सोमवार, 21 जून 2021

विष्णु प्रभाकर पर प्रकाश मनु - ( साभार )

कल प्रसिद्ध लेखक विष्णु प्रभाकर की जयंती थी। विष्णु प्रभाकर का नाम आते ही उनकी अमर कृति ‘आवारा मसीहा’ की याद आ जाती है। उसी बहाने उनको याद किया है वरिष्ठ लेखक प्रकाश मनु ने-

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विष्णु प्रभाकर हिंदी के दिग्गज साहित्यकार हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में बहुत कुछ नया और मूल्यवान जोड़ा। उसे अनुभव-विस्तार के साथ एक नया गौरव और गरिमा दी। विष्णु जी मूलतः कथाकार हैं, पर आश्चर्य, उनके द्वारा लिखी गई शरत की औपन्यासिक जीवनी को जो चतुर्दिक ख्याति मिली, वह हिंदी साहित्य की एक विरल और ऐतिहासिक घटना है। हिंदी में जीवनी साहित्य बहुत लिखा गया, पर शरत की जैसी शाहकार जीवनी विष्णु प्रभाकर ने लिखी, वह अपने आप में एक मयार है। किसी बड़े और बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा के धनी लेखक की सुंदर और सांगोपांग जीवनी कैसी होनी चाहिए, उसे किस तल्लीनता से लिखा जाना चाहिए, इसे ‘आवारा मसीहा’ पढ़कर जाना जा सकता है। सच तो यह है कि अपने अथक श्रम और अतुलनीय समर्पण से विष्णु जी ने हिंदी में जीवनी साहित्य को जिस असंभव लगती ऊँचाई तक पहुँचा दिया, वह आज भी बहुतों के लिए स्पृहणीय है।

‘आवारा मसीहा’ शरत सरीखे बड़े कद के साहित्यकार की एक संपूर्ण जीवनी तो है ही, पर इसके साथ ही वह एक ऐतिहासिक महत्त्व की कृति बन गई, जिसमें सर्जना का अपार सौंदर्य है। यही उसे विलक्षण बनाता है। उसमें जितनी गहराई है, उतना ही भावनाओं का विस्तार भी, जितना असाध्य श्रम है, उतनी ही रस में ऊभ-चूभ करती सृजनात्मकता भी। किसी उपन्यास से ज्यादा रोचक और रसपूर्ण होने के साथ ही, उसमें किसी नदी की अजस्र धारा जैसा प्रवाह है और हर क्षण मन में यह जिज्ञासा और कौतुक बना रहता है कि आगे अभी और क्या सामने आना है, अभी क्या कुछ और उस रहस्य के परदे से बाहर आना है, जिसने जाने-अनजाने  शरत के व्यक्तित्व को ढककर, उसे असंख्य किंवदतियों का विषय बना दिया है।

यों सच पूछिए तो ‘आवारा मसीहा’ शरत के जीवन से जुड़े तथ्यों की पुनःपुनः खोज ही नहीं, यह एक तरह से शरत का पुनराविष्कार है, यानी ‘ए डिस्कवरी ऑफ शरत’। शरत सरीखे बड़े कद के और कुछ-कुछ बोहेमियन किस्म के बीहड़ साहित्यकार की जीवनी ऐसी ही हो सकती थी।

विष्णु जी ने खुद को समूचा झोंककर शरत की जीवनी लिखी। पर लिखने के बाद संभवतः विष्णु प्रभाकर भी वही नहीं रह गए, जो इस जीवनी को लिखने से पहले थे। उनकी पहचान ही नहीं, साहित्यिक परिचय भी हमेशा-हमेशा के लिए बदल गया था। अब वे घर-घर ‘आवारा मसीहा’ वाले विष्णु प्रभाकर के रूप में जाने जा रहे थे। हिंदी के हजारों पाठकों ने ‘आवारा मसीहा’ को पढ़ा और पढ़ते ही सबके होंठों पर बस एक ही शब्द सुनाई देता, “अद्भुत…!”

हालाँकि जिस समय कालजयी कथाकार शरतचंद्र पर जीवनी लिखने का प्रस्ताव विष्णु जी के सामने आया, उन्हें पता नहीं था कि एक विशाल समंदर सामने है और उसके नजदीक जाते ही वे उसमें इतना गहरे उतरते जाएँगे कि बरसों तक उनकी इस खोज-यात्रा का कोई ओर-छोर ही नहीं रहेगा। उनका अपना लिखना तो छूटेगा ही, भीतर का चैन भी। और वे तो बस उस अनंत मायावी शरत, शरत, बस शरत के होकर रह जाएँगे। उनकी हर साँस-साँस में शरत बस जाएँगे।

वे सोच रहे थे, शरत इतने बड़े लेखक हैं तो बंगाल में जरूर उन पर कुछ अच्छी जीवनियाँ लिखी गई होंगी। कुछ और सहायक सामग्री भी आसानी से उपलब्ध हो जाएगी। उस सबकी मदद लेने पर थोड़ी आसानी हो जाएगी और फिर रास्ता मिलने लगेगा। पर जब उन्होंने छान-बीन शुरू की तो पता चला कि वहाँ तो ऐसा कोई काम हुआ ही नहीं। बल्कि इसके उलट वहाँ हालत यह थी कि शरत का नाम लेना भी बहुतों के लिए अखरने वाला था। उनके बारे में लोगों में एक गोपन रहस्य का सा भाव था। कोई कुछ बताता, कोई कुछ। परस्पर विरोधी चीजें कही जातीं। बेसिर-पैर की अफवाहें भी।

विष्णु जी के लिए यह एक अकल्पनीय अनुभव था, जिसने उनके भीतर एक थरथराहट सी भर दी। वे आखिर कैसा काम करने जा रहे हैं, जिसके ओर-छोर का ही उन्हें पता नहीं। यहाँ तक कि कोई ऐसा सिरा भी नहीं मिल रहा था, जहाँ से बात शुरू की जाए।

