शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

महात्मा गांधी की हत्या बिड़ला हाउस में 30 जनवरी / विवेक शुक्ला

30 जनवरी : 


1948 को शाम 5.17 बजे हुई। तब से लेकर उनकी अगले दिन अंत्येष्टि तक पांच लोग बहुत गहरे से जुड़े रहे थे। ये लगभग अनाम ही रहे। इनकी कोई खास चर्चा भी नहीं होती। पर इनका जिक्र बगैर गांधी जी की हत्या और अंतिम संस्कार के पलों को समझना आसान नहीं होगा। इन सबकी हम बात करेंगे।   

 

के.डी.मदान

वे हैं हादसे के आखिरी चश्मदीद

 

के.डी.मदान आजकल अपने वसंत विहार के घर के बाहर धूप सेकते हुए उन पलों को याद करना नहीं भूलते जब महात्मा गांधी को नाथूराम गोडसे ने गोलियों से छलनी किया था। अब 95 साल के हो गए मदान साहब गांधी जी के ठीक पीछे बैठकर उनकी प्रार्थना सभा की रिकार्डिंग कर रहे थे। वे अन्य दिनों की तरह उस मनहूस दिन भी साढ़े चार बजे तक बिड़ला हाउस में आ गए थे। अब वे उस भयानक हादसे के एकमात्र चशमदीद गवाह हमारे बीच में हैं। 

दरअसल वे आकाशवाणी के लिए काम करते थे और बापू की प्रार्थना सभा को रिकार्ड किया करते थे। उसे रात के साढ़े आठ बजे प्रसारित किया जाता था। मदान साहब कहते हैं कि बापू की प्रार्थना सभा रोज शाम 5 बजे शुरू हो जाया करती थी। उस दिन बिड़ला हाउस में बापू से मिलने देश के उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल आए हुए थे। दोनों के बीच बातचीत चल रही थी। वो खींचती ही जा रही थी। बापू सरदार पटेल से लगभग 5.12 बजे विदा लेकर प्रार्थना सभा स्थल की तरफ बढ़े। उनके साथ आभा और मनू भी थीं। जब गांधी जी प्रार्थना सभा स्थल पहुंचे तब वक्त था 5.16 बजे । 

हालांकि ये कहा जाता है कि 5.17 बजे उन पर गोली चली। मदान कहते हैं, “ जब पहली गोली चली तो उन्हें लगा कि कोई पटाखा चला है। तब ही दूसरी गोली चली। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते तभी तीसरी गोली भी चली।” उन्होंने अपनी आंखों से देखा था नाथूराम गोडसे को गोली चलाते हुए। मदान नफरत करते हैं गोडसे से। वे उसके बारे में बात करने से बचते हैं। उसका नाम नहीं लेते। खून से लथपथ बापू को बिड़ला हाउस के भीतर लोग लेकर जाते हैं। वहां पर भगदड़ मच जाती है। महिलाएं और बच्चे बापू के शरीर से निकलते खून को देखकर चीखते हैं। उस मंजर को बय़ान करते हुए मदान साहब रूमाल से अपनी भीगी आंखों को पोंछते हैं। 

बापू को गोली लगने के दस मिनट के भीतर डा.डी.पी.भार्गव भी वहां आ जाते हैं। वे बापू को मृत घोषित कर देते हैं।

चूंकि मदान साहब रोज प्रार्थना सभा को रिकार्ड करने के लिए आते थे और बापू के पीछे ही बैठते थे तो बापू उन्हें अच्छी तरह से पहचानने लगे थे। बापू उन्हें ‘रेडियो बाबू’ कहते थे। वे अगले दिन बापू की शव यात्रा में शामिल हुए थे। वे भूले नहीं हैं कि उस दिन राजधानी और इसके आसपास के गांवों के सैकड़ों शोकाकुल लोग अपना देसी घी लेकर श्मशान स्थल पर पहुंच गए थे। इनकी चाहत थी कि जो घी वे लेकर आए हैं, उसी से बापू की अंत्येष्टि हो जाए। ये सब बापू को अपना बिल्कुल अपना मानते थे। उन्होंने देखा था वो मंजर जब शव यात्रा के रूट पर बुजुर्ग भी बच्चों की तरह चीख-चीखकर रो रहे थे।  


