मंगलवार, 26 जनवरी 2021

बाबासाहेब के आसपास / विवेक शुक्ला

वे आंबेडकर के कौन थे ?

 राजधानी के पश्चिम विहार के उस घर का बाबा साहेब आंबेडकर  से अटूट संबंध है । हालांकि ये घर और एरिया बाबा साहेब के 1956 में महापरिनिर्वाण दिवस के दशकों के बाद बना। ये घर है नानक चंद रत्तू का। बाबा साहेब 1942 में वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में दिल्ली आ गए थे। 


उन्हें 22 प़ृथ्वीराज रोड पर सरकारी आवास मिला। बस तब ही लगभग 20 साल के रत्तू उनके साथ जुड़ गए। वे टाइपिंग जानते थे।

 रत्तू को बाबा साहेब के समाज के कमजोर वर्गों के लिए कार्यों और संघर्षों की जानकारी थी। बाबा साहेब ने उत्साही और उर्जा से लबरेज रत्तू को अपने पास रख लिया। उस दौर में बड़े नेताओं और आम जनता के बीच  दूरियां नहीं हुआ करती थी। रत्तू पंजाब के होशियारपुर से थे। उसके बाद तो वे बाबा साहेब की छाया की तरह रहे। 

 बाबा साहेब जो भी मैटर उन्हें डिक्टेट करते वह उसकी एक कॉर्बन कॉपी अवश्य रख लेते। वे नौकरी करने के साथ पढ़ भी रहे थे। बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल पर 1951 में नेहरु जी की कैबिनेट को छोड़ दिया। तब बाबा साहेब ने रत्तू जी को अपने पास बुलाकर कहा कि वे चाहते हैं कि सरकारी आवास अगले दिन तक खाली कर दिया जाए। ये अभूतपूर्व स्थिति थी। रत्तू नए घर की तलाश में जुट गए।


 संयोग से बाबा साहेब के एक मित्र ने उन्हें 26 अलीपुर रोड के अपने घर में शिफ्ट होने का प्रस्ताव रख दिया। बाबा साहेब ने हामी भर दी। रतू जी ने अगले ही दिन बाबा साहेब को नए घर में शिफ्ट करवा दिया। मतलब उनमें प्रबंधन के गुण थे। नए घर में बाबा साहेब का वक्त अध्ययन और लेखन में गुजरने लगा।


उन्होंने वहां पर ही ‘बुद्धा एंड हिज धम्मा’ नाम से अपनी अंतिम पुस्तक लिखी।उनकी 1956 में सेहत बिगड़ने लगी। रत्तू जी उनकी दिन-रात सेवा करते। उनकी छाया बनकर रहते।


 बाबा साहेब के निधन के बाद रतू जी बाबा साहेब के विचारों के प्रसार-प्रचार में लग गए। सारे देश में जाते। उम्र बढ़ने लगी तो उन्होंने जैसे-तैसे सन 1980 में अपना घर बना लिया। अपनी सन 2002 में मृत्यु से पहले उन्होंने बाबा साहब के जीवन के अंतिम वर्षों परएक किताब भी लिखी।


इस बीच,बाबा साहेब की निजी लाइब्रेयरी में हजारों किताबें थीं। उन्हें अपनी लाइब्रेयरी बहुत प्रिय थी। उस लाइब्रेयरी को देखते थे देवी दयाल जी। वे बाबा साहेब से 1943 से अंत तक जुड़े रहे। बाबा साहेब जहां कुछ भी बोलते तो देवी दयाल उसे प्रवचन मानकर नोट कर लिया करते थे।

मालूम नहीं कि उन्हें ये प्रेरणा कहां से मिली थी।


 वे बाबा साहेब के पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले लेखों और बयानों आदि की कतरनों को भी रख लेते थे। बाबा साहेब के सानिध्य का लाभ देवी दयाल को ये हुआ कि वे भी पढ़ने लगे। वे बाबा साहेब के बेहद प्रिय सहयोगी बन गए। उन्होंने आगे चलकर ‘डा.अंबेडकर की दिनचर्या’ की दिनचर्या नाम से एक महत्वपूर्ण किताब ही लिख डाली। उसमें अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। 


