा में रहे हमारे एक पुराने मित्र प्रसिद्ध नाट्यकर्मी कुमार अनुपम ने मुझे रेल सेवा बंद होने से उत्पन्न स्थिति के बारे में अपने कुछ निजी अनुभव मेरे फेसबुक पर शेयर किया है। उन्होंने लिखा है कि '"1977 में  फतुआ और सासाराम लाइट रेलवे सेवा अचानक बंद हो गयी और उसके पुराने कर्मचारी बेरोजगार होकर आंदोलन एवं धरने  पर बैठ गये...आंदोलन चल ही रहा था कि मुझे दिल्ली के दिनमान पत्रिका  से assignement मिला कि इस पर story तैयार कर भेजूं .....मैं फतुआ गया ...कर्मचारियों से मिला... वहां के लोगों से बात चीत  की ...रेल के अधिकारियों से मिला... जानकारी मिली थी कि मार्टिन बर्न लिमिटेड कंपनी का भारत सरकार के साथ करार हुआ था कि धीरे धीरे कई चरणों में मार्टिन रेलवे के सारे कर्मचारियों को भारतीय रेलवे absorb कर लेगी और मार्टिन रेलवे का अधिग्रहण हो जायेगा ....लेकिन भारत सरकार ने कुछ नहीं किया ....नतीजतन छोटी लाइन की हालत ऐसी नहीं रही कि वह अपने कर्मचारियों को वेतन भी दे सके ......पूरी रपट दिनमान में आवरण कथा के रूप में छपी ...मेरी रिपोर्ट को बड़े भाई अरुण रंजन जी ने सम्पादित  किया और शीर्षक दिया.. "गड़िया कहिया  से चलतइ"...उन दिनों संसद का सत्र चल रहा था ...तो कुछ सांसदों  ने दिनमान के उस अंक को संसद में लहराते  हुए मार्टिन रेलवे के अधिग्रहण की मांग तत्कालीन रेल मंत्री मधु दंडवते से की और उन्होंने ही पूर्व के समझौते  के अनुसार मार्टिन लाइट रेलवे को टेक ओवर करने की घोषणा की ......'"


इससे हमारी सरकार या भारतीय रेलवे में व्याप्त सिस्टम का ही खुलासा होता  है। इतना तो पता चल ही जाता है कि हमारा सिस्टम कितना जनोन्मुखी है ? वरना छोटी लाइन को ऐसे अनाथ नहीं छोड़ दिया जाता। तुरंत उसकी जगह कोई ठोस विकल्प खड़ा किया जाता। पर इस मामले में देरी हुई। क्योंकि सभी अपने सिस्टम से बंधे थे। यह सिस्टम हमारे आजाद भारत में देखने को मिल रहा था। अन्यथा आरा से सासाराम के बीच की आबादी को साठ-पैंसठ साल से मिल रही अपनी रेल सुविधा को पुनः चालू कराने के लिए पूरे तीस साल तक तरसना नहीं पड़ता ।


-- परशुराम शर्मा ।

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