गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

शाहरुख का कोलबंस / विवेक शुक्ला


शाहरुख़ से भी चमकदार रतन भरे हैं सेंट कोलबंस में / विवेक शुक्ला 


बेशक,किसी भी स्कूल-कॉलेज की पहचान होते हैं वहां के विद्यार्थी और अध्यापक। इस मोर्चे पर 1941 में स्थापित सेंट कोलबंस स्कूल लगातार शानदार उदाहरण पेश करता रहा है। 

सेंट कोलबंस स्कूल ने बॉलीवुड बादशाह शाहरुख खान, एम्स के डायरेक्टर डा. रणदीप गुलेरिया, मोटिवेशनल गुरु डा. दीपक चोपड़ा, पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक डा. सिद्धार्थ मुखर्जी, डा. पलाश सेन, नजीब जंग, अभिषेक मनु सिंघवी, स्पाइस जेट के फाउंडर राजीव सिंह जैसी सैकड़ों हस्तियां को तराशा और बेहतर नागरिक बनाया। 

यहां से 1984 में पास आउट शाहरुख खान ने इधर ही नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया था। वे ‘मैं हूं ना’ फिल्म में अपने स्कूल के एक टीचर से मिलता-जुलता किरदार बिन्दु से करवाते हैं। 

सेंट कोलबंस स्कूल के पुराने स्टुडेंट को याद हैं स्वीमिंग कोच साहू सर। उनकी इंग्लिश गजब थी। दो उदाहरण पेश हैं। इन्हें पढ़कर मुस्कुराना मना है। वे कहते थे ‘मीट मी बिहाइंड दि लंच’ और ‘ओपन दि विंडो सो डैट क्लाइमट कैन कम’। अगर आपने ‘मैं हूं ना’ देखी होगी तो आपको याद होगा कि बिन्दु भी साहू सर वाले डायलाग बोलती हैं।

आप जब भी गोल डाक खाना के आगे से गुजरेंगे तो सेंट कोलंबस स्कूल की लाल रंग की इमारत आपका ध्यान खीचेगी। इसके डिजाइन में एक गरिमा है। आयरलैंड की क्रिश्चन ब्रदर्स नाम की संस्था ने सेंट कोलबंस को शुरू किया था। उसे एक अलग स्तर   पर ले जाने में ब्रदर एरिक डि सूजा.ब्रदर जी.पी.पिटो, मैडम एल डिसा जैसे दर्जनों अध्यापकों का अमूल्य योगदान रहा। इन और इन जैसे गुरुओं ने सेंट कोलंबस स्कूल में अनुशासन पर जोर दिया पर अनुशासन की आड़ में आतंक नहीं फैलाया। यहां पर बच्चों को अपने शिक्षकों से सवाल करने और स्वस्थ डिबेट करने की हमेशा छूट रही। 


सेंट कोलबंस स्कूल ने भारतीय सेना से एक करीबी रिश्ता बनाकर रखा। सेंट कोलबंस के ही छात्र रहे थे परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। अरुण खेत्रपाल 1971 की जंग के हीरो थे। उन्होंने पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु के दस टैंक नष्ट किए थे। वे तब 21 साल के थे। इतनी कम आयु में अब तक किसी को परमवीर चक्र नहीं मिला है।

 नोएडा का अरुण विहार उसी रणभूमि के योद्धा के नाम पर है। अरुण खेत्रपाल ने इंडियन मिलिट्री अकाडमी से जून, 1971 में ट्रेनिंग खत्म की। उसी साल दिसंबर में पाकिस्तान के साथ जंग शुरू हो गई। अरुण खेत्रपाल की स्क्वेड्रन 17 पुणे हार्स 16 दिसम्बर 1971 को शकरगढ़ में थी। वे टैंक पर सवार थे। टैंकों से दोनों पक्ष गोलाबारी कर रहे थे। वे शत्रु के टैंकों को बर्बाद करते जा रहे थे। तब ही उनके टैक में आग लग गई। वे शहीद हो गए। लेकिन उनकी टुकड़ी उनके पराक्रम को देखकर इतनी प्रेरित हुई कि वह दुश्मन की सेना पर टूट पड़ी। युद्ध में भारत को सफलता मिली। अरुण खेत्रपाल को शकरगढ़ का टाइगर कहा जाता है। 

अफसोस कि दिल्ली ने उनके बलिदान को किसी रूप में याद नहीं रखा। लेकिन सेंट कोलंबस स्कूल को उन पर नाज है। इससे पहले भारतीय नेवी के एडमिरल बी.एस. सोमन ने 1962 में स्कूल के स्वीमिंग पूल का उदघाटन किया था। भारत-पाक की 1965 की जंग के बाद यहां भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन.चौधरी आए। सेंट कोलबंस स्कूल ने उस जंग में शत्रु सेना पर ताबड़तोड़ हमले करने वाले मेजर भास्कर राय का भी गर्मजोशी से स्वागत किया। वे सेंट कोलंबस से ही थे। बहरहाल, चार अध्यापकों और 32 छात्रों के साथ शुरू हुआ सेंट कोलबंस स्कूल इस साल 80 साल की यात्रा पूरी कर रहा है। राजधानी में इससे पहले और बाद में भी कई स्तरीय स्कूल खुले। आगे भी खुलेंगे। पर सेंट कोलबंस स्कूल के शिखर को छूना इतना आसान नहीं है। Vivek Shukla 

लेख25 फरवरी 2021 को नवभारत टाइम्स के साड्डी दिल्ली कॉलम में छपा।

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