जैसे कि 30 जनवरी,1948 को बापू की हत्या के बाद बाबा साहेब की क्या प्रतिक्रिया थी? “बापू की हत्या का समाचार सुनकर बाबा साहेब स्तब्ध हो जाते हैं। वे पांचेक मिनट तक सामान्य नहीं हो पाते। फिर कुछ संभलते हुए बाबा साहब कहते हैं कि बापू का इतना हिंसक अंत नहीं होना चाहिए था”, ये जानकारी ‘डा.अंबेडकर की दिनचर्या’ में मिलती है।


 इस किताब को लिखने में देवीदयाल जी की पत्नी उर्मिला जी ने बहुत परिश्रम किया था क्योंकि पति की सेहत खराबहोने के बाद वह ही पुरानी डायरी के पन्नों को सफाई से लिखती थी। अपने अंतिम दिनों में मुनीरका में रहा करते थे देवी दयाल जी। उनका 1987 में निधन हो गया था।

 

बाबा साहेब की प्रतिमा संसद भवन में कब लगी

 

डा.भीमराव आंबेडकर की संसद भवन परिसर में प्रतिमा 2 अप्रैल 1967 को स्थापित हुई थी। उसका अनावरण किया था भारत के तब के राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्नन ने। इस प्रतिमा को तैयार किया था महान मूर्तिशिल्पी श्री बी.वी. वाघ ने।


संसद भवन के गेट नंबर तीन पर लगी बाबा साहेब की शानदार प्रतिमा में वाघ ने उन्हें जनता का आहवान करते हुए दिखाया है। उनके एक हाथ में भारत के संविधान की प्रति भी है। बाघ ने ही तिलक ब्रिज पर बाल गंगाधर तिलक और मिन्टो रोड में छत्रपति  शिवाजी की प्रतिमाएं भी बनाईं थीं। वाघ मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे। उनकी कृतियां मुंह से बोलती हैं। वास्तव में वे कमाल के मूर्तिशिल्पी थे।


कब संसद भवन में लगा

बाबा साहेब का चित्र

डा. भीमराव आंबेडकर का संसद भवन  के सेंट्ल हॉल में लगा चित्र सुश्री जेबा अमरही ने बनाया था। इसका अनावरण देश के प्रधानमंत्री के रूप में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 12 अप्रैल 1990 को किया था। 

इस बीच, बाबा साहेब कभी 15 जनपथ में नहीं रहे। वे या तो 22 पृथ्वीराज रोड  या फिर 26 अलीपुर रोड पर रहे। तो फिर उनके नाम पर फाउंडेशन जनपथ में क्यों बनाया गया? दरअसल इसकी वजह यह थी कि 15 जनपथ पर डा. अंबेडकर  के परम सहयोगी भाऊराव कृष्णजी गायकवाड दो बार रिपब्लिकन पार्टी के संसद सदस्य के रूप में रहे। 


उन्होंने भी डा. अंबेडकर के साथ 14 अक्तूबर 1956 को बुद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। फिर 15 जनपथ का बंगला रिपब्लिकन पार्टी का दफ्तर भी रहा। इसलिए ही सरकार ने इसे अंबेडकर फाउंडेशन के रूप में विकसित किया। अब इधर बाबा साहेब की एक भव्य प्रतिमा भी लगी हुई है, जिसे चोटी के मूर्तिशिल्पी राम सुतार ने बनाया था।

बाबा साहेब की दिल्ली में पहली प्रतिमा कहां

संसद भवन में लगी प्रतिमा से लगभग दस साल पहले बाबा साहेब की प्रतिमा रानी झांसी रोड पर स्थित अंबेडकर भवन में 14 अप्रैल 1957 को स्थापित की गई थी। डा. अंबेडकर ने अंबेडकर भवन की 16 अप्रैल 1950 को नींव रखी थी।

बाबा साहेब की 6 दिसंबर 1956 को मृत्यु के बाद उनका जो पहला जन्म दिन आया, उस दिन उनकी दिल्ली में पहली प्रतिमा लगाई गई। उसके बाद तो यहां पर बाबा साहेब की अनेक प्रतिमाएं लगती रहीं।

Navbharatimes में 3 और 5 दिसंबर 2020 को छपे लेखों के सम्पादित अंश।

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