सोमवार, 14 जून 2021

अपने इलाके के शिल्पकार थे कल्पनाथ राय

कल्पनाथ राय: माटी के लाल आजमगढ़ियों की खोज    

(तलाश में.. )



कल्पनाथ ने अपनी कल्पनाओं के मऊ को जहाँ पर छोड़ा था, आगे का विकास वहीं पर ठहर सा गया... ? 


@ अरविंद सिंह


पूर्वांचल के इब्राहिम पट्टी और सेमरी जमालपुर गाँवों के बीच कोई तीन किमी की ही दूरी है. लेकिन इन दोनों गांवों में पैदा हुए राजनीति के महान धुरंधरों के दिलों के बीच जीवन पर्यंत कभी कोई दूरी नहीं रही. इन दोनों गांवों ने पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि देश के दो महान राजनेताओं को जना. इब्राहिम पट्टी ने चन्द्रशेखर को जना तो सेमरी जमालपुर ने कल्पनाथ राय को. अब दोनों राजनेता जीवित नहीं है लेकिन पूर्वांचल अपने इन शिल्पकारों को कभी भूल नहीं पाया. उन्हें हमेशा याद करता है. यहाँ बात हो रही कल्पनाथ राय की.


पचास के दशक का अंतिम दौर था. अविभाजित आजमगढ़ के सेमरी जमालपुर गांव से निकल कर एक नौजवान जिला मुख्यालय आजमगढ़ आया. और यहीं पर रहकर शिब्ली कालेज में शिक्षाध्ययन करने लगा.

अल्पसंख्यक संस्था शिब्ली नेशनल कालेज के छात्र संघ


चुनाव में उतरा तो पहले ही प्रयास में बरस 1959 में अध्यक्ष चुना गया. यह वह दौर था जब देश गुलामी की जंजीर काटकर, नयी उड़ान भरने को तैयार हो रहा था. गांधी की सरपरस्ती में नेहरू ने देश को संभाल लिया था. गांधी रहे नहीं लेकिन उनके विचार देश के लिए पथ- प्रदर्शक बने हुए थे.कांग्रेस देश की राजनीतिक व्यवस्था की पर्याय बनी हुई थी और लोहिया गैर-कांग्रेसवाद की सबसे बड़ी आवाज़.

राजनारायण उस आवाज की टंकार या यूँ कहें की नौजवानों के लिए सियासी आंधी. जिसमें कितने ही नौजवानों की जवानी बवडंर बनकर प्रतिरोध के इस स्वर में जा मिली थी.

दरअसल शिब्ली नेशनल कालेज से होते हुए साठ के दशक में जो नौजवान गोरखपुर विश्वविद्यालय पहुंचा था, उसका नाम था कल्पनाथ राय. आजादी के बाद देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का पहला विश्वविद्यालय गोरखपुर विश्वविद्यालय था, जो 1957 में गतिशील हुआ.11 अप्रैल 1956 को बीएन झा इसके पहले कुलपति बने. 1 मई 1950 को उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविन्द बल्लभ पंत ने इसकी संगे बुनियाद की पहली ईट रखी और अगस्त 1956 में उत्तर प्रदेश विधान सभा में गोरखपुर विश्वविद्यालय अधिनियम पारित हुआ. बरस 1962 में जब शीतला सिंह इस विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष बने तो कल्पनाथ राय उनके महामंत्री. नौजवानों को कल्पनाथ राय का साथ इतना पसंद आया कि वे 1963 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष चुने गये.

इस समय तक वे राजनारायण के बेहद करीब आ चुके थे और उनके तुफा़नी विचारों के वाहक बन चुके थे. वे उनके राजनीतिक गुरु भी थे. उनके विचारों का ही असर था कि उन्होंने गोरखपुर आए देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को काला झंडा दिखाया. बकौल समाजवादी विचारक संजय श्रीवास्तव-'' जब कल्पनाथ राय ने नेहरू को काला झंडा दिखाया तो, उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया- इस घटना को देख नेहरू ने तुरंत हस्तक्षेप किया और कहा कि इस छात्र नेता को छोड़ दिया जाए- जब बच्चा घर से बाहर निकलता है तो माँ उसके माथे पर काला टीका लगा देती है, जिससे कि उसे किसी नज़र ना लग जाए." 

 नेहरू की लोकतांत्रिक समझ बेहद गहरी थी. वह अपने समय में भी एक वैश्विक नेता के रूप में जाने जाते थे और दुनिया भर के मंचों पर बुलाये जाते थे.


