शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

झन-झन करके टूटें!...............

मत खींचो तारों को इतना,

झन-झन करके टूटे 

मत खींचो तारों को इतना,

झन-झन करके टूटें!.   


किसान आंदोलन के समर्थन में कुछ लोकप्रिय वैश्विक विभूतियों की बयानबाजी से अचकचाई सरकार को विवादित कृषि कानूनों पर अमेरिका की सकारात्मक सरकारी टिप्पणी आने पर राहत महसूस हुई होगी। अमेरिका ने इन कानूनों का बाकायदा समर्थन करके भारत सरकार की हौसला अफजाई की है। बाइडन प्रशासन ने कहा बताते हैं कि वह मोदी सरकार के इस कदम का स्वागत करता है। इससे दुनिया में भारतीय बाजार का प्रभाव बढ़ेगा और निजी क्षेत्र में अधिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि सामान्य तौर पर अमेरिका ऐसे कदमों का स्वागत करता है, जो भारतीय बाजारों की दक्षता में सुधार करेंगे और निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करेंगे। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के इस विचार का भी उल्लेख किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है। साथ ही यह भी कि अमेरिका, विभिन्न पक्षों के बीच किसी भी मतभेद को भारत के अंदर बातचीत के माध्यम से हल किए जाने के पक्ष में है।


अमेरिका का यह बयान ऐसे समय आया है जब तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में भारत में सड़क से संसद तक हंगामा बरपा है। शायद इसीलिए अमेरिका ने यह कहना भी ज़रूरी समझा कि कृषि कानूनों पर शांतिपूर्ण विरोध एक संपन्न लोकतंत्र की एक बानगी है। दरअसल किसान आंदोलन से लेकर संसद के दोनों सदनों तक के ताजा घटनाक्रम को देखने का सही नज़रिया यही होगा कि इस तमाम संघर्ष और बहस मुबाहसे को लोकतंत्र के जीवंत होने का प्रमाण माना जाए। सरकार ने संसद में कानून बना कर अपने एक चुनावी वादे को ही पूरा नहीं किया, बल्कि एक चिर प्रतीक्षित 'सुधार' की दिशा में साहसिक कदम भी बढ़ाया। लेकिन कानून की सार्थकता उसकी लोक-स्वीकृति पर निर्भर है। दुर्भाग्यवश इन कानूनों को वैसा जन-समर्थन नहीं मिल पाया, जिसकी ज़रूरत किसी सुधार के लिए होती है। उल्टे ज़मीन से उठा हुआ एक जन आंदोलन इनके खिलाफ उठ खड़ा हुआ। इस आंदोलन की गंभीरता सरकार को थोड़ी देर से समझ में आई। यही वजह है कि सरकार ने कुछ वर्षों तक इन कानूनों पर अमल न करने का प्रस्ताव रखा है। लेकिन इस बीच आंदोलन को किसानों ने आन-बान-शान का प्रतीक बना लिया। किसानों से इतनी समझदारी की अपेक्षा अब भी है कि तीनों कानूनों की 'वापसी' को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएँ तथा बीच का रास्ता खोजने में सरकार की मदद करें। सरकार झुकी है तो किसान भी थोड़ा झुक जाएँ। आखिर लोकतंत्र के लिए आपसी समझदारी की ज़रूरत होती है, हठधर्मिता की नहीं। 


लोकतांत्रिक परंपरा के लिहाज से एक मूलभूत गड़बड़ यह भी हो रही है कि किसानों ने अपने आंदोलन और प्रदर्शन को "केंद्र सरकार से लड़ाई" बना डाला है। लोकतंत्र में अपनी माँगों के लिए आंदोलन और प्रदर्शन उसके स्वस्थ होने के सूचक होते हैं, लेकिन अगर इन्हें "आरपार की लड़ाई" का रूप दे दिया जाता है, तो इसे चिंताजनक और खतरनाक प्रवृत्ति मानना पड़ेगा। किसान और सरकार दोनों को ही यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सत्याग्रह को जनता और सत्ता के "युद्ध" में बदलना ही गतिरोध का मूल कारण होता है। अतः अगर हमें दुनिया के सामने सकारात्मक लोकतांत्रिक संघर्ष का उदाहण पेश करना है तो "युद्ध" वाली मानसिकता छोड़नी होगी।लेकिन 26 जनवरी के बाद के घटनाचक्र से ऐसा लगता है कि किसान भाइयों ने कानून वापसी को जीवन-मरण का प्रश्न बना लिया है और इससे कम उन्हें कुछ नहीं चाहिए। यह अड़ियल रवैया नहीं बदलेगा, तो गतिरोध भला कैसे टूट पाएगा? सावधान, किसान भाइयो! कहीं इतिहास आपको जानबूझकर समझौता न करने का दोषी न करार दे! 


अंततः यही कि- तारों को इतना नहीं कसना चाहिए कि वे टूट जाएँ!000

किसान आंदोलन के समर्थन में कुछ लोकप्रिय वैश्विक विभूतियों की बयानबाजी से अचकचाई सरकार को विवादित कृषि कानूनों पर अमेरिका की सकारात्मक सरकारी टिप्पणी आने पर राहत महसूस हुई होगी। अमेरिका ने इन कानूनों का बाकायदा समर्थन करके भारत सरकार की हौसला अफजाई की है। बाइडन प्रशासन ने कहा बताते हैं  कि वह मोदी सरकार के इस कदम का स्वागत करता है। इससे दुनिया में भारतीय बाजार का प्रभाव बढ़ेगा और निजी क्षेत्र में अधिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि सामान्य तौर पर अमेरिका ऐसे कदमों का स्वागत करता है, जो भारतीय बाजारों की दक्षता में सुधार करेंगे और निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करेंगे। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के इस विचार का भी उल्लेख किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है। साथ ही यह भी  कि अमेरिका, विभिन्न पक्षों के बीच किसी भी मतभेद को भारत के अंदर बातचीत के माध्यम से हल किए जाने के पक्ष में है।


अमेरिका का यह बयान ऐसे समय आया है जब तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में भारत में सड़क से संसद तक हंगामा बरपा है। शायद इसीलिए अमेरिका ने यह कहना भी ज़रूरी समझा कि कृषि कानूनों पर शांतिपूर्ण विरोध एक संपन्न लोकतंत्र की एक बानगी है। दरअसल किसान आंदोलन से लेकर संसद के दोनों सदनों तक के ताजा घटनाक्रम को देखने का सही नज़रिया यही होगा कि इस तमाम संघर्ष और बहस मुबाहसे को लोकतंत्र के जीवंत होने का प्रमाण माना जाए। सरकार ने संसद में कानून बना कर अपने एक चुनावी वादे को ही पूरा नहीं किया, बल्कि एक चिर प्रतीक्षित 'सुधार' की दिशा में साहसिक कदम भी बढ़ाया। लेकिन कानून की सार्थकता उसकी लोक-स्वीकृति पर निर्भर है। दुर्भाग्यवश इन कानूनों को वैसा जन-समर्थन नहीं मिल पाया, जिसकी ज़रूरत किसी सुधार के लिए होती है। उल्टे ज़मीन से उठा हुआ एक जन आंदोलन इनके खिलाफ उठ खड़ा हुआ। इस आंदोलन की गंभीरता सरकार को थोड़ी देर से समझ में आई। यही वजह है कि सरकार ने कुछ वर्षों तक इन कानूनों  पर अमल न करने का प्रस्ताव रखा है। लेकिन इस बीच आंदोलन को किसानों ने आन-बान-शान का प्रतीक बना लिया। किसानों से इतनी समझदारी की अपेक्षा अब भी है कि तीनों कानूनों की 'वापसी' को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएँ तथा बीच का रास्ता खोजने में सरकार की मदद करें। सरकार झुकी है तो किसान भी थोड़ा झुक जाएँ। आखिर लोकतंत्र के लिए आपसी समझदारी की ज़रूरत होती है, हठधर्मिता की नहीं। 


लोकतांत्रिक परंपरा के लिहाज से एक मूलभूत गड़बड़ यह भी हो रही है कि किसानों ने अपने आंदोलन और प्रदर्शन को "केंद्र सरकार से लड़ाई" बना डाला है। लोकतंत्र में अपनी माँगों के लिए आंदोलन और प्रदर्शन उसके स्वस्थ होने के सूचक होते हैं, लेकिन अगर इन्हें "आरपार की लड़ाई" का रूप दे दिया जाता है, तो इसे चिंताजनक और खतरनाक प्रवृत्ति मानना पड़ेगा। किसान और सरकार दोनों को ही यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सत्याग्रह को जनता और सत्ता के "युद्ध" में बदलना ही गतिरोध का मूल कारण होता है। अतः अगर हमें दुनिया के सामने सकारात्मक लोकतांत्रिक संघर्ष का उदाहण पेश करना है तो "युद्ध" वाली मानसिकता छोड़नी होगी।लेकिन 26 जनवरी के बाद के घटनाचक्र से ऐसा लगता है कि किसान भाइयों ने कानून वापसी को जीवन-मरण का प्रश्न बना लिया है और इससे कम उन्हें कुछ नहीं चाहिए। यह अड़ियल रवैया नहीं बदलेगा, तो गतिरोध भला कैसे टूट पाएगा? सावधान, किसान भाइयो! कहीं  इतिहास  आपको जानबूझकर समझौता न करने का दोषी न करार दे! 


अंततः यही कि- तारों को इतना नहीं कसना चाहिए कि वे टूट जाएँ!000

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