कुछ लोग तो शरत से इतने नाराज थे कि उनका नाम सुनते ही भड़क उठते। उनके लिए शरत एक निहायत पतित, बदनाम और गिरा हुआ शख्स था, जिसकी चर्चा करने से कोई फायदा नहीं। देख-सुनकर विष्णु जी हक्के-बक्के। वे समझ गए कि शरत की जीवनी को लिखने के लिए उन्हें बहुत छोटी-छोटी चीजों के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा। यह तो अपने आप में एक बीहड़ शोध-कार्य जैसा है, जिसमें चारों ओर फैली तरह-तरह की भ्रांतियों और दुस्तर जंगली झाड़ियों के अंबार में से सच्चाई के कण ढूँढ़कर लाने होंगे। लिखने की शुरुआत तो फिर बाद में होगी।

उस समय दुर्भाग्य से, विष्णु जी की घरेलू स्थितियाँ भी कुछ अच्छी नहीं थीं। वे मसिजीवी लेखक थे। रोज कुआँ खोदना और पानी पीना। लेखन से जो आय होती, उसमें मुश्किल से गुजारा होता था। फिर शरत की जीवनी लिखी जाए, तो यह उनके साहित्यिक कद और गरिमा के अनुकूल होनी चाहिए। जाहिर है कि जैसी जीवनी लिखने का खयाल उनके मन में था, उसे लिखने में बहुत श्रम और समय लगने वाला था। पर इतने समय तक घर कैसे चलेगा, यह एक अलग चिंता थी। पत्नी सुशीला जी समझती थीं। उनका संबल विष्णु जी का बल था और उन्होंने हाँ कह दी।

लेकिन मन कह रहा था, “बहुत कठिन है डगर पनघट की…!”

विष्णु जी के जीवन में यह पहली ऐसी घटना थी, जिसने उन्हें भीतर-बाहर से झिंझोड़कर रख दिया।

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पुस्तक की भूमिका में विष्णु जी ने ‘आवारा मसीहा’ के लिखे जाने की पूरी कहानी लगभग उसी भावोत्तेजना के सीथ टाँक दी है, जिससे उन्हें गुजरना पड़ा था। और यह कहानी, खुद में किसी रोमांचक कथा से कम नहीं है। विष्णु जी ने लिखा है—

“कभी सोचा भी न था कि एक दिन मुझे अपराजेय कथाशिल्पी शरतचंद्र की जीवनी लिखनी पड़ेगी। यह मेरा विषय नहीं था, लेकिन अचानक एक ऐसे क्षेत्र से यह प्रस्ताव मेरे पास आया कि मुझे स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। हिंदी ग्रंथ रत्नाकर, बंबई के स्वामी श्री नाथूराम प्रेमी ने शरत साहित्य का प्रामाणिक अनुवाद हिंदी में प्रकाशित किया है। उनकी इच्छा थी कि इसी माला में शरतचंद्र की एक जीवनी भी प्रकाशित की जाए। उन्होंने इसकी चर्चा यशपाल जैन से की और न जाने कैसे लेखक के रूप में मेरा नाम सामने आ गया। यशपाल जी के आग्रह पर मैंने एकदम ही यह काम अपने हाथ में लिया हो, ऐसा नहीं था। लेकिन अंततः लेना पड़ा, यह सच है। इसका मुख्य कारण था, शरतचंद्र के प्रति मेरी अनुरक्ति।”

शरत की जीवनी लिखने में तमाम झंझट थे। पर सबसे बड़ी मुश्किल तो खुद शरत का चरित्र था, जो खासा पेचीदा और जटिल था। उनमें एक अजब तरह का आत्मगोपन था। खुद को जान-बूझकर छिपाकर रखने का विचित्र रहस्यात्मक रवैया। यह क्यों था, समझना मुश्किल था। फिर इसके साथ ही मित्रों के साथ गप लगाते हुए, शरत जो तमाम बातें कहते, उनसे चीजें और उलझ जातीं। हर बार घटना को कोई और रूप सामने आता। विचित्र भूल-भुलैया थी। विष्णु जी को कतई समझ में नहीं आ रहा था कि सच्चाई क्या है। उलटा वे जितना आगे बढ़ते, सत्य पर रहस्य के कुछ और परदे पड़ जाते। तो फिर सच्चाई का पता कैसे चले? विष्णु जी अपनी यह ऊहापोह छिपाते नहीं है। वे बड़ी साफगोई के साथ लिखते हैं—

“यह धारणा सत्य ही है कि मनुष्य शरतचंद्र की प्रकृति बहुत जटिल थी। साधारण बातचीत में वे अपने मन के भावों को छिपाने का प्रयत्न करते थे और उसके लिए कपोलकल्पित कथाएँ गढ़ते थे। कितने अपवाद, कितने मिथ्याचार, कितने भ्रांत विश्वासों से वे घिरे रहे। इसमें उनका योग भी कुछ कम नहीं था। वे परले दर्जे के अड्डेबाज थे, घंटों कहानियाँ सुनाते रहते। जब कोई पूछता कि क्या यह घटना उनके जीवन में घटी है तो वे कहते, न…न, गल्प कहता हूँ। सब गल्प, मिथ्या, एकदम सत्य नहीं। इतना ही नहीं, एक ही घटना को जितनी बार सुनाते, नए-नए रूपों में सुनाते…!”

फिर एक मुश्किल यह थी कि विष्णु जी के लिए जीवनी लेखन के मानक बहुत ऊँचे थे। कुछ भी लिखकर काम चला लेना उनका उद्देश्य न था। शरत जैसे महाकार व्यक्तित्व पर वे कलम चला रहे थे तो जीवनी भी तो वैसी ही होनी चाहिए। उसमें उनकी लेखकीय शख्सियत, भीतर की बेचैनियाँ और जीवन की सच्ची, प्रामाणिक गाथा न आए तो लिखने से फायदा? यहाँ कोरी गप और किंवदंततियों से काम नहीं चल सकता। यों विष्णु जी के लिए जीवनी लेखन का आदर्श क्या है और क्या कसौटियाँ हैं, इसकी ओर उन्होंने स्वयं भी इशारा किया है—

“कला के लिए सत्य भले ही संपूर्ण आदर्श न हो, परंतु जीवन चरित्र लिखना इस दृष्टि से विज्ञान के अधिक पास है और उसका दर्शन सत्य ही है। पर जैसा कि पहले कहा जा चुका है, घटना तो सत्य नहीं है। उसका जीवन में महत्त्व है, लेकिन उससे अधिक महत्त्व है घटना के पीछे की प्रेरणा का। वही प्रेरणा सत्य है। मैंने इतना समय इसीलिए लगाया कि मैं भ्रांत और अभ्रांत घटनाओं के पीछे के सत्य को पहचान सकूँ, जिससे घटनाओं से परे जो वास्तविक शरच्चंद्र हैं, उनका रूप पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा सके। यह सब कैसे और किस प्रकार हुआ, यह मैं नहीं बता सकूँगा। जिसे सिक्स्थ सेंस कहते हैं, शायद वही मेरी सहायक रही। मैं अधिक से अधिक उन व्यक्तियों से मिला जिनका किसी न किसी रूप में शरच्चंद्र से संबंध था। उन सभी स्थानों पर गया, जहाँ वे या उनके उपन्यासों के पात्र रहे थे। उस वातावरण में रमने की कोशिश की, जिसमें वे जिए थे। शायद इसी प्रयत्न के फलस्वरूप मैं एक ऐसी तसवीर बनाने में यत्किंचित सफल हो सका, जो शरीर-रचना विज्ञान (एनोटोमी) की दृष्टि से भले ही सही न हो, पर उसके पीछे जो चेतना-तत्व होता है, उसको समझने में अवश्य ही सहायक हुई।”

‘आवारा मसीहा’ शरत की प्रामाणिक जीवनी बने, इस लिहाज से विष्णु जी ने अधिक छूट लेने के बजाय शरत के मित्रों, संबंधियों और उनके समय के लोगों की कही हुई बातों, संस्मरणों आदि पर कहीं अधिक भरोसा किया। कोरी कल्पना की उड़ान से वे बचे। अपने मन से कोई प्रसंग या घटना नहीं जोड़ी। साथ ही कोई ऐसी बात उनके मुख से नहीं कहलवाई जो स्वाभाविक न हो। इससे विष्णु जी की राह थोड़ी और मश्किल हो गई, पर वे इस जीवनी को शरत की सर्वथा प्रामाणिक और आधिकारिक जीवनी बना पाने में कामयाब हुए। कुछ अरसे बाद पुस्तक का नया संस्करण आया, तो पुस्तक की दूसरी भूमिका लिखने की जरूरत महसूस हुई। पुस्तक की दूसरी भूमिका में विष्णु प्रभाकर लिखते हैं—

“आवारा मसीहा में आई किसी घटना के बारे में मैंने कल्पना नहीं की। जितना और जैसी जानकारी पा सका हूँ, उतना ही मैंने लिखा है। प्रथम पुरुष के रूप में उनके मुख से जो कुछ कहलवाया है, वह सब शरत के उन मित्रों के संस्मरणों से लिया है जो उसके साक्षी रहे हैं। यथासंभव उन्हीं की भाषा का प्रयोग मैंने किया है। प्रामाणिकता की दष्टि से एक-दो स्थानों पर उनकी रचनाओं में आए उन्हीं स्थलों के वर्णन का भी सहारा लिया है। पर ऐसा बहुत कम किया है। मैंने अगर स्वतंत्रता ली भी है तो उतनी ही, जितनी एक अनुवादक ले सकता है।”

इससे काफी कुछ समझ में आ जाता है कि शरत की जीवनी लिखते समय विष्णु जी को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

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फिर शरत की जीवनी लेखन में कदम-कदम पर मुश्किलें थीं। यों भी एक लेखक या कलाकार का चरित्र आम आदमी से भिन्न और किसी मायने में अबूझ होता है। उसका जीवन जीने का ढंग ही नहीं, बहुत सी जिदें, आकांक्षाएँ, स्वाभिमान, यहाँ तक कि रोजमर्रा की चीजों को लेकर उसकी सोच और व्यवहार भी औरों से अलग नजर आता है। वह छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ तलाश लेता है। लेकिन जिन चीजों से हजारों लोग बेपरवाह हों, उन पर घंटों गमगीन बना रह सकता है।

विष्णु जी ने देखा कि शरत में भी ऐसा बहुत कुछ है, जो उन्हें आम इनसानों से अलगाता है। पर इतना ही नहीं, शरत में ऐसा भी बहुत कुछ था, जो उन्हें दूसरे लेखकों की कतार में भी शामिल नहीं होने देता। वे सदाचार के प्रचलित मानदंडों और नैतिकता की बँधी-बँधाई धारणाओं पर चोट करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। यही नहीं, वे जीवन में हर तरह के ढोंग और छद्म के खिलाफ थे और खुलकर उनका मजाक उड़ाते थे। इससे यथास्थितिवादी नैतिकता के प्रहरियों और तथाकथित धर्मधुरीणों में हाहाकार मच गया। खुद को समाज के कर्णधार मानने वाले तिलमिला गए। उनकी नजरों में शरत तो मानो आचार-विचार की सारी सरहदें लाँघ गए थे—

“शरत बाबू के चरित्र को लेकर समाज में जो भ्रांत धारणा बन गई थी, उसकी चर्चा करना असंगत न होगा। कलाकार का चरित्र साधारण मानव से किसी न किसी रूप में भिन्न होता ही है। फिर शरत बाबू तो बचपन से ही अभाव और अपमान के उस वातावरण में जिए, जहाँ आदमी या तो विद्रोह कर सकता हो या आत्महत्या। उनके अंतर में जो साहित्यकार सोया पड़ा था, उसने उन्हें पहला मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। इसलिए उन्होंने तत्कालीन समाज के कठोर विधि-विधान को मानने से इनकार कर दिया। सदाचार के प्रचलित मानदंडों पर चोट करते हुए उन्होंने वही किया जो यथास्थितिवादी मुखियाओं के लिए अकरणीय था, तब वे चरित्रहीन का विरुद न पाते तो आश्चर्य ही होता?”

