रविवार, 9 मई 2021

विभांशु दिव्याल की नजर में अरुण पाण्डेय

 तुझे कैसे याद करूं अरुण


मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था अरुण कि मुझे तुझे इस तरह याद करना पड़ेगा और जो काम तुझे मेरे लिए करना था वह काम मुझे तेरे लिए करना पड़ेगा।


यह वह अरुण है जो पहली मुलाकात के चंद दिनों के भीतर ही मेरे साथ 'सर', 'आप', 'जी' और पांडेय जैसी औपचारिकताओं से मुक्त होकर सिर्फ अरुण बन गया था और मैं उसके लिए 'भाई साहब'। सहकर्मी के रूप में तो वह मेरा जैसा सहायक बना सो बना लेकिन एक व्यक्ति के रूप में उसके साथ मेरी जो पारिवारिक निकटता स्थापित हुई उस निकटता की उष्मा में कभी भी कमी नहीं आयी।


कोरोना के इस अमानवीय क्रूर काल में परिजनों, मित्रों और निकटवर्तियों की निरंतर आती सूचनाओं ने संवेदनाओं पर जैसे शिलाखंड रख दिए थे। मृत्यु का कोई भी समाचार ना भयभीत कर रहा था ना विचलित कर रहा था। मृत्यु जैसे एक बर्फीली वास्तविकता बनकर मन पर जम गयी थी और इसमें अपना मृत्युबोध भी किसी भी भय और आशंका से मुक्त हो गया था। लेकिन जब मुझे अपने इस अरुण के कोरोनाग्रस्त होने का समाचार मिला था तो मेरी समूची संवेदना पिघल कर बेचैन हो उठी थी।


अरुण के कोरोनाग्रस्त होने की पहली सूचना मुझे दिलीप ने दी थी। मैंने जब अरुण से बात की तो उसने मुझे आश्वस्त किया कि उसकी स्थिति में सुधार हो रहा है और वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जाएगा। मैंने राहत की लंबी सांस ली थी। लेकिन दो दिन बाद ही मुझे ज्ञात हुआ कि अरुण को अस्पताल ले जाना पड़ा है। मेरा मन बुरी तरह विचलित हो उठा। अब उससे मेरी बात नहीं हो पा रही थी लेकिन मैं कभी दिलीप से तो कभी ब्रिज से बात करके उसकी हालत के बारे में जानता रहा। इनमें से कोई भी जब मुझे संकेत देता कि उसकी हालत में सुधार है तो मेरी अपनी सांसे जैसे वापस लौट आती थी और जब यह जानकारी मिलती कि उसकी हालत बिगड़ रही है तो मन बुरी तरह डूबने लगता था। मैं स्वयं को बार-बार आश्वस्त कर रहा था कि अरुण ठीक हो जाएगा और शीघ्र घर वापसी करेगा मगर मेरी यह आश्वस्ति बालू के ढेर की तरह ढह गई जब मुझे भीतर तक झकझोर ने वाला यह समाचार मिला कि अरुण ने हम सब से विदा ले ली है। ऐसे समय अपनी विवशता की अनुभूति भीतर बहुत कुछ छिन्न-भिन्न कर गयी।


आखिर मेरे लिए और हिंदी पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण क्यों था अरुण? अरुण ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत मेरे अंतर्गत वैचारिक परिशिष्ट 'हस्तक्षेप' से जुड़कर की थी। 'हस्तक्षेप' को मैं एक सुकल्पित, विचार केंद्रित अवधारणा पर खड़ा करने के लिए प्रयासरत था। 1990 का वर्ष वह वर्ष था जिसके इर्द-गिर्द राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक और धार्मिक स्थापनाओं में भारी उद्वेलन शुरू हो गया था। यह वह उद्वेलन था जो आम पाठकों की बात तो अलग बुद्धिजीवियों की पकड़ से भी बाहर था। इसे तभी समझा जा सकता था जब विभिन्न समूहों की विभिन्न वैचारिकताओं को पूरे सम्मान पूरी निष्पक्षता और पूरी प्रमाणिकता के साथ एक मंच पर प्रस्तुत किया जाए। मैं तमाम विरोधों-प्रतिरोधों के बावजूद हस्तक्षेप को विचार मंच के रूप में गढ़ रहा था। मैं हिंदी पाठकों और बुद्धिजीवियों को लेकर आश्वस्त था कि वे इस तरह के विचार मंच का स्वागत भी करेंगे और उसे स्वीकार भी करेंगे।


तथापि, इस तरह की वैचारिक अनुष्ठान में उथले, विचारशून्य, महत्वाकांक्षी और कैरियरवादी पत्रकार सहायक नहीं हो सकते थे, वो ही सहायक हो सकते थे जो 'हस्तक्षेप' की वैचारिक अवधारणा को आत्मसात कर सकें और स्वयं विचारबद्घ होते हुए भी इतर विचारों के प्रति दुराग्रह ना पालें, जो खुले मन और खुली समझ वाले हों तथा साथ ही भारतीय समाजार्थिक धाराओं के प्रति जागरूक हों। और इन सबसे बढ़कर उनमें इन धाराओं को 'हस्तक्षेप' के पृष्ठों में प्रस्तुत करने की ईमानदारी हो, किसी भी विषय पर केवल विषय के आधिकारिक विद्वानों को प्रस्तुत करने की जिद्द हो, स्वयं को आरोपित ना करके वैचारिक विविधता को सम्मान देने की तत्परता हो और 'हस्तक्षेप' को व्यापक संवाद के एक प्रामाणिक मंच के रूप में करने के लिए निष्ठ प्रयासशीलता हो। लेकिन ऐसे सहायकों का मिलना आसान काम नहीं था। पर जब अरुण ने 'राष्ट्रीय सहारा' में प्रवेश किया और मेरा उससे साक्षात्कार हुआ तो मुझे तत्काल आभास हो गया कि मुझे एक वांछित सहायक मिल गया है। तीव्र गति से समझना और सीखना उसका बड़ा गुण था। वह अधिक समय तक प्रशिक्षु नहीं रहा। उसने मेरे साथ काम करते हुए सामाजिक-वैचारिक अंतर्प्रवाह की प्रक्रियाओं को अच्छी तरह समझा और 'हस्तक्षेप' में उनकी प्रयुक्ति की शैली को कुशलता से सीखा। फिर उसने अपनी टीम के साथ न केवल 'हस्तक्षेप' की अवधारणात्मक शुचिता को बनाए रखा बल्कि उसे व्यापकता भी प्रदान की। यही अरुण की विशिष्टता थी। अरुण इसलिए मेरे लिए महत्वपूर्ण था और हिंदी की वैचारिक पत्रकारिता के लिए भी।


अरुण ने अपने विनम्र, स्पष्टवादी और संवादशील व्यवहार से मित्रों की एक विराट संपदा खड़ी की। मेरे पास उससे जुड़े ऐसे अनगिनत अनुभव है जब मैंने उसकी इस संपदा में भागीदारी की। आज जब अरुण नहीं है तो मेरी आंखों के आगे पुतुल, गौरी और तन्मय के चेहरे घूम रहे हैं। मैं इस समय अशक्त भी हूं और निरुपाय भी लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि अरुण की मैत्रिक संपदा की विरासत उसके परिवार का संबल बनी रहेगी।

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