गुरुवार, 28 जनवरी 2021

समाज का असली रेट- कॉरपोरेट / आलोक तोमर

 प्रतिदिन/आलोक तोमर / समाज का असली रेट- कॉरपोरेट

वे बोर्ड रुम की बैठकों में ड्रेस कोड का पूरा पालन करते हैं। पानी पीने के बाद भी एक्सक्यूज मी कहते हैं, प्रोजेक्टर से पेश की गई स्लाइडों पर रची गई व्यापारिक रणनीति को बहुत धर्म ईमान से दर्ज करते हैं। गाड़ी में बैठ कर तब तक इंतजार करते हैं जब तक ड्राइवर पिछला दरवाजा नहीं खोल देता तब तक उतरने की कोशिश नहीं करते। कई मोबाइल रखते हैं और ब्लैकबेरी पर चैट में व्यस्त रहते है। शाम को थोडे ऌन्फॉमर्ल्स यानी टी शर्ट वगैरह पहन कर क्लबों में जाते हैं और गोल्फ क्लब और जिमखाना क्लब के सदस्य बनने की कोशिश करते हैं। कॉरपोरेट जगत की अविश्वसनीय दुनिया में आपका स्वागत है। 

सबसे पहले तो जरा व्याकरण की बात हो जाए। कॉरपोरेट शब्द बना है कॉरपोरेशन से और कॉरपोरेशन का मतलब शब्दकोष में वह कानूनी संज्ञा होता है जो स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकती है। कुल मिला कर कॉरपोरेट एक व्यावसायिक संगठन का नाम होता है और भारत में जहां कारोबार भले ही चावड़ी या सदर बाजार से चलता हो मगर उसके बारे में बातचीत इसी पांच सितारा होटल के काफी शॉप में होती है और इसे ही कॉरपोरेट संस्कृति कहा जाता है। 

कमाने को देश के बड़े शहरों के पुराने इलाकों में बही खाते ले कर बैठे लोग ज्यादा कमाते होंगे लेकिन उन्हें साइकिल पर निकलने में भी शर्म नहीं आती। मगर अपने देश का जो आधुनिक कॉरपोरेट जगत है उसका सिर्फ एंटरटेनमेंट यानी पार्टीबाजी का सालाना औसत खर्चा सौ करोड़ रुपए से ऊपर है। रिजर्व बैंक के खातों में दर्ज है कि दस लाख रुपए तक की खर्च सीमा के कॉरपोरेट क्रेडिट कार्ड ही लगभग पंद्रह लाख के आंकड़ों में दर्ज हैं। इन्हें भी अचानक जहाज पकड़ने और होटलों के खर्चे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 

ईस्ट इंडिया कंपनी शायद भारत में आने वाली पहली कॉरपोरेट थी। इसी के अफसरों ने आज के बड़े बड़े क्लबों, पोलो गोल्फ और रेसिंग की शुरूआत की। वह चार्टर जहाजों का जमाना नहीं था इसलिए वे लोग चार्टर कारों में चलते थे। ये चार्टर कार इसलिए कहा गया क्योंकि उस जमाने में सड़क पर आई कार को लोग इतने कौतुक से देखते थे जितने कौतुक से आपके आंगन में उतर आए हैलीकॉप्टर को भी नहीं देखेंगे। 

कॉरपोरेट संस्कृति भारत में अब पूरे शवाब पर है। इसके कई लक्षण और कई चेहरे है। एक चेहरा तो वेंटले, बीएमडब्लयू और मर्सडीज कारों वाला हैं। दुनिया की सबसे बेजोड़ रॉल्स रॉयस कार में कॉरपोरेट मसीहा नहीं चलते। वह ज्यादा तेज नहीं भागती और कॉरपोरेट संस्कृति में एक एक मिनट का निवेश किया जाता है। दूसरा चेहरा जनसंपर्क एंजेसियों के नाम पर जुगाड़ करने वाली एजेंसियों का है जिनमें कई के नाम सामने आ जाते हैं और कई के नहीं आते। जिनके नहीं आते वे असल में ज्यादा बड़े सौदे कर रही होती है। 

कॉरपोरेट दुनिया की बात करने में कई संकोच के विषय भी है। जिस देश में गरीबी की सीमा रेखा के नीचे लगभग आधी आबादी रहती हो, वहां आईआईटी और आईआईएम से निकले नए चमकदार चेहरों को तीन चार लाख रुपए और ज्यादा भी, के औसत से सिर्फ वेतन मिलता है। एक इंसेटिव नाम की चीज का अविष्कार भी हो गया है जिसका मतलब है कि जितना धंधा करवाओगे उतनी ही मौज करोगे। कॉरपोरेट की रणनीति बैठके कम से कम गोवा या मैसूर में होती है। ये वे कंपनियां होती हैं जो अभी कॉरपोरेट बनने के पहले या दूसरे पायदान पर खड़ी होती है। वरना तो बैठके सिंगापुर में या लंदन में होती है और भारत की एक कंपनी को मेडागास्कर के समुद्र में क्रूज किराए पर ले कर अपने एगजीक्यूटिव लोगों को चार्टर जहाजों से ले जाने की आदत है। 

