गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

बापू का अंतिम जन्मदिवस

 बापू का अंतिम जन्म दिन/ विवेक  शुक्ला 

उस दिन भोर छंटने के साथ ही 5, अलबुर्कर रोड ( अब तीस जनवरी मार्ग) पर महात्मा गांधी से मिलने के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृहमंत्री सरदार पटेल, बाकी गणमान्य हस्तियां और दिल्ली आने लगी थी।


  ये सब बापू को उनके 78 वें जन्म दिन पर बधाई देने के लिए आ रहे थे।  तब दिल्ली  में सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। इन्सानियत मर रही थी। शऱणार्थियों के पुनर्वास का मसला भी गहरा रहा था। इन सब कारणों के चलते बापू निराशा में डूबे हुए थे। पर बिड़ला हाउस में उत्साह का माहौल था।


बापू ने तय कर लिया था कि वे  अपने जन्मदिन पर उपवास, प्रार्थना और चरखा कातेंगे। बापू के चौथे पुत्र देवदास गांधी,जो कनॉट प्लेस में ही रहते थे, वे भी सपरिवार बिड़ला हाउस में थे। बापू ने उन्हें कुछ देर के बाद वहां से विदा कर दिया था। 


बापू के कमरे को मीराबेन ने सजा दिया था। उन्होंने कमरे में ‘हे राम’  ‘ॐ’ और क्रास के पोस्टर टांग दिये थे। मीरा बेन एक ब्रिटिश महिला थीं। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में  बापू के सिद्धांतों से प्रभावित होकर खादी का प्रचार किया था। उसके बाद वहां पर गांधी जी का प्रिय भजन  “वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे...” बजने लगा था।


उधर, चिराग दिल्ली में मास्टर रोशन लाल गौड़, चौधरी दिल्ली सिंह बादल और शाहपुर जट में चौधरी दिलीप सिंह,जो बाद में बाहरी दिल्ली से कांग्रेस के सांसद भी रहे, वगैरह  अपने-अपने क्षेत्रों में कांग्रेसियों के साथ बापू का जन्म दिन चरखा कात कर मना रहे थे। 


इनके कार्यक्रमों में जनभागेधारी खासी थीं। दिल्ली के गांवों वाले बापू को पूज्नीय मानते रहे हैं। अब भी आपको अनेक घरों  में बापू के चित्र लगे मिल जाएंगे। उनकी मृत्यु पर हजारों गांव वाले देसी घी लेकर  राजघाट पहुंच गए थे अंत्येष्टि के लिए। सैकड़ों ने सिर मुंडवा लिए थे।


लेडी माउंटबेटन भी बापू को बधाई देकर निकल गईं।  वहां बापू की निजी चिकित्सक डा. सुशीला नैयर उनके स्वास्थ्य पर भी नजर रख रही थीं। बापू की तबीयत कतई सही नहीं चल रही थी। वे अंदर से टूटे हुए थे।


 सरदार पटेल से बातचीत के दौरान तो उनका सारा दर्द सामने आ गया था। उन्होंने कहा था- “ मैंने आखिर मैंने कौन सा अपराध कर दिया कि मुझे ये दिन देखना पड़ा रहा है ?” 


सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन ने अपनी डायरी में लिखा था कि वे तो बापू से बड़े उत्साह के साथ मिलने गए थे पर लौटे भारी मन के साथ। यानी बापू  अपना जन्म दिन घोर निराशा और अवसाद के वातावरण में मना रहे थे। बापू ने अपनी प्रार्थना सभा में भी कहा “मेरे लिए तो आज  मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक जिंदा पड़ा हूं, इस पर मुझे खुद आश्चर्य होता है, शर्म लगती है। मैं वही शख्स हूं कि जिसकी जबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो तो करोड़ों उसे मानते थे। आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। “


बिड़ला हाउस की गतिविधियों से दूर चांदनी चौक में ब्रज कृष्ण चांदीवाला, मीर मुश्ताक अहमद,लाला रूपनारायण और युद्धवीर सिंह ( दिल्ली की पहली कैबिनेट में थे) जैसे कांग्रेसी उनके जन्म दिन पर  सांप्रदायिक सौहार्द के लिए प्रभात फेरियां निकाल रहे थे। कोतवाली और दरियागंज में चरखा कताई के कार्यक्रम भी चल रहे थे। सिंह के नाम पर आई एस बी टी के पास एक सड़क भी है । मीर साहब आगे चलकर  दिल्ली के  मुख्य कार्यकारी पार्षद भी रहे।


खैर ,शाम होते-होते हजारों लोग बापू से मिलने आ चुके थे। उन्हें असंख्य जन्म दिन की शुभकमानाएं देने वाले टेलीग्राम भी मिले थे। आकाशवाणी ने उन पर एक कार्यक्रम तैयार किया था।


 पर बापू को तो विपरित स्थितियों ने निराश किया हुआ था। वे उस कार्यक्रम को बिना सुने ही जल्दी सो गए। 


1 अक्टूबर 2020

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