नेहरू और इंदिरा विरोध के स्वर के कारण कल्पनाथ राय समाजवादियों के बेहद करीब आ गए और राजनारायण की कृपा से 1963 में समाजवादी युवजन सभा के प्रदेश महासचिव भी बना दिए गए. 


  इसी बीच एक परिघटना ने आकार लिया. पूरब के आक्सफोर्ड इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष श्याम कृष्ण पांडेय जो बहुत अच्छा वक्ता और हेमवती नंदन बहुगुणा के बेहद करीबी भी थे. हेमवती नंदन बहुगुणा उस समय कांग्रेस के बड़े नेता और गांधी परिवार के विश्वासपात्र भी थे. पहाड़ी ब्राह्मण थे लेकिन मैदानों की सियासत को बखूबी समझते थे. इलाहाबाद उनकी कर्मस्थली थी.

एक दिन श्याम कृष्ण पांडेय ने इलाहाबाद में कल्पनाथ राय की मुलाकात बहुगुणा से करा दी.बहुगुणा ने इस नौजवान की सियासी हसरत को बेहद करीब से समझ लिया और कांग्रेस के लिए डोरे डालना शुरू कर दिया. बहुगुणा का व्यक्तित्व और नजदीकियां कल्पनाथ राय को तेजी से प्रभावित करती जा रहीं थीं. और एक दिन मन बना कर वे राजनारायण के करीब पहुंच गएं- बोले-" बहुगुणा बार- बार बुला रहे हैं, क्या करू?"  तुनकमिजाजी राजनारायण क्रोध में बोले-" तुरंत बहुगुणा के पास भाग जाओ" और सिर झूकाए कल्पनाथ बाहर निकल सीधे बहुगुणा से जा मिले. 1962 के चीनी हार के बाद पूरी कांग्रेस और नेहरू सदमे में थे. देश असहाय सा महसूस कर रहा था. इसी दशक में सुदूर दक्षिण से भारतीय राजनीति में दिल्ली की सियासत के पहले किंगमेकर के रूप में विख्यात तमिलनाडु के के. कामराज नाडर ने नेहरू के सामने डूबती कांग्रेसी बेड़ा को पार लगाने के लिए एक योजना बनाई जिसे 'कामराज योजना' या इंटरनल सिंडिकेट प्लान भी कहा गया. इस योजना के तहत कांग्रेस के बड़े नेताओं को त्याग पत्र  देकर संगठन को मजबूत करना था. जिसको लेकर पहला त्याग पत्र स्वयं कामराज नाडर ने दिया. उन्होंने सुझाया कि- "पार्टी के बड़े नेता सरकार में अपने पदों से इस्तीफा दे दें और अपनी ऊर्जा कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए लगाएं।" उनकी इस योजना के तहत उन्होंने खुद भी इस्तीफा दिया और लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, मोरारजी देसाई तथा एसके पाटिल जैसे नेताओं और आधा दर्जन से ज्यादा मुख्यमंत्रियों ने भी सरकारी पद  त्याग दिए। यही योजना कामराज प्लान के नाम से विख्यात हुई। कहा जाता है कि कामराज प्लान की बदौलत वह केंद्र की राजनीति में इतने मजबूत हो गए कि नेहरू के निधन के बाद शास्त्री और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने में उनकी भूमिका किंगमेकर सी रही। वह तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। 1969 में कांग्रेस इंडिकेट और सिंडिकेट में बंट गयी. सिंडिकेट के नेता कामराज हो गये और इंडिकेट की स्वयं इंदिरा गांधी. इंदिरा गांधी को उस समय अपनी कांग्रेस को मजबूत करने के लिए जमीनी नेताओ की जरूरत थी. और बहुगुणा उनका विश्वास जीतने में सफल हुए थे. यही कारण है कि 2 मई1971को इंदिरा गांधी ने उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह देकर संचार राज्य मंत्री बना दिया. इसके पहले वे उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न पदों पर रह चुके थे. इंदिरा गांधी के विश्वास को बहुगुणा ने पूरी तरह जीत लिया परिणाम स्वरूप उन्हें देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देते हुए 1973 में मुख्यमंत्री बना कर भेजा गया. अब तक कल्पनाथ राय बहुगुणा के बेहद करीबी हो चुके थे. और उनके प्रभाव से 1974 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर सोशलिस्ट से कांग्रेसी सोशलिस्ट हो गए. 1974 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव बहुगुणा के नेतृत्व में लड़ा गया. कांग्रेस पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता आयी और बहुगुणा का क़द भारतीय राजनीति अचानक से बहुत बढ़ गया. जिसकी चर्चा देश भर में होने लगी.

इसी बीच ब्लिट्ज के संपादक और देश के बड़े पत्रकार आर के करंजिया ने बहुगुणा को किसी सार्वजनिक मंच से बोलते हुए कह दिया कि- " आप में प्रधानमंत्री मनने की पूरी योग्यता है'' यानि  उन्होंने बहुगुणा की दुखती रग को छू लिया और उनकी हसरतें जैसे मन ही मन परवान चढ़ने लगीं. क्योंकि जो उत्तर प्रदेश जीत सकता है वह देश भी जीत सकता है, यह मनोभाव पहाड़ी बहुगुणा जी में जैसे हिल्लोरे मारने लगा.

इधर कल्पनाथ राय के साथ जो वायदा बहुगुणा ने किया था, वह गहरे सन्नाटे में चला गया. कल्पनाथ राय को लगा कि उनके साथ धोखा हो गया. लेकिन वे बहुगुणा से अंतिम बार मिलकर सबकुछ साफ-साफ करना चाहते थे. एक दिन बहुत प्रयास के बाद बहुगुणा जी ने रात्रि कालीन समय में कल्पनाथ राय को मिलने के लिए बुला लिया. बहुगुणा जी पहाड़ी ब्राह्मण थे लेकिन खाने- पीने  के बेहद शौकीन थे. सो कल्पनाथ राय के साथ यह दौर लंबे समय तक चला  और जब पूरी तरह नशे हो गये तो बोल बैठे- "कांहे परेशान हो रहें हैं, यूपी ही नहीं दिल्ली पर भी कब्जा करना है, जम कर मेहनत करो, जो कहोगे बना देगें" यानि इंदिरा गांधी की कुर्सी पलटने की योजना और उस पर कब्जा करने के खतरनाक प्लान पर काम हो रहा था.

यह सुनकर कल्पनाथ राय के होश उड़ गए और सुबह ही गाड़ी पकड़ कर वह दिल्ली पहुंच गए. इंदिरा गांधी के आवास  पहुंचने पर उन्हें सुरक्षा कर्मियों ने मिलने नहीं दिया और जब बार-बार मिलने का प्रयास किया तो लोग उन्हें पागल तक समझ गए. बहुत देर के बाद किसी उच्च और सक्षम अधिकारी से मिलने पर उन्होंने कहाँ कि- "माता जी की कुर्सी पर बहुत खतरा है, उनका मिलना बहुत जरूरी है. उनके पास पहले से अपांटमेंट नहीं है लेकिन उनके पास जो सूचना है उसे इंदिरा गांधी तक पहुँचना बेहद जरुरी है". बहुत अनुनय विनय के बाद उन्हें इंदिरा गांधी के सामने लाया गया. और एक लंबी बैठक में जब कल्पनाथ राय ने बहुगुणा के मंशूबों और गोपनीय योजना को बताया तो इंदिरा को क्रोध आ गया और लगभग डांटते हुए उन्हें बाहर चले जाने का आदेश दिया. उन्हें जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था.लेकिन वे वहाँ से हिलने की बजाय इंदिरा गांधी से बोले-" माता जी! मैं यहीं रहता हूँ, आप इस सूचना की इंटरनल जांच करा लीजिए. अगर फिर भी गलत साबित हुआ तो मुझे जो सजा देखें वह मुझे मंजूर होगा". इंदिरा गांधी ने इस बात पर गंभीरता से सोचा और एक आंतरिक गोपनीय जांच करा दिया. जांच की रिपोर्ट में कल्पनाथ राय की बाते सच साबित हुईं. यही वह टर्निंग प्वाइंट था इंदिरा-कल्पनाथ संबंधों की. जिसे इंदिरा गांधी ने जीवन भर निभाया.जिस इंदिरा गांधी के दरवाजे कल्पनाथ राय को मिलने के लिए घंटों इंतजार करते खुलते नहीं थे, उसी प्रधानमंत्री के घर का दरवाजा उनके लिए 24 घंटे, हमेशा खुला रहता था. 

परिणाम स्वरूप इंदिरा गांधी ने बहुगुणा को दिल्ली तलब कर लिया और 29 नवंबर 1975 को इस्तीफा ले लिया और केन्द्र में संचार मंत्री बना, उत्तर प्रदेश में एक बार फिर पहाड़ी ब्राह्मण नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना कर भेज दिया. और कुछ दिन बाद संचार मंत्री से भी हटा दिया.जिससे आहत होकर वे स्वयं 1977 में कांग्रेस को अलविदा बोल दिए. इस बीच राजनारायण के रायबरेली चुनाव के मुकदमे का फैसला आ गया और उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने इंदिरा गांधी के चुनाव को ही अयोग्य घोषित कर दिया. परिणाम स्वरूप इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को जेलों में ठूंस दिया.  मीसा के तहत बंद होने वाले राजनीतिक बंदियों से पूरा देश ही जैसे कैदखाने में बदल गया.

 एक तरफ देश में इंदिरा के सबसे बड़े विरोधी राजनारायण, इंदिरा की नाक में दम किए हुए थे, दूसरी तरफ उसी राजनारायण के चेले कल्पनाथ राय, इंदिरा गांधी के नाक के बाल हो चुके थे. यह राजनीति में समय का बस फेर भर था. जिसमें कोई किसी का सगा नहीं होता है, बस अवसर और समय की बारीक पकड़ होती है.  जिस राजनारायण के चेले कल्पनाथ ने, उनका साथ छोड़, बहुगुणा से जा मिले, जिस इंदिरा गांधी के विश्वास पात्र बहुगुणा ने इंदिरा को छोड़ा, उसी बहुगुणा को छोड़कर कल्पनाथ राय ने सत्ता के शीर्ष पर बैठी इंदिरा गांधी को पकड़ लिया.

 यही कारण है कल्पनाथ राय को तीन बार राज्यसभा में कांग्रेस ने भेजा और चार बार घोसी से लोकसभा सांसद बनाया.

1974 में ही कांग्रेस संसदीय दल के कार्यकारी समिति के सदस्य बनाकर उन्हें राज्यसभा भेज दिया गया. 1980 में पदोन्नति करके पार्टी का महासचिव बना इसी के साथ दूसरी बार भी राज्यसभा सदस्य बना दिए गए. इंदिरा गांधी ने 1982 में कल्पनाथ राय को अपने मंत्रिमंडल में शामिल की. उन्हें संसदीय मामले और उद्योग विभाग का उपमंत्री बना दिया गया. पार्टी ने 1986 में तीसरी बार राज्यसभा में भेजा. 1989 में उन्हें घोसी से लोकसभा के टिकट मिला, जहां वे विजयी हुए. घोसी से लगातार चार बार सांसद रहे . राजीव गांधी और पी.वी. नरसिम्हा राव  उन्हें अपने सरकार में शामिल भी किए. भ्रष्टाचार के भी कई आरोप भी लगें, लेकिन कल्पनाथ हर मामले में बेदाग बरी हुए.1996 का चुनाव वे तिहाड़ जेल में रहकर लडे़.

19 नवंबर 1988 को उन्होंने नारायण दत्त तिवारी के कह कर आजमगढ़ का एक विभाजन कर अपने सपनों का जिला मऊ नाथ भंजन बनवाया, जिसके पहले जिलाधिकारी चेंबर थे. नवजात जिले मऊ में तीन तीन ओवर ब्रिज, नये कलेक्ट्रेट भवन, घोसी चीनी मिल और अन्य विकास की योजनाओं और स्थापनाओं को विकसित किया. वे मऊ को लखनऊ के रूप में विकसित करना चाहते थे. यह जिला उनके ख्वा़बों और परिकल्पनाओं की हकीकत था, एक मत के अनुसार यदि मुलायम सिंह यादव चन्द्र शेखर जी का सहारा नहीं लिए होते तो आज आजमगढ़ की कमीश्नर भी मऊ ही होती आजमगढ़ नहीं.

 सच तो यह है कि मऊ का विकास जितना कल्पनाथ राय के रहते हुआ था, आगे का विकास वहीं ठहर सा गया है. इस फिर किसी जमीनी कल्पनाथ का इंतजार है जो इसे अपनी कल्पनाओं का जिला बना सके.. 

58 साल की अवस्था में हृदयाघात से यह पूर्वांचल का शिल्पकार हमेशा हमेशा के चिरनिद्रा में सो गया


(लेखक के अपने विचार हैं जो विभिन्न रिसर्च और स्रोतों पर आधारित हैं)

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