शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

भारत यायावर की कविताएं / विजय केसरी

 जीवन का अर्थ बताती 'कविता फिर भी मुस्कुराएगी'


देश के जाने माने प्रख्यात साहित्यकार, कवि, आलोचक व संपादक भारत यायावर  की  एक कविता 'कविता फिर भी मुस्कुराएगी'आजकल कविता प्रेमियों की जुबान पर है। कविता की चर्चा चहुंओर हो रही है। 'कविता फिर भी मुस्कुराएगी' कविता संग्रह की यह शीर्षक कविता है। यह कविता मर्म को छूने के साथ ही  मानवीय जीवन का अर्थ भी बताती नजर आती  है। कविता पर चर्चा करूं, इससे पूर्व कविता के शीर्षक के संदर्भ में कुछ बातों को विस्तार देना चाहता हूं। कविता का शीर्षक है, 'कविता फिर भी मुस्कुरागी,' । कवि चाहते तो सिर्फ 'कविता मुस्कुराएगी' लिखकर शीर्षक को पूरा कर सकते थे । लेकिन उन्होंने ऐसा न लिखकर, 'कविता फिर भी मुस्कुराएगी' लिखा। इस शीर्षक लेखन के पीछे बहुत ही गहरी अर्थवत्ता छुपी हुई है। कविता की पंक्तियों के पाठन से ऐसा प्रतीत होता है। 'फिर भी', शीर्षक से जोड़कर कवि ने इसे सार्थक बना दिया।

 'कविता मुस्कुराएगी,' 'कविता फिर भी मुस्कुराएगी,' में सिर्फ 'फिर भी' का ही अंतर है। अगर शीर्षक 'कविता मुस्कुराएगी' रहता तो बात अधूरी रह जाती। 'कविता फिर भी मुस्कुराएगी' में 'फिर भी' जोड़ देने मात्र से शीर्षक मानवीय जीवन की यात्रा में कविता की भूमिका सुनिश्चित करती है। कविता  मनुष्य के जीवन का  सच्चा सहचर है।जीवन क्या है ? जीवन एक कविता के समान निरंतर बहती धारा है। समयानुसार हम सब जन्म लेते हैं। बचपन  से शुरुआत होती है। आगे जवानी को प्राप्त करते हैं । अंत में बुढ़ापे के रूप में  रूपांतरण होता है। फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। यह जीवन का रूपांतरण जीवन का कटु सत्य है। कविता  एक सहचर के रूप में मेरे साथ जीवन भर  चलती रहती है। कविता हमारे होने का एहसास भी कराती रहती है।  कविता हमारे हंसने - रोने,  सुख - दुख में  साक्षी भाव से बनी रहती है ।  कविता हमारे दुख और  सुख दोनों में साक्षी भाव में तटस्थ खड़ी होती है। निर्लिप्त होती है। हमारी हर परिस्थिति में  कविता मुस्कुराती नजर आती है। कविता का यही स्वभाव है।

  कविता एक साक्षी भाव से मेरे साथ बनी रहती है। कविता  माया के बंधनों से मुक्त होती हैं। कविता अनंत काल से हमारे जीवन के साथ जुड़ी हुई होती हैं और अनंत काल तक बनी रहेगी ।

  'कविता फिर भी मुस्कुराएगी' कविता की पहली पंक्तियां कहती है । टहनियां सूख जाएंगी / हमारा अपना होने का अर्थ मिट जाएगा / कविता फिर भी मुस्कुराएगी'।  हमारा जीवन भी वृक्ष के एक टहनी के समान है। टहनियां जब जन्म लेती है। तब उसका रूप बहुत ही सूक्ष्म होता है।  धीरे धीरे बढ़ती हुई टहानियां आकार ग्रहण करती हैं।  जिस प्रकार हम सब गर्भ होते हैं, तो हमारा भी रूप सुक्ष्म होता है। धीरे - धीरे  बढ़कर  आकार प्राप्त करते हैं। कवि कहते हैं कि एक न एक दिन  टहनियां सूख जाएंगी। अर्थात एक न एक दिन हम सब भी मृत्यु के गाल में समा जाएंगे।  मृत्यु से पूर्व मनुष्य का रूपांतरण होना, मनुष्य के होने का कटु सत्य है। 

   आगे कवि कहते हैं कि हमारा अपना होने का अर्थ मिट जाएगा । अर्थात कुछ समय के लिए ही हमारी उपस्थिति इस धरा पर है। हम सब  जो इस दुनिया को अपना मान बैठे हैं। सब मिथ्या है। मेरे न होने पर  होने का अर्थ मिट जाएगा। इस पर कवि कहते हैं कि मेरे न होने पर  'कविता फिर भी मुस्कुराएगी'। जब हम न थे, तब भी कविता थी । हम हैं, तब भी कविता है । हम न  रहेंगे, तब भी कविता रहेगी। कवि बहुत ही सहजता के साथ जीवन के  रहस्य को खोलते नजर आते हैं ।  'कविता फिर भी मुस्कुराएगी,' में  कवि यह बतलाने की कोशिश करते हैं कि इस माया नगरी को जो हम लोगों ने अपना मान बैठा है। एक न दिन हम सबों  को छोड़कर चल जाना है।  समय रहते हम सबों को इस माया के बंधन से मुक्त होने की जरूरत है। इस संसार में स्वयं को एक कविता के रूप में प्रस्तुत होना ही श्रेष्यकर है।  इस धरा में निर्लिप्त भाव से रहने की जरूरत है । माया में रहकर भी माया में न फंसे। कविता की पंक्तियां यह संदेश देती नजर आती है

