बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

श्रद्धांजलि / क्षेत्रीय पत्रकारिता के साहसी योद्धा का मौन अवसान

 श्रद्धांजलि - निर्भीक पत्रकार अशोक मेहता का जाना /विजय केसरी


हजारीबाग जिले के झुमरा अंचल के पत्रकार अशोक मेहता का मात्र 60 वर्ष की उम्र में दुनिया से विदा होना एक अपूरणीय क्षति है। अशोक मेहता एक आंचलिक पत्रकार होते हुए भी पूरे जिले में लोकप्रिय हैं। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। वे पत्रकारिता के साथ समाज सेवा से भी जुड़े हुए थे। जीविकोपार्जन के लिए हजारीबाग कोर्ट में मुंशी का काम भी  किया करते थे। वे सुबह और शाम के समय होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में रोगियों की सेवा किया करते थे। वे  एक समाज सेवक के रूप में समाज के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। समाज में शांति स्थापित कैसे रहे? इस निमित्  वे सदा शांति समिति की बैठकों में अपने विचार प्रकट करते नजर आते थे। समाज में भाईचारा कैसे स्थापित हो? इस निमित् उनकी सामाजिक निष्ठा देखते बनती थी। समाज में शांति स्थापना, भाईचारे की स्थापना के लिए वे सदैव अग्रसर रहा करते थे। एक पत्रकार के रूप में ढूंढ-ढूंढ कर खबरों को विविध रूपों में प्रस्तुत करते रहते थे। पाठक गण उनकी खबरों को बड़े ही चाव से पढ़ा करते थे। उनकी खबरों में एक साकारात्मक दृष्टिकोण होता था। वे अपनी खबरों के माध्यम से  पाठकों को शिक्षित भी किया करते थे। उन्होंने कभी भी पत्रकारिता पर आंच नहीं आने दिया। उन्होंने  पत्रकारिता की नैतिकता को आजीवन निभाया । पत्रकारिता के प्रति उनकी निष्ठा और लगन देखते बनती थी। 

 वे एक साथ कई भूमिकाओं में नजर आते थे। जब वे एक पत्रकार होते तो विशुद्ध पत्रकार की भूमिका में होते। जब वे होम्योपैथिक चिकित्सक होते तो पूरी तरह एक चिकित्सक के रूप में अपने कार्य को अंजाम देते थे। वे शांति समिति की बैठकों में शांति स्थापना एवं सामाजिक सौहार्द्र स्थापना की  भूमिका अदा कर रहे होते। समाज के गरीब, दलित एवं असहाय लोगों को कैसे मुख्यधारा में लाया जाए? उन्हें कैसे मदद पहुंचाई जाए ?  वे इस दिशा में पूरी शिद्दत के साथ संलग्न होते थे। सभी जगहों में  उनकी भूमिका  अलग-अलग होती थी । वे हर भूमिका में पूरी तरह उत्तीर्ण होते थे। एक बार मैं उनसे पूछा  था , भाई अशोक जी आप एक व्यक्ति होकर इतना काम कैसे कर लेते हैं? तब उन्होंने कहा था कि, मैं समय का प्रबंधन पूरी इमानदारी से करता हूं।  समय का पाबंद हूं। हर काम के लिए मैंने समय निर्धारित कर दिया है ।  हर काम मैं समय पर करता हूं। मेरा नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात्रि का भोजन, सब समय पर निर्धारित है। नियमित समय पर मेरी पूजा, मेरा कोर्ट का काम, समाज सेवा का , होम्योपैथिक चिकित्सा एवं पत्रकारिता होती है। सबके लिए मैंने समय निर्धारित कर रखा है। मैं  समय पर सभी काम  करता रहता हूं। इसलिए मुझे तनिक भी तनाव नहीं होता है। मैं जब कोर्ट में होता हूं, तो वहां कैसे लोगों को मदद करूं ?  यह मेरा पहला फर्ज होता है। मैं कभी अधिक कमाने के लिए नहीं सोचा । बस ईश्वर से यही मांगता हूं कि जरूरत भर धन मुझे मिल जाए जीवकोपार्जन के लिए। बस इतना ही धन  काफी है।  मैं अधिक कमाने के लिए कभी सोचता भी नहीं हूं । और ना ही बैंकों में रुपए जमा करना चाहता हूं। आगे उन्होंने कहा "साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूं और साधु भी भूखा ना जाए।" उनका संपूर्ण जीवन इन्हीं पंक्तियों में बंधा हुआ दिखता है।

  वे सहयोगी और मिलनसार  प्रकृति के व्यक्ति रहे। उन्होंने कभी भी गलत कार्यों को प्रोत्साहन नहीं दिया। और ना ही कोई गलती करने की कोशिश की। उन्होंने अपने छोटे से परिवार का मुखिया होने के नाते अपनी जवाबदेही का निर्वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ की। उनकी दो पुत्रियां एक पुत्र हैं। दोनों पुत्रियों को उन्होंने उच्च शिक्षा प्रदान की। उन्होंने अपने जीवन काल में ही दोनों पुत्रियों की  शादी भी कर दी। दोनों पुत्रियां बहुत ही बेहतर घरों में सेटल है। एक पुत्री उनकी सरकारी सेवा में है। एक गृहणी है। एक बेटा   लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी में लगा हुआ है। उन्हें उम्मीद है कि उनका बेटा  लोक सेवा आयोग की परीक्षा में जरूर सफल होगा। उन्होंने  पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन  पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ किया। उनका अपनी अर्धांगिनी के प्रति जो उनका फर्ज रहता उसका निर्वहन पूरी ईमानदारी के साथ किया। उन्होंने  घर में बच्चों को किसी भी तरह की कोई कमी नहीं होने दी। घर के सभी लोग उनसे बहुत खुश रहा करते थे।  अशोक मेहता को कभी भी किसी ने उदास नहीं देखा। वे एक आस्थावान और ईश्वर पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। उनकी ईश्वर भक्ति देखते बनती थी। में   वे घर में बने मंदिर में पूजा करने के बाद ही अपने काम का श्रीगणेश किया करते थे। 

  अशोक मेहता जी वैज्ञानिक सोच के व्यक्ति थे। वे समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता,  भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा,आदि को जड़ से समाप्त करना कि चाहते थे। वे समाज को जागरूक करने के लिए समय-समय पर होने वाली बैठकों में अपनी बातें रखा करते थे। अशोक मेहता की बातों को लोग बड़े ही ध्यान से सुना करते थे। उनका चित  अंदर और बाहर दोनों एक समान था । इसलिए उनकी बातों का प्रभाव समाज पर गहरे रूप से पड़ता था। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। उन्होंने कभी भी किसी को धोखा नहीं दिया। उन्होंने जिन से जो वादा किया, उसको पूरा किया। वे कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेते थे। वे अपने क्लाइंट को साफ-सुथरी बातें बता दिया करते थे। वे उचित पारिश्रमिक लिया करते थे। होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में अपनी सेवा लोगों को दिया करते थे। वे बदले में नहीं के बराबर राशि लेते थे। वे  कई रोगियों को मुफ्त में दवा भी दे दिया करते थे। इस विषय पर वे कहा करते  थे कि, मैं क्या लेकर आया हूं और क्या लेकर जाऊंगा ? जो लिया हूं, यहीं लिया हूं। और यही लौटा रहा हूं। मुझे कुछ भी लेकर नहीं जाना है। यह बात उन्होंने कम उम्र में ही साबित कर दी थी।

   सहज-सरल प्रकृति के अशोक मेहता सदैव मुस्कुराते हुए मिलते। उन्होंने अपनी दो-दो पुत्रियों की शादी अपने से बड़े घरों में की। लेकिन उन्होंने समाज के किसी भी लोगों के सामने हाथ नहीं फैलाया। उनके पास जो संग्रहित पूंजी थी, उसी से अपनी दोनों बेटियों की  शादी बड़े ही धूमधाम से की थी। पत्रकारिता उनका पैशन था। इस पैशन का चुनाव उन्होंने स्वयं से किया था। इस बाबत उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि पत्रकारिता से मुझे बेहद शांति और शक्ति  मिलती है। समाज की समस्याओं को पत्र के माध्यम से लोगों के सामने रखता हूं। यह कोशिश करता हूं कि समस्याओं का निदान हो। इस निमित्त कई बार कुछ लोगों ने उन्हें धमकियां भी थी। लेकिन उन्होंने कलम को कभी रोका नहीं बल्कि निरंतर  गति पकड़ी रही थी। उन्होंने धमकियों की कभी परवाह की। वे लगातार लिखते रहे। वे मृत्यु से पूर्व तक रिपोर्टिंग करते रहे। उनका जाना निश्चित तौर पर अपूरणीय क्षति है। एक निर्भिक, निष्ठावान और ईमानदार आंचलिक पत्रकार थे। उन्होंने नैतिकता का कभी त्याग किया नहीं। विपरीत परिस्थितियों में भी वे सदैव मुस्कुराते मिले। अपने स्वाभिमान को कभी नतमस्तक होने नहीं दिया। समाज में शांति, सौहार्द की स्थापना के लिए सदा लड़ते रहे,संघर्ष करते रहे। वे सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए सदैव अग्रसर रहें। उनका संपूर्ण जीवन समाज की खुशहाली लाने में लगा रहा। उनके जीवन से हम लोगों को ईमानदारी, नैतिकता और सादगी की प्रेरणा लेनी चाहिए।


विजय केसरी

(कथाकार/स्तंभकार)

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग (825301)

मोबाइल नंबर- 9234799550

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें