बुधवार, 20 जनवरी 2021

अनमोल प्रसंग

 "प्रस्तुति - कृष्ण मेहता 

आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते पर आप अपनी आदतें बदल सकते हैं और निश्चित रुप से आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देंगी।"

पुरानी नकारात्मक आदतों की जगह नया सकारात्मक अभ्यास अपनाने से बहुत फर्क पडता है।कदाचित परिस्थितियां न बदलें पर मानसिकता में रचनात्मक बदलाव कथित प्रभावों को नष्ट करने में सक्षम होता है।

आदमी क्या मानता है,उसका विश्वास किस तरह का है इस पर दारोमदार है।कुछ लोग सही बात समझाने पर भी अपना पूर्वाग्रह नहीं छोडते।वे अपने हाथों अपने भविष्य को निश्चित सांचे में ढाल रहे होते हैं।उनकी आदत दोष लगाने की हो जाती है।आत्मपरिवर्तन की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता।

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"किसीको हराना बहुत आसान है लेकिन किसीको जीतना बहुत आसान नहीं है।"

हराने के लिये कुछ अभ्यास की आवश्यकता है,जीतने के लिये पहले अपने को जीतना पडे।जो अपने हृदय को जीत लेता है वह सबके हृदय को जीत लेता है।अपने हृदय को जीतना संभव है यदि इसकी आवश्यकता का अनुभव हो।आदमी सोच तो सकता ही है कि अपने हृदय को कैसे जीता जाय जिसका अर्थ है अपना नियंत्रण अपने हाथ में होना।सामान्यतया आदमी अपना नियंत्रण दूसरे के हाथ में अनुभव करते हुए उसे जीतने की कोशिश करता है।

यह सही नहीं।पहले अपने हृदय को जीतें ताकि अपना नियंत्रण अपने हाथ में हो,फिर दूसरे के हृदय को जीतना आसान हो जाता है  चाहे वह कितना ही शक्तिशाली हो,दबंग हो तथाकथित।

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"सफलता की कहानियां मत पढो उससे आपको केवल एक संदेश मिलेगा।असफलता की कहानियां पढो उससे आपको सफल होने के कुछ आइडियाज(विचार)मिलेंगे।"

'Meditation is not an escape.It is the courage to look at reality with mindfulness.'

अपनी असफलता की कहानी सुनाने में रुचि उसीकी हो सकती है जो उत्साही हो।हताशा को प्राप्त व्यक्ति में किसी रुचि के कोई लक्षण दिखाई नहीं पडते।

दूसरी बात बिना मेहनत सफल होनेवाले में कोई  खासियत नहीं होती लेकिन बारबार असफल होनेवाला व्यक्ति जब सफल होता है तब उसके पास कहने को कुछ होता है।उसकी दृढता, उसकी हठ,उसकी जिद,उसकी दूरदर्शिता उसे पीछे नहीं पडने देती।वह हर हाल में स्वयं उपस्थित रहता है पूरी तरह से,आधा अधूरा कभी नहीं।

ध्यान में यही होता है।आदमी स्वयं पूर्णतया उपस्थित रहकर अपना निरीक्षण करता है,अपने साथ रहता है।अपने में आवश्यक परिवर्तन लाता है।

यदि उससे कष्ट सहन नहीं होता,अनुकूलता की इच्छा एवं प्रतिकूलता की,असुखद संवेदन की अनिच्छा हो तो यह संभव नहीं है।

साहस चाहिए।साहस यथार्थ को देखने में सक्षम होता है।वह पूरी तरह से प्रस्तुत होता है तथा पलायन के उसमें कोई चिन्ह दिखाई नहीं देते।

कई बार अहंकार भी अपने को पलायनरहित रखने की कोशिश करता है पर अहंकार और साहस में बडा फर्क होता है।अहंकार हर हालत में सुरक्षावादी होता है।साहस असुरक्षा का दिल खोलकर स्वागत करता है इसलिए वह साहस है अन्यथा वह "साहस" नहीं, कुछ और चीज है।इसका अर्थ यह नहीं कि साहस नासमझ होता है।साहस और समझ का साथ चलना सही है। यह तो नासमझी है जो अहंकार के साथ बनी रहती है।अहंकार है ही नकारात्मक अन्यथा अस्तित्व की दृष्टि से हर आदमी सहज है,स्वाभाविक है,पूर्ण है,आत्मस्वरूप है।

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