नं दलाल मेहता

उनसे पूछकर लिखा गया था एफआईआर


दिल्ली की जान कनॉट प्लेस में कोरोना काल से पहले की गहमागहमी लौट रही है। लग रहा कि मानो दिल्ली कोरोना के भय से मुक्त हो चुकी है। इधर के एम- 96 के नीचे कुछ लोग खड़े हैं। पर किसी को मालूम नहीं कि इस एम-96 में कभी रहता था एक वह शख्स जिसकी गवाही के आधार पर दिल्ली पुलिस ने लिखी थी महात्मा गांधी हत्याकांड की एफआईआर रिपोर्ट। उस इंसान का नाम था नंदलाल मेहता। 

मेहता का संबंध दिल्ली में बस गए एक गुजराती परिवार से था। वह परिवार कनॉट प्लेस में ही रहता था। मेहता के पिता नत्था लाल मेहता कारोबारी थे। मेहता रोज गांधी जी की अलबुर्कर रोड ( अब तीस जनवरी मार्ग) स्थित बिड़ला हाउस में होने वाली प्रार्थना सभा में उपस्थित रहते थे। वह पैदल ही कनॉट प्लेस से पैदल बिड़ला हाउस आते-जाते थे। उस 30 जनवरी,1948 को राजधानी में सूरज नहीं निकला था। 

कोहरे और जाड़े के कारण सड़कों पर दिल्लीवाले ज्यादा नहीं निकले थे। पर मेहता पौने पांच बजे से कुछ पहले ही प्रार्थना सभा स्थल पर पहुंच गए थे। ये सब बातें हमें कुछ साल पहले मेहता की भांजी अवनी पारेख ने बताई थीं। खैर, उसके बाद जो वहां पर हुआ वह तो सबको मालूम ही है। बापू की हत्या के बाद पुलिस वहां पर मौजूद कई लोगों को तुगलक रोड पुलिस स्टेशन में ले गई। उनमें मेहता भी थे। उनसे चंद कदमों की दूरी पर बापू पर गोलियां बरसाई गई थीं। उनसे पूछकर रात को करीब दस बजे तुगलक रोड थाने के एएसआई डालू राम ने एफआईआर लिखी। उसका नंबर 48 था। “मैं प्रार्थना स्थल पर तिमारपुर के निवासी सरदार गुरुबचन सिंह और नरेन्द्र पैलेस, संसद मार्ग में रहने वाले ब्रज कृष्ण चांदीवाला के साथ बैठा था। वहां पर बिड़ला परिवार के कुछ सदस्य भी उपस्थित थे। जब गांधी जी प्रार्थना स्थल पर पहुंचे तो मैने देखा कि नाथूराम विनायक गोड़से ( मुझे जिसके नाम के बारे में बाद पता चला)

  वहां उपस्थित कई लोगों को धकेलते हुए गांधी जी के सामने बढ़ा। उसने उन पर दो-तीन फीट की दूरी से तीन गोलियां चलाईं। गोलियां लगने के बाद बापू के शरीर से खून बहने लगा। वे जमीन पर गिरते ही ‘राम-राम’ कहने लगे। इस बीच, हत्यारे को धर दबोचा गया और लोग बापू को बिड़ला हाउस लोग ले गए।”

 ये जानकारी मेहता ने पुलिस को दी। एफआईआर लिखे जाते वक्त 1941 में बने थाने में दिल्ली के इस्पेक्टर जनरल पुलिस डी.सजीवी, डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल पुलिस डी.डब्ल्यू मेहता वगैरह भी मौजूद थे। हालांकि डी.डब्ल्यू मेहता को उसदिन तेज बुखाऱ था। वे सुबह से ही चांदनी चौक इलाके में सफाई कर्मियों की हड़ताल को खत्म करवाने की कोशिश कर रहे थे। सफाई कर्मी किसी बात पर दिल्ली पुलिस से नाराज थे। एफआईआर उर्दू में लिखा गया था।जाहिर है, बापू की हत्या के बाद नंदलाल मेहता का बिड़ला हाउस जाना बंद हो गया। पर वे लगातार गांधी समाधि जाने लगे। वहां पर ही मेहता को मदान साहब, चांदीवाला जी जैसे कुछ गांधी जी के अनुयायी मिलते। नंदलाल मेहता की 1968 में मृत्यु हो गई थी।

----------------------

जसवंत सिंह

वे लेकर आए थे गोडसे को थाने

ईस्ट दिल्ली के पॉश विवेक विहार एरिया के चौधरी परिवार में गांधी जी की हत्या से जुड़े मसले पर बातें होना सामान्य बात है। देखा जाए तो ये  स्वाभाविक ही है। इस घर का गांधी जी के हत्याकांड से गहरा नाता रहा है। यहां पर रहते हैं गुरुदयाल सिंह। उनके पिता जसवंत सिंह ने नाथूराम गोडसे को बिड़ला हाउस में पकड़ा था। जसवंत सिंह तब संसद मार्ग थाने के डीएसपी थे। दिल्ली में आजकल की ही तरह से 30 जनवरी 1948 को भी हड्डिया गलाने वाला जाड़ा पड़ रहा था। दिन में एकाध बार ही सूरज देवता ने सांकेतिक रूप से दर्शन दिए थे। उधर, तुगलक रोड पुलिस थाने में इंस्पेक्टर दसौधा सिंह और  डीएसपी जसवंत सिंह कड़क चाय पी रहे थे। जसवंत सिंह इलाके के राउंड पर थे। वक्त रहा होगा शाम के करीब साढ़े चार बजे। उनके पास मूंगफलियां भी रखीं थीं। दोनों गुरुद्वारा  सीसगंज जाने के मूड में थे। पर तय हुआ कि पहले एक बार बिड़ला हाउस का  चक्कर लगा लिया जाए। थाने से निकलने से पहले दसौंधा सिंह थाने के अंदर बने अपने फ्लैट में दो मिनट में जाकर वापस आ गया। वक्त गुजरने के साथ ठंडा का प्रकोप बढ़ रहा था। अंधेरे की चादर में लिपट रही थी दिल्ली। तब ही दोनों ने तय किया कि अब उऩ्हें उठना चाहिए। दोनों एक जीप पर सवार होकर बिड़ला हाउस की तरफ रवाना हुए। तुगलक रोड थाने से बिड़ला हाउस के बीच की दूरी मुश्किल से पांच मिनट से भी कम की है। थाने से निकलते हुए उन्हें एएसआई डालू राम मिले। जसवंत सिंह ने  उनका हालचाल पूछा। डालू राम ने कहा- “साहब,सब बढ़िया है”। वह शाहपुर जट  में रहते थे । अब 5 बजे से ज्यादा का वक्त हो रहा था। दोनों 1941 में बने तुगलक रोड थाने से रवाना हो गए बिड़ला  हाउस की तरफ। वे अभी बिड़ला  हाउस से कुछ दूर रहे होंगे कि उन्हें गोली चलने की आवाज सुनाई दीं। दोनों के मन में भय के भाव तैरने लगे।

 दोनों करीब 5.22 मिनट पर बिड़ला  हाउस के गेट पर पहुंचे तो वहां पर कोलाहाल को वे महसूस कर सकते थे। वहां अफरा-तफरी का मंजर था। आवाजें आ रही थीं- ‘बापू को गोली मार दी’ और ‘ गांधी जी को गोली मार दी।’ बापू को गोली मारी गई थी 5.17 बजे।बिड़ला  हाउस के बगीचे में जहां पर गांधी जी की प्रार्थना सभा होती थी, वहां पर भीड़ ने एक शख्स को पकड़ा हुआ था। जसवंत सिंह ने तुरंत नाथूराम गोडसे को पकड़ा । अब तक तुगलक रोड थाने से और भी पुलिस कर्मी घटना स्थल पर पहुंच गए थे। जाड़े के बावजूद गोडसे पसीना-पसीना हो रहा था। वो निर्विकार भाव से सारे माहौल को देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई अपराध बोध के भाव नहीं थे। उसे कुछ देर के  बाद दसौधा सिंह और कुछ पुलिसवाले जसवंत सिंह के आदेश पर तुगलक रोड़ थाने में लेकर जा चुके थे। जसवंत सिंह पंजाब पुलिस के अफसर थे। उस दिनों पंजाब पुलिस के इंस्पेक्टर रैंक के अफसर डेपुटेशन पर दिल्ली आते थे। 

जसवंत सिंह 1946 में दिल्ली आए थे। वे कोतवाली और सब्जी मंडी थानों में भी रहे। ये दोनों दिल्ली के पुराने थाने माने जाते हैं। कोतवाली में भी दसौंधा सिंह साथ थे जसवंत सिंह के । वे 1951 तक दिल्ली में रहे। फिर उनका तबादला लुधियाना में हुआ। उनकी 1961 में करनाल में मृत्यु हो गई थी। उनके पुत्र के ड्राइंग रूम में उनकी फोटो अब भी लगी हुई है।