विष्णु जी ने शरत पर लिखी गई इस शाहकार जीवनी का नाम रखा, ‘आवारा मसीहा’। इस पर भी तर्क-वितर्क की कोई सीमा नहीं थी। कुछ लोगों को लगा, ‘आवारा’ और ‘मसीहा’ तो परस्पर विरोधी गुणधर्म वाले शब्द हैं, भला इन्हें एक साथ रखने की क्या तुक? कुछ लोगों को ‘आवारा मसीहा’ में ‘आवारा’ विशेषण पसंद नहीं था और कुछ को लग रहा था कि शरत कोई मसीहा तो नहीं! तो भला मसीहा किसलिए? और फिर ‘आवारा मसीहा’ पद की भी ऐसी-ऐसी विचित्र व्याख्याएँ हुईं कि खुद विष्णु जी चकित रह गए। अंत में उन्हें स्पष्ट करना पड़ा—

“आवारा मसीहा नाम को लेकर भी काफी ऊहापोह मची है। वे-वे अर्थ किए गए जिनकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं तो इस नाम के माध्यम से यही बताना चाहता था कि कैसे एक आवारा लड़का अंत में पीड़ित मानवता का मसीहा बन गया। आवारा और मसीहा दो शब्द हैं। दोनों में एक ही अंतर है, आवारा के सामने दिशा नहीं होती। जिस दिन उसे दिशा मिल जाती है, उसी दिन वह मसीहा बन जाता है। मुझे खुशी है कि अधिकतर मित्रों ने इस नाम को इसी संदर्भ में कबूल किया है।”

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शरत की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ तीन खंडों में विभक्त है। प्रथम पर्व ‘दिशाहारा’, द्वितीय पर्व ‘दिशा की खोज’ और तृतीय पर्व ‘दिशांत’। इनमें प्रथम पर्व ‘दिशाहारा’ में शरत के अनंत भटकावों की कथा है। उनके बचपन की शरारतें, छात्रावस्था की तरह-तरह की गतिविधियाँ, शुरू से ही जीवन को निकट से देखने और साथ ही गंभीर अध्ययन की प्रवृत्ति, विद्रोही चरित्र, घर-परिवार, माता-पिता और नाना-नानी के चरित्र की विशेषताएँ और उस परिवेश में शरत के लगातार अनफिट बने रहने की कथा। फिर अंततः माँ के गुजरने के साथ ही हताश होकर रंगून जाने की कथा जीवनी के प्रथम पर्व में बहुत स्वाभाविक रूप से आती है।

यों प्रथम पर्व में बहुत गहराई से शरत के बचपन, कैशौर्य काल और तरुणाई की विद्रोही रेखाओं और कुछ-कुछ स्वच्छंद, अराजक व्यक्तित्व को उकेरा गया है। यह एक तरह से उनके जीवन के पूर्वार्ध की कथा है, जिसमें तमाम मोड़, अँधेरे और उलझाव हैं, जिसके साक्षी बहुत अधिक न थे। लिहाजा इस सबके बारे में पता करना निश्चय ही विष्णु जी के लिए सबसे मुश्किल और दुष्कर काम रहा होगा, अँधेरे में हाथ-पैर मारने की तरह। पर यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं कि उन्होंने शरत के इन अल्पज्ञात प्रसंगों को पूरे विस्तार के साथ पाठकों के आगे प्रस्तुत किया।

इतना ही नहीं, विष्णु जी ने शरत के विद्यार्थी जीवन की बहुत सी गतिविधियों के बारे में बहुत सटीक जानकारी दी है। जीवन को निकट से देखने का जिद्दी स्वभाव, बहुत बार अपनी बातों के लिए अड़ जाना, एक ओर गंभीर अध्ययनशील व्यक्तित्व और दूसरी ओर खतरों से खेलने की दुस्साहसी प्रवृत्ति। शरत के लेखक होने की भूमिका शायद यहीं से बनने लगी थी। विष्णु जी लिखते हैं—

“स्कूल में एक छोटा सा पुस्तकालय भी था। वहीं से लेकर उसने उस युग के सभी प्रसिद्ध लेखकों की रचनाएँ पढ़ डालीं। युगसंधि के इस काल में जब कर्ता लोग चंडीमंडप में बैठकर चौपड़ को लेकर शोर मचाते, तब किशोर वय के लोग चोरी-चोरी बंकिम, रवींद्र की पुस्तकों के पन्ने पलटते। लेकिन शरत केवल पढ़ता ही नहीं था, उसको समझने और आसपास के वातावरण का सूक्ष्म अध्ययन करने की सहज प्रतिभा भी उसमें थी। वह हर वस्तु को करीब से देखता था।”

बहुत समय तक शरत को अनिच्छा से नाना के परिवार में रहना पड़ा। वहाँ का अभिजात वातावरण उसे पसंद नहीं था। उसका बोहेमियन व्यक्तित्व एक तरह से उसके विद्रोह की अभिव्यक्ति थी। आखिर माँ के न रहने पर शरत जीविका की खोज में लंबे रंगून प्रवास के लिए निकल पड़ा। यह एक टूटा, थका हुआ शरत था, जिसे जीवन में कोई उम्मीद नहीं थी। यहाँ तक कि मित्रों के बहुत कहने पर उसने एक कहानी प्रतियोगिता में कहानी भेजी तो, पर उसे भी मामा सुरेंद्रनाथ गांगुली के नाम से भेजा। उसकी कहानी उस प्रतियोगिता के लिए आई आखिरी कहानी थी। एकदम अंतिम क्षणों में जमा की गई आखिरी प्रविष्टि। उसी को पुरस्कार भी मिला। पर शरत तो पहले ही रंगून कूच कर चुका था। विष्णु जी ने इस समय के शरत की मनःस्थिति का बहुत ही सटीक अंकन किया है—

“इस पलायन के साथ-साथ उसके जीवन रूपी नाटक का एक अंक जैसे समाप्त हो गया। उसकी आयु छब्बीस वर्ष की हो चुकी थी। यौवन का सूर्य मध्याकाश में था, लेकिन जैसे ठंडे और घने कुहरे ने उसे आच्छादित कर दिया था। ‘श्रीकांत’ की तरह दूसरे की इच्छा से दूसरे के घर में वर्ष के बाद वर्ष रहकर वह अपने शरीर को कैशोर्य से यौवन की ओर धकेलता रहा था, लेकिन मन को न जाने किस रसातल की ओर खदेड़ता रहा। उसका वह मन कभी लौटकर नहीं आया।”

विष्णु प्रभाकर के इन कारुणिक शब्दों में जैसे शरत की दिशाहीन तरुणाई की पूरी तसवीर उभर आती है। बाद में चलकर शरत पर इसका इतना गहरा असर पड़ा कि वे जीवन भर तरुणाई की इन अप्रिय यादों को भुला नहीं सके, और कभी अपने समय के दूसरे लेखकों की तरह सहज, सामान्य भी नहीं हो पाए।

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‘आवारा मसीहा’ के दिवितीय पर्व ‘दिशा की खोज’ में शरत के रंगून प्रवास की कथा है। वे रंगून के लिए जहाज पकड़ने पहुँचे तो देखा, वहाँ एक महा जनसमुद्र है। अपार भीड़भाड़ में वे किसी तरह बर्मा पहुँचे तो वहाँ चेकिंग के लिए रोक लिया गया। उन दिनों प्लेग का भीषण प्रकोप था। इसलिए भारत से आने वाल लोगों को सघन जाँच के बाद ही बर्मा में प्रवेश की अनुमति दी जाती थी। शरत बहुत समय तक इसी जाँच के लिए अटके रहे। विचित्र बेबसी से भरी परिस्थिति थी। वे सोच रहे थे कि क्या इसी झंझट और बेकद्री के लिए वे बर्मा आए हैं?

फिर वे मौसी के घर पहुँचे तो मौसा जी ने, जो वहाँ की जानी-मानी शख्सियत थे, उन्हें डाँटा। बोले, “तुम भी बड़े मूर्ख हो। लोग तो यहाँ मेरा नाम लेकर जाँच से बच जाते हैं। तुमने मेरे बारे में बताया क्यों नहीं?”

सुनकर शरत को झेंपना पड़ा।

शरत के मौसा वाकई खासे प्रभावशाली व्यक्ति थी। उनकी वहाँ अच्छी-खासी जान-पहचान थी। बड़ी हैसियत थी, लोग इज्जत करते थे। उन्हीं की कोशिशों से शरत को चुंगी पर नौकरी मिली। शरत को थोड़ा ठिकाना मिला, जीवन में कुछ स्थिरता आई। पर दुर्भाग्य से कुछ समय बाद मौसा जी भी बीमारी की चपेट में आ गए। देखते ही देखते वे काल-कवलित हो गए। शरत के लिए फिर परेशानियों का दौर शुरू हो गया।

यों बर्मा आकर भी शरत को चैन नहीं मिला। एक के बाद एक कई नौकरियाँ पकड़ना और छोड़ना। चित्त में चैन नहीं था और जीवन में स्थिरता भी नहीं थी। हाँ, उसने अब जमकर लिखना शुरू कर दिया था। उसका व्यक्तित्व जैसे जाग उठा। उसके भीतर की सोई हुई शक्तियाँ अँगड़ाई लेकर उठ खड़ी हुईं। वह औरों से एकदम अलग और विलक्षण लगता। बातें ऐसी कि लोग सुनते तो जादू हो जाता। समय का किसी को बोध ही न रहता था। इसलिए जहाँ भी वह जाता, उसका व्यक्तित्व सब पर छा जाता।

जल्दी ही शरत के बहुत मित्र और प्रशंसक बन गए। उसकी बातें और किस्से सुनने के लिए लोग बेसब्र थे, जिनमें जीवन के इतनी तरह के अनुभव थे कि सुनने वाले दंग रह जाते। वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह कैसा शख्स है, जो हर पल किस्से-कहानियों की दुनिया में ही रहता है! इसके पास ऐसी अजब-अनोखी कहानियों का खजाना आया कहाँ से? क्या इसके भीतर कहानियों का कोई कारखाना है कि कहानियाँ कभी खत्म होती ही नहीं?

फिर शरत का सुनाने का ढंग भी तो लाजवाब था। सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते। बड़े से बड़े लोग उसके प्रशंसक थे, तो बहुत छोटे-छोटे काम-काज करके जीने वाले एकदम मामूली लोग भी। वे हर पल उसे घेरे रहते। शरत की निकटता हर किसी को मोहती थी। लिहाजा देखते ही देखते हर ओर शरत के खुले स्वच्छंद व्यक्तित्व और उनकी रचनाओं की खूब चर्चा होने लगी थी—

“एक के बाद एक कई नौकरियाँ उसे मिलीं, लेकिन वे सब अस्थायी थीं। बीच-बीच में बेकार रहना पड़ता था। इस बेकारी का अर्थ था बाँसुरी बजाना, शतरंज खेलना, शिकार करना या फिर गेरुए वस्त्रों की शरण लेना। पौंगी बनकर वह अपनी चिरपरिचित दिशाहीन यात्रा पर निकल पड़ता। थक जाता तो फिर रंगून लौट आता। बर्मा में हर व्यक्ति को जीवन में एक बार पौंगी बनना ही होता है। उसकी अवधि सात दिन से लेकर जीवन-पर्यंत हो सकती है। इस वेश में उन्हें खूब सम्मान मिलता है और वे बहुत कुछ करने को स्वतंत्र होते हैं। चरस-सिनेमा कुछ भी वर्जित नहीं होता। इसलिए शरत को यह वेश धारण करने में कोई असुविधा नहीं होती थी। वैसे भी लंबे-लंबे बालों और दाढ़ी से उसे विशेष प्रेम था। बाउलों का वेश था न, सोचता होगा, बाउलों के वेश में एकतारा लिए गाता रहूँ, घूमता रहूँ।”

