शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

डॉ रामजीलाल जांगिड़ का सफरनामा / विद्युत् मौर्या



एक यात्रा जन संचार की राह पर

भारतीय जनसंचार  संस्थान  (iimc)  में हिंदी ke सबसे बड़े समर्थक औऱ आवाज़ रहे डॉ.  रामजीलाल जांगिड़ का मोहक संस्मरण. हमें गर्व है की डