बुधवार, 17 मार्च 2021

कभी आर कभी पार.....

 #कभी_आर_कभी_पार_लागा_तीरे_नज़र 


फिल्म समीक्षकों ने जब भी 'गुरुदत्त' का आकलन किया तो उनकी तीन ही फिल्मों को ज्यादा तवज्जो दिया गया। 'प्यासा', 'कागज के फूल' और 'साहब बीवी और गुलाम'। मगर कहानी के हिसाब से साधारण सी 'आरपार' में गुरुदत्त ने कुछ नया कर के दिखाया था।

पहली बात पूरी फिल्म में बंबईया भाषा का इस्तेमाल हुआ था यहां तक कि एक गाने का मुखड़ा भी बंबई की फुटपाथी भाषा में लिखवाया गया था। चूंकि फ़िल्म बंबइया माहौल में रची बसी है तो फ़िल्म के पात्र भी उसी के अनुरूप थे। गानों के पिक्चराइजेशन में गुरुदत्त ने ग्लैमर और कृत्रिम सेटिंग से अलग हटकर 'कभी आर कभी पार" गाना एक ईंट ढोती मराठी मजदूरन पर फ़िल्माया था, जिसकी भूमिका कुमकुम ने की थी। पूरी फिल्म जैसे सड़क पर घटित होती है और कहानी के पात्र हमारी रोजमर्रा की आम दुनिया के से लगते हैं। सबसे बड़ी बात, गुरुदत्त द्वारा करवाया गया कैमरा वर्क है। फिल्म में अंधेरे और उजाले के सम्यक मिश्रण का लाजवाब इस्तेमाल किया गया है।


अब बात करते हैं इस फ़िल्म के सबसे हिट गाने की। ~ 'आरपार' का सबसे हिट गाना 'कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र' था। यह गाना अपनी अतिशय मधुर धुन और इतराते-इठलाते-गुदगुदाते वाद्य संगीत के कारण माधुर्य की तूफानी बाढ़ है। 'शमशाद बेग़म' जी की शोख, बर्छीमार, काली मिर्ची-सी तीखी आवाज जहां मर्दों को बुरी तरह याद दिलाती है कि वे मर्द हैं और सिर्फ तरसते रहने का काम करें, वहीं गाने की ताल प्रधान चाल, 'नैय्यर' साहब की मशहूर ढोलक की मादक एड़ पाकर तथा बाजार लूट फ्लूटवर्क से धनाढ्य होकर, नसों में शहद का तड़का लगा जाती है। इस सारे कहर के पीछे एकमात्र हीरो 'नैयर' साहब थे, जिनके जैसा मीठा संगीतकार आगे-पीछे नहीं मिलता। वे रिद्म के बादशाह थे। ढोलक के दम पर त्रिलोक लूटते थे। जितनी जवान, मादक और नसों का पोर-पोर खोल देने वाली ढोलक 'नैय्यर' के ऑर्केस्ट्रा में बजी है, वैसी और कहीं नहीं। गहराई से देखें, तो उत्तेजक एवं कामुक होते हुए भी नैय्यर का संगीत अस्तित्व की स्वयंसिद्ध, सारभूत आध्यात्मिकता का एक रूप है क्योंकि अस्तित्व एवं आध्यात्मिकता एक ही चीज है। प्रकृति से छनकर उतरा सब कुछ रम्य और दिव्य है।


अब बात करते हैं इस गीत से जुड़े दिलचस्प किस्से की। ~

फ़िल्म प्रदर्शन के लिये तैयार थी और उसकी रिलीज़ डेट भी घोषित कर दी गयी थी। फ़िल्म सेंसर बोर्ड के पास उनके सर्टिफ़िकेट के लिये जब प्रस्तुत की गयी तो बोर्ड के सदस्यों ने एक आपत्ति लगा दी। फ़िल्म का शीर्षक गीत ‘कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र‘ जो शमशाद बेग़म की आवाज़ में था जगदीप पर फ़िल्माया गया था। जगदीप उस समय किशोरवय के थे। बच्चों के गीत तो महिला गायिकाओं द्वारा गाये जाते थे पर किशोरावस्था वाले जगदीप पर शमशाद बेग़म का गाया गीत सेंसर बोर्ड को ठीक नहीं लगा। बोर्ड के सदस्यों ने गुरुदत्त को सलाह दी कि गीत को किसी महिला कलाकार पर फ़िल्मा लिया जाये तो गीत पास कर दिया जायेगा। रिलीज़ डेट सामने थी। कुमकुम उन दिनों नईं नईं थीं। गुरुदत्त ने तत्काल निर्णय लेते हुये वह गीत उन पर फ़िल्मा कर एडिटिंग से उसके टुकड़े पुराने गीत में जोड़ दिये। वे स्वयं एक कुशल नर्तक थे अत: उन्हें कुमकुम को भावभंगिमायें समझाने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई। फ़िल्म अपने निश्चित दिन रिलीज़ कर दी गयी। गीत देख कर आसानी से समझा जा सकता है कि गुरुदत्त, श्यामा और जगदीप का हिस्सा और कुमकुम का हिस्सा अलग अलग शूट किये गये हैं। गाने के प्री ल्यूड और इंटर ल्यूड म्यूज़िक में जगदीप रहते हैं और बोल शुरु होने पर कुमकुम पर्दे पर आ जाती हैं।


अब बात करते हैं 'नैय्यर' साहब की। ~

संगीतकार ओ पी नैय्यर की यह पहली हिट फ़िल्म थी। इसके पहले उनकी फ़िल्में ‘आसमान’, ‘छम छमाछम’, ‘बाज़’ आदि को वांछित सफलता नहीं मिली थी। ओंकार प्रसाद नैय्यर के लिए घर में फाके की नौबत आ चुकी थी। बावजूद इसके कि वह एक ही साल १९५२ की दो फिल्मों 'छम छमा छम' और 'आसमान' में कुछ दिग्विजयी मेलडीज दे चुके थे और सन् १९५३ की 'बाज' के गीतों से भी लोगों को दीवाना बना चुके थे। पर उन्हें फिल्में नहीं मिल रही थीं। उन्होंने सोच लिया कि अब पंजाब लौट जाना चाहिए जहां से वो आये थे। गुरुदत्त पर उसकी कुछ लेनदारी बचती थी। पर गुरुदत्त भी पलटी मार गए थे। आखिर एडजस्टमेंट यह बना कि नैय्यर साहब गुरुदत्त की 'आरपार' के लिए गीत बना दें, तो फिल्म से आय होने के बाद पूरा हिसाब कर दिया जाएगा। फिर गरुदत्त ने परेशान हाल नैयर को कुछ एडवांस रुपए दिए और नैय्यर साहब मुंबई में रुक गए। फिर भी उन्हें अपनी किस्मत पर शक था। इसके बाद 'आरपार' के गाने बने।


मगर यह क्या! 'आरपार' (१९५४) रिलीज हुई, तो उसके गानों के तूफानी, अद्भुत माधुर्य ने देश के दिलों पर डाका डाल दिया। 'कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर' और 'बाबूजी धीरे चलना' पर बस बिजली के खंभे और मील के पत्थर नहीं नाच पड़े, वर्ना देश का एक-एक आदमी इन गानों पर झूम उठा था। क्या 'ये लो मैं हारी पिया', 'हूं अभी मैं जवां' और 'जा जा जा जा बेवफा' (ये तीनों सोलो गीता के) और क्या 'सुन सुन सुन सुन जालिमा', 'अरे ना ना ना ना ना जी तौबा तौबा' और 'शिकायत कर लो जी भर लो अजी किसने रोका है' (सभी में मोहम्मद रफी और गीता दत्त, जबकि आखिरी वाले में कुछ पल को सुमन कल्याणपुर भी हैं) - ये सभी गीत थिएटरों में और सड़कों पर (जहां दुकानों पर रेडियो बजते थे) सिने-प्रेमियों की भीड़ जमा करते रहे। इस फिल्म ने जहां नोंटों से गुरुदत्त के सूटकेस भर दिए, वहीं ओ पी नैय्यर साहब को कभी पंजाब न लौटने की खुशकिस्मती बख्श दी। फिल्म में गुरुदत्त का श्यामा के लिए डायलॉग है- 'प्यार किया है, तो हाथ पकड़ और निकल चल। आर या पार?' नैयर के लिए भी यह फिल्म 'आर या पार' साबित हुई और बंबई में उन्होंने अपना खंबा ठोंक लिया। आगे का इतिहास आप जानते हैं।


अब न नैय्यर साहब हैं, न शमशाद बेग़म और न गुरुदत्त और मजरूह हैं। मगर इन सबके मेल और कमाल से उपजा 'आरपार' का यह सुपरहिट गीत हजारों बार बजकर भी अगले हज़ारों बार के लिए वैसा का वैसा ताजा, जीवंत और जान लेवा बना रहेगा।

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