अपनी अपनी अदाएं हैं। आजकल सरकारें भी कॉरपोरेट होने लगी है। ई गर्वनेंस का जमाना तो खैर अब आया है मगर राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने आपको सीईओ यानी चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर कहलवाना बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। आज के जमाने में भी तीन चार मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो अपने आपको सीईओ मानते हैं और जब भूल जाते हैं तो उनके आसपास के अफसर उन्हें याद दिला देते हैं कि सर, जनता ने भले ही चुना हो मगर आप सीईओ हैं। 

सच बात तो यह है कि लोकसेवा और कारोबारी कॉरपोरेट संस्कृति की दूरी लगातार कम होती जा रही है। लोकसेवा का मतलब यहां खादी का कुर्ता पाजामा पहन कर गांव गांव जा कर जनजागरण करना नहीं है बल्कि भारत में प्रशासनिक सेवाओं को चुनने वाले संगठन का नाम भी लोकसेवा आयोग है। इस आयोग से जो अफसर चुने जाते हैं उन्हें भी आजकल विदेशी कंपनियों में कॉरपोरेट प्रशिक्षण दिया जाता है और हर साल कम से कम बीस पच्चीस काबिल आईएएस अधिकारी मल्टीनेशनल कंपनियाें में चले जाते हैं। 

कुछ अफसर जनता की सेवा मल्टीनेशनल शैली में करते हैं यानी वे एनजीओ नाम की उन दुकानों में से एक में काम करते है जिन्हें विदेशी मुद्रा में रकम मिलती है। यह दूसरे ढंग की कॉरपोरेट संस्कृति हैं जहां देहाती कपडे ही असली कॉरपोरेट पोशाक है और उसी की मार्केट होती है। अमेरिका और स्विट्जरलैंड जाने वाले जहाजों के एग्जीक्यूटिव क्लास में आपको आम तौर पर ऐसे ही खादी भंडार के कुर्ते और सदरी पहने हुए लोग मिल जाएंगे जो बड़े प्रेम से प्लेब्वॉय पढ़ रहे होंगे। 

एक पूरा समाज है जो कॉरपोरेट संस्कृति के आस पास घूमता है। इस समाज में पत्रकार भी शामिल हैं, नेता भी शामिल हैं, अफसर भी शामिल हैं, सामाजिक संगठनों के ताकतवर प्रवक्ता भी शामिल है। हर वह व्यक्ति शामिल हैं जो देश की नीतियों और उनके पालन पर कोई असर डाल सकता है। इन पर अलग अलग शैलियों में उपकार किए जाते हैं और उपकारों को उपहार की पैकिंग में सौंपा जाता है। 

कुछ दिन पहले गृह मंत्रालय के एक अच्छे खासे आईएएस अधिकारी कंपनियों को सरकारी नीतियां एडवांस में बताने के लिए धर लिए गए। उनका सारा कारोबार पांच सितारा होटलाेंं होता था और कॉरपोरेट जासूसी और कॉरपोरेट लॉबी प्रथा भी अब जोर शोर से चलन में आ चुकी है। निर्वाचित सदनों में सरकार तक अपनी बात पहुंचाने या किसी और पर हो रहे उपकार को रूकवाने के लिए कई माननीय जन प्रतिनिधि उपलब्ध हैं और इस उपलब्धि की भी कोई कीमत होती होगी। अक्सर पत्रकार मित्रों के जत्थे किन्हीं सुदूर और गुमनाम देशों के लिए निकल जाते हैं और मोटे उपहार ले कर लौटते हैं। कस्टम वगैरह का ध्यान कॉरपोरेट के प्यांदे रख लेते हैं। 

कॉरपोरेट कभी संज्ञा हुआ करता था, अब विशेषण बन गया है और जल्दी ही व्यवसाय और आजीविका का एक अनिवार्य शब्द बन जाने वाला है। पूरी दुनिया में कॉरपोरेट संस्कृति जिस तरह से बदल रही है, हमारे यहां भी मल्टीनेशनल कंपनियों के आने के बाद पांच सितारा होटलों और एयरलाइनों का कारोबार बढ़ता जा रहा है। यह दलाली की एक अभिजात शैली है और इसमें और उसमें इतना ही फर्क हैं जितना सेक्स वर्कर होने या एस्कॉर्ट होने में होता है। फिर भी बच कर कहां जाएंगे। कॉरपोरेट आपको चारो तरफ से घेर रहा है। बिजली का बिल चुकाने के लिए जो फोन आते हैं और घर पर चेक लेने लोग आते हैं और बैंकों के प्रतिनिधि आपका खाता खोलने आपके घर या कार्यालय चले आते हैं, यह भी उसी संस्कृति का एक और चेहरा है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें