शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

रवि अरोड़ा की नजर से

 हत्या की परतें / रवि अरोड़ा

स्कल-कालेज के दिनो में गाँव-देहात के सहपाठी जातीय वैमनस्य के अनेक मुहावरे, लोकोक्तियाँ और कवित्त सुनाते थे । उनमे से कई इतने घातक थे कि आज तक स्मृतियों में जगह घेरे बैठे हैं । उन्ही में से एक लोकोक्ति थी कि बकरी का दूध और दलित महिला की अस्मत का क्या है, जब चाहे लूट लो । मुआफ़ कीजिएगा इस लोकोक्ति के शब्द मैंने शालीन कर दिये हैं क्योंकि उसके असली शब्द तो दोहराये ही नहीं जा सकते । हालाँकि इससे मिलते-जुलते मुहावरे आज भी सुनने को मिल जाते हैं । भाव उनका भी वही होता है कि दलित की हर शय पर आपका हक़ है , चाहे वह उसकी अस्मत ही क्यों न हो । अपने खेत से चारा अथवा साग लेने आई दलित महिला पर ऊँची जाति का दबंग काश्तकार आज भी अपना हक़ समझता है । हाथरस की दलित किशोरी भी ऊँची जाति के काश्तकार के खेत में चारा लेने गई थी, जब उसके साथ दरिंदगी हुई । यक़ीन मानिये केवल बलात्कार ही हुआ होता तो शायद यह मामला कभी प्रकाश में ही नहीं आता । हमारे गाँव-देहातों की यही असलियत है । किसी भी ख़ास जाति के गाँव में रिआया के तौर पर बसाये गये कामगार और दलित ही वहाँ असली अल्पसंख्यक होते हैं और उनकी कोई आवाज़ ही नहीं होती । अपने इस दुर्भाग्य को दलितों और कामगारों ने स्वीकार भी कर लिया है और शायद यही वजह है कि अनहोनी के डर से वे सवर्णों के मुक़ाबले अपनी बच्चियों की शादी जल्द कर देते हैं । किसी भी आशंका को टालने को इनकी बेटियाँ आमतौर पर स्कूल भी नहीं भेजी जातीं मगर क्या करें , पेट पालने को कभी तो घर से निकलना ही पड़ता है और बाहर निकलो तो दरिंदे ताक में रहते ही हैं । 


किताबी और ढकोसले भरी बातों से इतर वास्तविकता देखें तो साफ़ है कि शासन-प्रशासन व थाना-कचहरी सब जगह कथित छोटी जातियों के लोग ही बेआवाज़ हैं । शायद यही वजह है कि हाथरस कांड मे पुलिस आराम से धीरे धीरे किश्तों में रिपोर्ट लिखती है और किश्तों में ही गिरफ्तरियाँ की जाती हैं । पीड़ित वाल्मीकि परिवार का कोई वली-वारिस नहीं था शायद यही वजह रही होगी कि परिजनों के विरोध के बावजूद पुलिस-प्रशासन रात के अंधेरे में ज़बरन किशोरी का अंतिम संस्कार कराने की हिम्मत कर सका । गाँव के एक बुज़ुर्ग की छाती में लात डीएम नहीं जातीय अहंकार ने ही मारी थी । आसपास के जिन बारह गाँवों के सवर्ण आरोपियों के पक्ष में जो पंचायत कर रहे हैं वह न्याय के लिये नहीं वरन अपने जातीय वर्चस्व के लिये ही है । भाजपा का पूर्व विधायक राजवीर सिंह पहलवान यदि बलात्कारियों के समर्थन में ख़म ठोक रहा है तो उसकी वजह भी यही है कि वह जानता है पीड़ित परिवार की कोई हैसियत नहीं है और उसे चुनाव ये ऊँची जाति वाले ही लड़ायेंगे । चंदपा क्षेत्र के इस गाँव की नाकेबंदी और मीडिया व विपक्षी नेताओं की आवाजाही पर रोक यूँ तो डैमेज कंट्रोल की गरज से लगाई गई लगती है मगर यह संभव भी इसी वजह से हो सका है कि सचमुच पीड़ित परिवार का कोई वजूद नहीं है । न राजनीतिक, न आर्थिक और न ही सामाजिक । 


कई बार लगता है कि नीची कही जाने वाली जातियों ने भी शायद अपने शोषण को हरि इच्छा के रूप में स्वीकार कर लिया है । कम से कम गाँवों में तो ऐसा ही दिखाई पड़ रहा है । मुल्क की हवाओं में ही ऐसा जहर है कि एहसास ए कमतरी के शिकार ये लोग गाँवों में ऊँची जाति वाले के साथ एक चारपाई पर बैठने से कतराते हैं तो शहरों में भी एक ही थाली में खाने में हिचकते हैं । पढ़े-लिखे लोगों के घरों में भी बाथरूम साफ़ करने वालों के चाय-पानी के बर्तन रसोई में नहीं वरन आँगन में दिखाई पड़ते हैं । यक़ीनन हाथरस कांड का पाप योगी सरकार के मत्थे है । उसे इस ख़ौफ़नाक अपराध से क़तई बरी नहीं किया जा सकता। ग़लती हमारी भी है जो हम लोग वैरागियों से आस-औलाद वालों जैसी संवेदनशीलता की उम्मीद कर रहे हैं। मगर एक सच यह भी है कि इस जघन्य अपराध से बरी मैं और आप भी नहीं हैं । सही मायनों में हममें से हर वह व्यक्ति इस किशोरी की निर्मम हत्या का दोषी है जो इस नारकीय जातिगत व्यवस्था का किसी भी रूप में हिमायती है ।

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