ब्रज कृष्ण चांदीवाला

उन्होंने करवाया था बापू को अंतिम स्नान


महात्मा गांधी 1918 में दिल्ली में आए तो सेंट स्टीफंस कॉलेज में ही रूके। वे सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल डा.सुशील कुमार रुद्रा के मेहमान थे। वे अपनी सन1915 की पहली दिल्ली यात्रा के समय भी इधर ही ठहरे थे। तब उनके साथ कस्तूबरा गांधी भी थीं। उस दौर में  सेंट स्टीफंस कॉलेज कश्मीरी गेट में हुआ करता था। वहां उनसे कॉलेज के छात्र मिलने आ रहे थे। उनमें ब्रज कृष्ण चांदीवाला भी थे। वह पहली ही मुलाकात के बाद बापू के जीवनपर्यंत के लिए शिष्य बन गए। अगर कभी बापू के पांच सबसे निकट के शिष्यों का जिक्र होगा तो ब्रज कृष्ण चांदीवाला का नाम अवश्य शामिल किया जाएगा। वे दिल्ली के धनी व्यापारी परिवार से संबंध रखते थे। उनके परिवार का चांदी का कारोबार था। 

ब्रज कृष्ण जी बापू के विचारों और व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि वे भी स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने खादी के वस्त्र पहनने चालू कर दिए। जब बापू दिल्ली आते तो ब्रज कृष्ण चांदीवाला ही उनके लिए बकरी के दूध की व्यवस्था करने लगे। गांधी जी के सहयोगी डा. एम.ए.अंसारी तो उन्हें ‘गांधी जी का ग्वाला’ ही प्रेम से कहकर बुलाते थे। बापू  ब्रज कृष्ण जी को पुत्रवत और वे बापू को पितातुल्य ही मानते थे। गांधी जी की मृत्यु के बाद ब्रज कृष्ण चांदीवाला ने ही उन्हें 31 जनवरी 1948 की रात को दो बजे स्नान करवाया था। ये जानकारी लुई फिशर ने बापू की जीवनी ‘दि लाइफ आफ महात्मा’ में दी है। इसे बापू पर लिखीगई सर्वश्रेष्ठ जीवनी माना जाता है। ब्रजकृष्ण चांदीवाला ने अपनी किताब ‘एट दि फीट आफ बापू’ में उन कठोर पलों  पर लिखा है जब वे बापू के बेजाने शरी को स्नान करवा रहे थे। “ रात के दो बज रहे थे और हमें बापू को अंतिम बार स्नान करवाना था। मेरे साथ हरिराम ( बिड़ला हाउस के मुलाजिम ) थे। मैं उस कड़ाके की सर्दी में उन्हें ठंडे पानी से नहलाने लगा तो मेरे हाथ थम गए।बापू हमेशा गुनगुने पानी से ही स्नान करते थे। वहां पर गांधी जी के पुत्र देवदास गांधी भी खड़े थे।” 

इससे पहले बापू के पार्थिव शरीर के पास रात भर ब्रज कृष्ण चांदीवाला, मनु और आभा बैठकर गीता पाठ करते रहे। वहां पर सर्वधर्म प्रार्थना भी हो रही थी। आभा मूल रूप से बंगाली थीं। उनका विवाह गांधी जी के पौत्र कनु से हुआ था। आभा गांधी की प्रार्थना सभाओं में भजन गाती थीं। वह और मनू नोआखाली में भी गांधी जी के साथ गई थीं। गोडसे ने जब बापू को गोली मारी,  तब वहां आभा और चांदीवाला भी मौजूद थीं। मनु को गांधी अपनी पौत्री कहते थे। वह बहुत छोटी उम्र में गांधी के पास चली आई थीं। वे गांधी जी की रिश्तेदार थीं। आभा और मनू ने कस्तूरबा गांधी की भी बहुत मन से सेवा की थी। दरअसल चांदीवाला, आभा, मनू, राजकुमारी अमृत कौर ( भारत को एम्स देने वाली) और डा. सुशीला नैयर गांधी के अति प्रिय शिष्यों में थे। बापू की मृत्यु के बाद ब्रज कृष्ण चांदीवाला राष्ट्र निर्माण में लग गए। उन्होंने अपनी मां जानकी देवी जी के नाम पर जानकीदेवी कॉलेज भी स्थापित किया। भारत सरकार ने उन्हें जीवन भर समाज सेवा के लिए 1963 में पदमश्री सम्मान दिया। उनके परिवार ने ही निर्माण किया था उत्तर दिल्ली के बनारसी दास एस्टेट का।

 