शरत जैसे-जैसे साहित्य में गहरे उतरते गए, दफ्तर के काम पीछे छूटने लगे। उधर कलकत्ता में उनके नाम की अजीब सी पुकार थी। लोग हैरानी से कह रहे थे, आखिर कौन है यह शरत जिसकी रचनाओं में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी अद्भुत कला और ऊँचाई है? यह कहाँ छिपा हुआ है, सामने क्यों नहीं आता? लोग बार-बार उसे कलकत्ता आने के लिए चिट्ठियाँ लिख रहे थे। आखिर दफ्तर छूटा और बर्मा भी हमेशा-हमेशा के लिए छूट ही गया—

“साहित्य में यश था, अर्थ था, लेकिन दफ्तर के कार्य की उपेक्षा अनिवार्य थी। वह अधिक परिश्रम करने का आदी नहीं था। स्वास्थ्य एकदम खराब था। उसने त्यागपत्र दे दिया। संभवतः उसकी एक वर्ष की छुट्टी शेष थी। वह उसने ली और कलकत्ते के लिए रवाना हो गया। उसके बाद वह फिर कभी बर्मा नहीं गया। लेकिन इतिहासकार इस बात को कैसे भूल सकेंगे कि कथाशिल्पी शरतचंद्र का पुनर्जन्म बर्मा में ही हुआ था। ‘श्रीकांत’, ‘चरित्रहीन’, ‘छवि और अधिकार’ सभी पर इस जीवन की अमिट छाप है। बर्मा-प्रवास में वह ऐसे ही व्यक्तियों के संपर्क में आया, जिनका बौद्धिक स्तर ऊँचा था, परंतु उसके अधिकतर साथी महत्त्वहीन और अजाने ही थे। उन्हीं के द्वारा प्रोत्साहन पाकर यह निर्धन, अर्द्धशिक्षित और आवारा युवक साहित्य के उस क्षेत्र में प्रवेश पा सका, जहाँ महानता उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।”

जाहिर है, शरत जब बर्मा आया था, तो वह कुछ और था। एकदम महत्त्वहीन और खोया-खोया सा। एक गुमशुदा व्यक्ति की तरह। लेकिन जब वह बर्मा छोड़ रहा था तो एक तरह से उसने अपना कद पा लिया था, और खोई हुई दिशा भी, जो अब तक उसे भटकाती रही थी। यों शरत बर्मा से निकला तो अपने जीवन की बहुत सारी उलझी हुई गुत्थियों से भी वह धीरे-धीरे बाहर आ रहा था।

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‘आवारा मसीहा’ के तृतीय पर्व ‘दिशांत’ में शरत के रंगून से लौटने के बाद की कथा है। विष्णु जी के शब्दों में, “जिस समय शरत ने कलकत्ता छोड़कर रंगून की राह ली थी, उस समय वह तिरस्कृत, उपेक्षित और असहाय था, लेकिन अब जब वह तेरह वर्ष बाद कलकत्ता लौटा तो ख्यातनामा कथाशिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। वह अब वह नहीं रह गया था, वे के पद पर प्रतिष्ठित हो चुका था।”

सृजन के लिहाज से शरत का यह स्वर्ण काल था। इस समय उनकी अवस्था उनतालीस वर्ष की हो चुकी थी। आगे करने के लिए बहुत काम थे। मन में अधूरे सपनों का लंबा कारवाँ। लोग उन्हें देखने के लिए बेसब्र थे। खासकर कलाकारों और साहित्यिकों के मन में उनके लिए अपार सम्मान का भाव था। और आम लोगों में भी एक अजब सी रहस्यपूर्ण उत्सुकता और कुतूहल का भाव, कि जरा देखें तो ‘चरित्रहीन’ लिखने वाला यह दुस्साहसी लेखक है कैसा—

“उनके प्रति बंगाल के लोग कितने उत्सुक थे और किस प्रकार उनका स्वागत हुआ, यह तथ्य किसी भी साहित्यिक के लिए ईर्ष्या का कारण हो सकता है। नाटककार द्विजेंद्रलाल राय शरत के प्रशंसक थे, लेकिन उनके पुत्र दिलीपकार राय (जो बाद में संगीतज्ञ के रूप में मशहूर हुए) उनसे भी अधिक उसके भक्त हो चुके थे। चरित्रहीन के कारण शरच्चंद्र को जो बदनामी मिली, उससे वे और भी उनके हीरो बन गए। वे मन ही मन सोचते, वे कलकत्ता क्यों नहीं आते? ऐसे देश में क्यों पड़े हैं जहाँ लोग नाप्पि खाते हैं?”

साहित्य में एक सम्मानजनक स्थान बन जाने पर शरत ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में रहना शुरू किया। जब वे रंगून गए थे तो अपने छोटे भाई-बहनों को जैसे-तैसे रिश्तेदारों के घर छोड़कर चले गए थे। लौटकर वे सबसे मिले। उन्होंने पूरे परिवार की सुध ली। सबको इकट्ठा करने की कोशिश की। छोटा भाई उनके साथ रहने लगा। एक भाई रामकृष्ण मिशन में वृंदावन का काम देख रहे थे। वे भी जब कभी आते, शरत के पास ही ठहरते थे।

शरत के लिए साहित्यकार होने का मतलब केवल पन्ने काले करना ही नहीं था। उस समय देश और समाज के सामने एक से एक बड़ी चुनौतियाँ थीं। वह पराधीनता का काल था और अंग्रेजी दमन की कोई सीमा नहीं थी। शरत भला आँख मूँदकर इसे कैसे देखते रह सकते थे? उस समय चितरंजन दास और विपिनचंद्र पाल के जोशीले भाषणों से पूरे समाज में स्वाधीनता की लहर पैदा हो गई थी। कलकत्ता वासियों के जोश का भी पारावार न था।

शरत ने चितरंजन दास का साथ देने का निर्णय कर लिया। स्वयं चितरंजन दास भी उनकी बड़ी इज्जत करते थे। वे शरत को साथ लेकर घर-घर चंदा माँगने के लिए जाने लगे। कुछ लोग उदारता से चंदा देते, पर कुछ टरका देते। कभी-कभी दिन भर घूमने पर भी कुछ खास न मिलता। शरत उद्वेलित हो उठे। बोले, “छोड़िए, जनता में उत्सर्ग की भावना ही नहीं है।” इस पर चितरंजन दास ने समझाया, “बार-बार जनता के पास जाना हमारा काम है। इसी से लोगों में देशाभिमान और उत्सर्ग की भावना उत्पन्न होगी।”

यों शरत ने राजनीति का एक बड़ा मर्म समझा। धीरे-धीरे उनका लिखना-पढ़ना कम होता गया और वे पूरी तरह राजनीति में डूब गए। इससे घर के लोगों को चिंता हुई, मित्रों को भी। वे तो शरत से कुछ और ही उम्मीद कर रहे थे—

“शरतचंद्र उस समय आकंठ राजनीति में डूबे हुए थे। उनकी पत्नी और उनके सभी मित्र इस बात से बहुत दुखी थे। क्या हुआ उस शरतचंद्र का जो साहित्य का साधक था, जो अड्डा जमाने में सिद्धहस्त था, जो अभद्र भेलू और प्राणप्रिय पक्षी के लिए कुछ भी सहने को तैयार था।। राजनीति ने उस असली शरचचंद्र को ग्रस लिया था। लेकिन वे बिल्कुल भी लिखते न हों, ऐसी बात नहीं थी। शरत गंथावली के पाँचवें खंड के अतिरिक्त ‘नारी का मूल्य’ (संदर्भ) और ‘देना-पावना’ उपन्यास इसी काल में प्रकाशित हुए। ‘श्रीकांत’ का तीसरा पर्व, ‘पथेर दाबी’, ‘नवविधान’ और ‘जागरण’, ये चार उपन्यास भी उन्होंने इसी काल में लिखने आरंभ किए। उसी काल में प्रकाशित हुईं उनकी दो प्रसिद्ध कहानियाँ ‘महेश’ और ‘अभागी का स्वर्ग’।”

शरत के भीतर देश की आजादी के लिए जो भीषण हलचल मची थी, उसी की बड़ी दमदार अभिव्यक्ति है उनका उपन्यास ‘पथेर दाबी’, अर्थात ‘पथ के दावेदार’। जब इसके अंश पत्रिका के अंकों में सामने आने लगे, तो बहुतों का ध्यान गया। कुछ लोगों ने हैरानी प्रकट की। इसलिए कि ‘पथेर दाबी’ शरत के उपन्यासों की धारा से एकदम अलग तरह का उपन्यास है। पहली बार देश की स्वाधीनता के मतवाले शरत के यहाँ इतने प्रभावी रूप में सामने आए थे। विष्णु जी ने बिल्कुल सही लिखा है—

“‘पथेर दाबी’ उनके राजनीतिक विश्वास का प्रतीक है। अपने आवारा जीवन में उन्होंने अनेक देशों की जो यात्रा की थी, उसका अनुभव ही मानो उसमें संचित हुआ है। जिस समय वे इसे लिख रहे थे, उस समय उनके सामने बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन तो था ही, सुप्रसिद्ध रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास माँ भी था।”

विष्णु जी ने शरत के साहित्य ही नहीं, उनके निजी जीवन की भी पड़ताल की। यहाँ तक कि उनकी घर-गृहस्थी की भी। हिरण्मयी देवी शरत की पत्नी थीं, जिनके बारे में बहुत तरह की बातें कही जाती थीं। उनका शरत के साथ विधिवत विवाह हुआ था या नहीं, इस पर मत-भिन्नता है। पर वे शरत की जीवन सहचरी थीं और शरत उन्हें बहुत प्रेम और आदर देते थे। विष्णु जी ने ‘आवारा मसीहा’ में शरत के उस भाव को शब्दों में बाँधने की कोशिश की है, जिसे अधिकांश लोगों ने नहीं समझा—

“हिरण्मयी देवी लोगों की दृष्टि में शरतचंद्र की पत्नी थीं या मात्र जीवन-संगिनी, इस प्रश्न का उत्तर होने पर भी किसी ने उसे स्वीकार करना नहीं चाहा। लेकिन इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि उनके प्रति शरत बाबू का प्रेम सचमुच हार्दिक था। अल्पशिक्षिता, अनेक बातों से अनभिज्ञ, सरलप्राणा ग्रामीण महिला हिरण्मयी शरतचंद्र की प्रतिभा की तुलना में कहीं नहीं ठहरती थीं। जब भी कोई उनसे शरत साहित्य के अमर नारी-पात्रों की चर्चा करता तो हँस पड़तीं, कहतीं, मैं मूर्ख भला उनको क्या जानूँ? तुम्हारे दादू ही जानते हैं।”

पर बहुत कम लोग यह समझ पाते थे कि हिरण्मयी देवी सिर्फ शरत की जीवन संगिनी ही नहीं, उनकी बहुत सी रचनाओं और पात्रों की प्रेरणास्रोत भी हैं। और यही नहीं, सीधी-सरल और निश्छल मन वाली हिरण्मयी देवी शरत की जीवनी शक्ति भी थीं, जिसकी ओर संकेत वे कई बार करते हैं।

[7]

आखिरी दिनों में शरत बुरी तरह अस्वस्थ हो गए। न कुछ ठीक से खाते, न पचता। बहुत दुर्बल हो गए थे। कई तरह के इलाज के बाद भी उनकी तबीयत सँभल नहीं रही थी। हर कोई चिंतित था। शरत के पाठक हों, लेखक या मित्र, जिसने भी सुना, दौड़ा चला आया। विष्णु जी ने ‘आवारा मसीहा’ में इस दुख भरी स्थिति का भी बहुत सही चित्रांकन किया है—

“कुशल पूछने के लिए मित्रों का ताँता लगा रहता था। एक दिन असमंजस मुखोपाध्याय आए। देखा वही घर, वही द्वार, वही दालान, वही सामने का बगीचा लेकिन सब कुछ निरानंद। कुछ दिन पहले तक उन सबमें प्राणों का उत्साह था, माधुर्य का स्पर्श था। लेकिन अब वहाँ पर मानो प्राणहीनता की एक निष्करुण हवा चल रही थी। व्यथित मन से वे अंदर जाकर खड़े हो गए। वह मनहूस स्तब्धता बार-बार लौट जाने को कहती थी। लेकिन बिना मिले कैसे लौट सकते थे? कॉलबेल बजाने पर सुरेंद्रनाथ नीचे आए। जो समाचार उन्होंने दिया, वह अच्छा नहीं था।”

समय के साथ-साथ लग रहा था, मृत्यु निकट आ रही है। उसकी काली छाया ने सब कुछ ग्रस लिया था। घर के लोगों और मित्रों की आँखें मानो पथराने लगी थीं। सब बेबसी से बस उन्हें धीरे-धीरे मृत्यु पथ की ओर बढ़ते देख रहे थे—

“रात को डाक्टर की अनुमति से उमाप्रसाद उनके पास रहे। कुर्सी डालकर पास बैठ गए। रोगी की सेवा करने को विशेष कुछ नहीं था। कमरे के एक कोने में टिमटिमाता प्रकाश था। उमा बाबू की आँखों में नींद नहीं थी। एकटक वे उनकी ओर ताकते रहे। महामानव रोगशैया पर था। वह मत्यु पथ का राही था। शरीर रोग से थक गया था, लेकिन फिर भी वे पूरी तरह होश में थे।”

‘आवारा मसीहा’ में शरत के जीवन के आखिरी क्षण भी हैं। आत्मा में गूँजते एक करुण संगीत की तरह। और फिर प्रारंभ हुई साहित्य के उस अपराजेय शिखरपुरुष की शवयात्रा, जिसे पूरे राष्ट्र ने अश्रुपूरित आँखों से विदाई दी—

“उस दिन 16 जनवरी, रविवार, सन् 1938, तदनुसार 2 माघ 1344 बंगाब्द और पौष पूर्णिमा का दिन था। सवेरे के दस बजे भारत के अपराजेय कथाशिल्पी जनप्रिय साहित्यिक ने अंतिम साँस ली। उस समय उनकी आयु थी इकसठ वर्ष, चार माह।…शवयात्रा तीन बजकर पंदह मिनट पर आरंभ हुई। परिचालना का भार दक्षिण कलकत्ता कांग्रेस कमेटी ने ग्रहण किया। राष्ट्रीय पताका फहरा रही थी। जनता वंदेमातरम् और शरतचंद्र का जयघोष कर रही थी। मार्ग में न केवल सुभाषचंद्र बोस और सर आशुतोष मुकर्जी के घरों पर, बल्कि स्थान-स्थान पर अनेक संस्थाओं और अनेक कालेजों में शव पर मालाएँ चढ़ाई गईं…!”

वस्तुतः ‘आवारा मसीहा’ शरत की प्रमाणिक जीवनी ही नहीं, उन पर बहुत सूक्ष्म ब्योरों के साथ बनाई गई किसी सजीव फिल्म सरीखी भी लगती है, जिसमें आप शरत को विभिन्न मूड्स और स्थितियों में बोलते-बतियाते देखते हैं तो कभी एकदम चुप, उदास। कभी-कभी गंभीर चिंतन क्षणों में निमग्न। इसे पढ़कर वाकई शरत से मिल लेने जैसी गहन अनुभूति होती है। यही शायद ‘आवारा मसीहा’ की अपार लोकप्रियता का रहस्य भी है। कोई आश्चर्य नहीं कि सन् 1974 में प्रकाशित हुई शरत की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के दर्जनों संस्करण आ चुके हैं और इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती ही जा रही है।

‘आवारा मसीहा’ का प्रकाशन निस्संदेह साहित्य जगत की एक बड़ी घटना थी। हिंदी के साहित्यिक भी अब बड़े गर्व के साथ कह सकते थे कि हिंदी में भी एक ऐसी जीवनी है, जिसमें एक उपन्यास सरीखी रोचकता है, महाकाव्य सरीखी गहराई है और जिसने इस विधा की सर्वोच्च ऊँचाइयों को छुआ है। अपने समय की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ ने ‘आवारा मसीहा’ के प्रकाशन पर उसका अभिनंदन करते हुए ठीक ही लिखा था—

“‘आवारा मसीहा’ के लेखक का हम सभी को हदय से कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने शरत के जीवन में छिपे हुए बहुमूल्य रत्नों को बड़े ही परिश्रम से खोजकर, हिंदी जगत् के आगे बड़े ही करीने से सँजोकर उपस्थित करके उक्त महालेखक के पुण्य प्रसंग नए सिरे से चलाने का अवसर हमें पदान किया है। यह जीवनी सचमुच साहित्य का एक गौरव-ग्रंथ है, जो विविध पाठकों को विविध पकार की प्रेरणाएँ देता है और जिसने बांग्ला पाठकों से भी अधिक हिंदी पाठकों के आगे शरत को निकटतर लाने में अभूतपूर्व सफलता पाई है। ‘आवारा मसीहा’ भारतीय साहित्य में एक घटना है।”

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प्रकाश मनु

प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,

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