    कविता आगे बढ़ते हुए कहती हैं।  कविता/ मेरे धीरे-धीरे मरने का संगीत ही नहीं। कविता सहचर है, हमारे होने का। साथ ही मेरे धीरे-धीरे मरने का संगीत तो नहीं ? कवि बिल्कुल साफ शब्दों में बयान करते हैं कि जीवन मेरे धीरे धीरे कर मरने का संगीत है । इससे घबराने की जरूरत नहीं है । कविता हमारे जीवन के होने का अर्थ भी है। कविता की पंक्तियां आगे  कहती हैं कि कविता/  सृष्टि को अकेले में/ या भीड़ में  भोगी / संवेदना का गीत ही नहीं । कवि कहते हैं कि यह मानवीय जीवन संवेदना का गीत ही है। संवेदना के होते ह्रास पर कवि दुख प्रकट करते हैं । इस धरा से संवेदना क्यों मिटती चली जा रही है ? यह तो मानवीय जीवन का एक मजबूत पक्ष है । अगर संवेदना मिट गई तो हमारे जीवन का अर्थ ही मिट जाएगा। हमारा मिटना तो निश्चित है, लेकिन हमारी संवेदना कभी न मिटे।  संसार के विविध रूपों, संघर्षों , कठिनाइयों और परेशानियों को देखकर कवि कहते हैं कि लोग / रेंगते / घिसटते /थके - हारे लोग/  कविता सिर्फ। इन पंक्तियों में कवि की नजर समाज के उन लोगों पर पड़ती है । जहां लोग जीवन की परेशानियों को झेल रहे होते हैं। अभाव को भोग रहे होते हैं। दाने-दाने को मोहताज होते  हैं। उनका जीवन एक घिसटते हुए मनुष्य की भांति होता है। लोग थके हारे हैं । जीवन में  दर्द और दुख है। फिर भी मनुष्य जीता चला जा रहा है।   कवि मनुष्य के जीवन की परेशानियों को हूबहू प्रस्तुत करते हैं। यह जीवन है । दुख हो, सुख हो, दोनों परिस्थितियों में जीवन को जीना ही पड़ेगा।

     यायावर जी की पंक्तियां आगे कहती है कि  मेरे अंदर /  टूटती है शिलाएं रोज / फिर मैं गहरे अंधेरे में खो जाता हूं/ रौशनी मेरी आंखों में/ ढेर सारा दुआ उड़ेलने लगती है/ लगातार जारी इस बहस में। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से हमारी हमारे मन के हाल को बयान करते हैं । हमारे मन मस्तिष्क में कई तरह के विचार निरंतर चलते रहते हैं। इन विचारों का रोज टूटना, फिर टूटकर जन्म लेना।  इन विचारों का अंधेरे में खो जाना । आज हर मनुष्य के अंदर जो नए-नए विचार उत्पन्न होते हैं । टूटते हैं। बनते हैं । इन्हीं विचारों के बीच कहीं न कहीं आशा की रोशनी आंखों में छलक पड़ती है। कवि, विचारों के टूटने-  बनने के इस भंवर से निकलने की भी बात कहते हैं। 

     आगे की पंक्तियों में कवि कहते हैं कि लगातार जारी इस बहस में /आजाद कब हो जाओगे, भाई ! / इस विफल यात्रा की झूठ को ढोता थक गया हूं। कवि मनुष्य के जीवन का विश्लेषण कर प्रश्न खड़ा करते है। कविता की पंक्तियां  मनुष्य के भागमभाग भरी जिंदगी से आजादी की मांग करती हैं।  आजादी का संदर्भ जीवन से मुक्ति का है। जीवन एक यात्रा के समान है। यह यात्रा अनंत काल से चली आ रही है । यह जीवन की यात्रा अनंत काल तक चलती रहेगी। क्या इस यात्रा का कोई अंत है ? जीवन से मुक्ति ही इसका किनारा है। आगे कवि कहते हैं कि मनुष्य इस विफल  यात्रा की झूठ को ढोता थक गया है।  आगे की पंक्तियों में  कवि के स्वर बहुत ही विद्रोही रूप में नजर आते हैं । आओ ! हम अपने को नंगा कर / स्वतंत्र हो जाएं। कवि इन पंक्तियों में यह बताने की कोशिश की है कि स्वंय को नंगा कर स्वतंत्र हो जाएं। अर्थात मैं जैसा अंदर हूं। वैसा बाहर भी रहूं । मेरे अंदर का जो स्वरूप है, बाहर भी वही  प्रकट हो । अंदर - बाहर के भेद  से मुक्त हो जाने की बात कवि कहते हैं।  अंदर - बाहर के भेद से मुक्ति, मनुष्य की बड़ी जीत है। यही मनुष्य की स्वतंत्रता है।

      आगे कवि कहते हैं कि यात्राओं के बीच/ हमारी अस्मिता का सुंदर रूप हो /लय हो । जीवन की यात्रा  एक न एक दिन समाप्त होना ही है।  इसलिए हमारे अस्मिता का जीवन  सुंदर हो। कविता अंतिम तीन पंक्तियों में पुनःलोगों से यह निवेदन करती है कि  टहनियां सूख जाएंगी/ हमारे होने का अर्थ मिट जाएगा /कविता फिर भी मुस्कुराएगी । भारत यायावर की पंक्तियां जीवन के मर्म को छूती है। जीवन का  बताती हैं।


विजय केसरी

(कथाकार / स्तंभकार),

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301,

मोबाइल नंबर - 9347 99550,

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