मेलविल डिमेलो

उन्होंने सुनाया था अंतिम यात्रा का आंखों देखा हाल


पंडित जवाहरलाल नेहरु ने आकाशवाणी से रात 8 बजे देश-दुनिया को रुधे गले से महात्मा गांधी के संसार से चले जाने का समाचार दिया। उसके फौरन बाद 35 साल के एंग्लो इंडियन नौजवान मेलविल डिमेलो ने अंग्रेजी के समाचार बुलेटिन में विस्तार से महात्मा गांधी की हत्या संबंधी खबर सुनाई। वे अपना बुलेटिन पढ़ने के बाद जब अपने विभाग में पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि उन्हें कल बापू की महाप्रयाण यात्रा का आंखों देखा हाल सुनाना है। आकाशवाणी पहली बार किसी शख्यिसत की अंतिम यात्रा की कमेंट्री का प्रसारण कर रही थी।

 डिमेलो तैयार हो गए। वे रात को ड्यटी खत्म करने के बाद अपने सिविल लाइँस के एक्सचेंज स्टोर स्थित घर पहुंचे। रात भर कमेंट्री की तैयारी की और सुबह छह बजे ही बिड़ला हाउस पहुंच गए। दिल्ली में तब तक अंधेरा छटा नहीं था। उन्होंने एक जगह लिखा- “ मैं सुबह छह बजे बापू के अंतिमं दर्शन करने के लिए बिड़ला हाउस पहुंचा। वहां पर शोकाकुल लोगों की भीड़ पहले से मौजूद थी। सिसकियों की आवाजें आ रही थीं। मैंने बापू के पार्थिव शरीर के दर्शन किए। उस पर गोलियों के निशान साफ नजर आ रहे थे। वहां पर अगरबतियां जल रही थीं।” इसके बाद, डि मेलो साहब अपने साथियों के साथ कमेंट्री की तैयारी में लग गए। तब तक बिड़ला हाउस के आसपास हजारों लोग एकत्र हो चुके थे।

 बापू की अंतिम यात्रा सुबह लगभग साढ़े ग्यारह बजे राजघाट के लिए निकली। इसके साथ ही शुरू हो गया आंखों देखा हाल। उस शवयात्रा का आंखों देखा हाल जयपुर में जसदेव सिंह नाम का एक नौजवान भी सुन रहा था। उसने उस दिन तय कर लिया था कि वह भी रेडियो में कमेंट्री के पेशे से जुड़ेगा। वह हुआ भी भी। जसदेव सिंह बताते थे कि मेलविल डिमेलो ने लगातार सात घंटे तक कमेंट्री सुनाई। उन्होंने सारे माहौल को अपने शब्दों से जीवंत कर दिया था। उनकी जुबान में सरस्वती थी। उस भावपूर्ण कमेंट्री को करोड़ों हिन्दुस्तानी रोए थे। “ शवयात्रा के सारे रास्ते पर मुंड ही मुंड दिखाई दे रहे थे। लोग पेड़ों पर चढ़कर भी बापू के अंतिम दर्शन कर रहे थे। सैकड़ों लोगों ने गांधी जी की मौत के गम में अपने सिर मुंडवा लिए थे। शवयात्रा बिड़ला हाऊस से जनपथ, इंडिया गेट और आईटीओ होते हुए 4.25 राजघाट पहुंची। शववाहन पर पंडित नेहरु, सरदार पटेल और गांधी जी के दो पुत्र रामदास और देवदास भी बैठे थे।  ” 

मेलविल डिमेलो ने ही बताया था कि गांधी जी की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए पहले से राजघाट पर लार्ड माउंटबेटन, उनकी पत्नी पामेला माउँटबेटन, भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर इन –चीफ राय बाउचर वगैरह मौजूद थे।  बापू के पुत्रों ने पिता को मुखाग्नि दी थी। तब राजघाट पर कोई रो रहा था, तो किसी की आंखें नम थीं। राजघाट बार-बार बापू अमर रहे के नारों से गूंजने लगता था। बेशक बापू की शवयात्रा की कमेंट्री करने के बाद सारा देश मेलविल डिमेलों के नाम से वाकिफ हो गया था। वे बाद के वषों में लगातार गणतंत्र दिवस परेड की भी कमेट्री करते थे। मसूरी के सेंट जॉर्ज कॉलेज के छात्र रहे मेलविल डिमेलो 1972 में आकाशवाणी से रिटायर होने के बाद भी इससे लंबे समय तक किसी ना किसी रूप में जुड़े रहे। उनके अंतिम वर्ष कालकाजी एक्सटेंशन के 121 नंबर के घर में गुजरे। वहां पर उन्होंने अपना घर बना लिया था। उनकी 1991 में मृत्यु के बाद उनकी पत्नी आस्ट्रेलिया शिफ्ट हो गई थीं।  

 

 Vivek Shukla 

यह लेख 24 जनवरी 2021 को नव भारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें