सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

1200 साल पहले का भारत

 #pratilipihindi #freeread #गुडरीड /(तकरीबन १२०० साल पहले, जगह- जातस साम्राज्य, मध्य भारतवर्ष)



एक घुडसवार सैनिक तेजी से दौड़ते हुआ जा रहा है| वो अच्छी नस्ल का काले रंग का घोड़ा मानो एक नई  उमंग लेकर अपने मालिक सैनिक को अपने मुकाम पर जल्द से जल्द पहुँचाने के लिये पूरे दम खम से दौड़ रहा है| अपने पैरो के नीचे उड़ती  धूल को हवा मे उछालते हुए  जब वो घोड़ा अरण्य से होकर जातस के द्वार पर पहुंचा तो वहां  पहरा दे रहे सैनिकों ने उसे रोका| 


“मुझे अमात्य रंजन को एक बहुत जरुरी खबर देनी है|” घुडसवार सैनिक बोला|


पहरे वाले सैनिकों ने उसकी पहचान कर उसे  शहर के अंदर जाने दिया| जातस की भव्य नगरी के वो भव्य और मजबूत द्वार मे मौजूद एक छोटा दरवाज़ा कर्र... कर्र... आवाज़ करते हुए  खोला गया| उस समय भारतवर्ष मे जातस एक बहुत ही बडा साम्राज्य था| जातस भारतवर्ष के बिचोबीच अपने अस्तित्व की निशानी देता था| जिसकी दिवारे उसी की तरह बडी और मजबूत थी| एक मुख्य द्वार आगे की तरफ और दो खुफ़िया दरवाज़े पीछे की तरफ मौजूद थे| उस मुख्य दरवाज़े पर बहुत ही आकर्षक नकाशी की गयी थी| दरवाज़े दोनो बाज़ू मे द्वार को मज़बूती दिलाने और सैनिकों को निगरानी के हेतु  बुर्ज बनाये हुए  थे| वहां पर शेरों के मुँह जैसी रचना वाले पत्थर लगाए गए  थे, मानो जैसे वो अपनेशत्रुओं  को चेतावनी दे रहे हो| जातस नगरी की एक विशेषता थी की वो बहुत ही सुंदर और स्वच्छ थी| नगरी बडे बडे पहाड़ों के नीचे थी| शहर के अंदर जो मुख्य बाजार था वो शहर के समृद्धि की एक वजह था| अनेक राज्यों से व्यापारी वहां आकर अपनी दुकानों मे चीजें बेचते थे|


राज्य के द्वार को पीछे  छोड़ते हुए  वो सैनिक उस महल के पास पहुंचा जहाँ  पर आचार्य और अन्य अमात्य रहते थे|


जातस नगरी जितनी अंदर से मजबूत थी उतनी ही वो बाहर से अपने जमींदार और आसपास के गावों मे बसे सरदारों की वजह से मजबूत थी| वो महल जहाँ  अमात्य रंजन से मिलने वो घुडसवार सैनिक पहुँचा था, वो काफी सुंदर था| अतिथि महल के नाम से जाना जाने वाला वो महल काफी बडा था| काले पत्थरों मे बनाया गया वो महल काफी आकर्षक था| वो सैनिक अपने घोड़े को वहाँ  मौजूद रक्षकों के पास छोड़कर सीढ़ियों  से ऊपर चला गया| वहाँ  के सेवक ने जैसे ही अंदर उस सैनिक का संदेश भेजा, उसे तुरंत अंदर बुलाया गया| एक बडे से दफ्तर मे जहाँ मेज़ और उसके इर्दगिर्द कुर्सियां थी, आचार्य कपिलदत्त और मुख्य अमात्य रंजन आपस मे राज्य के व्यवहार के बारे मे चर्चा कर रहे थे|


“बोलो क्या बात है|” अमात्य रंजन अपनी कुर्सी को सैनिक की तरफ मोड़ते  हुए  बोले| “प्रणाम आचार्य जी, अमात्यजी| मैं अपनी नई  शुरू की गयी खदान पर मुख्य रक्षक हूँ | खबर ही गुप्त थी इसी लिए  खुद चला आया|” सैनिक झुक कर बोला.


कपिलदत्त और रंजन ने एक दूसरे की और हैरानी से देखते हुए  सैनिक की और देखा. “आप को तो पता ही होगा की पिछले कुछ दिनो से सांस लेने मे हो रही दिक्कत के कारण खुदाई करने वाले मज़दूर परेशान थे| उसी कारण कल से खुदाई रोकने के लिये आपने कहा था, लेकिन हमे वहाँ कुछ अजीब मिला है| बडा सा, कुछ धातू के बक्से जैसे बना हुआ| लेकिन जैसे ही हमे पता चला हमने काम रुकवा दिया|” सैनिक बोला| 


कपिलदत्त और रंजन काफी शांत और अच्छे स्वभाव के थे इसी लिए सैनिक या कोई भी खबरी अपनी बात पहले उनसे किया करते थे| कपिलदत्त औधे  मे सबसे बडे थे|  सर का मुंडन किया हुआ था, दाढ़ी और मूँछें अच्छे से साफ की हुई थी , रंग से गोरे, लंबा कद, पतला लेकिन मजबूत शरीर, ४०-४५ की उम्र मे भी जवान दिखते थे कपिलदत्त| उनका चेहरा उनकी प्रतिभा को उजागर करता था| उनकी थोड़ी नीली  सी दिखने वाली आंखे किसी को भी उनकी ओर आकर्षित करने पर मजबूर कर देती| उनके मुकाबले रंजन का कद छोटा था, बालों एवं दाढ़ी मूछों  का  मुंडन करके सर पर एक शिखा रखी हुई थी| रंग उनका गोरा ही था लेकिन चेहरा उतना आकर्षक नही था| लेकिन दोनो ही अच्छे दोस्त थे और राजा के प्रति  ईमानदार|


कपिलदत्त और रंजन के मानो रोंगटे खड़े हो गए हो| वे दोनो भी अपनी कुर्सियो से उठकर ख़ुशी से फूले नही समाए | “क्या तुमने देखा वो बक्सा?” रंजन ने अचरज से पूछा| “जी हां, अमात्यजी| काफी बडा लगता है| जहाँ पर भी उनके औजारों के घाव लगे वहां  से धातू से टकराने की ही आवाज़ आई|” सैनिक बेफिक्र होकर बताने लगा|


“ठीक है, ठीक है, अब मज़दूरों को बाहर भेजकर वहाँ  की सुरक्षा बढ़ाओ | हम राजा को ये समाचार सुनाते है तब तक तुम वहाँ की सुरक्षा को संभालो| हो सकता है की राजा ये खबर सुनकर वहां खुद चले ...

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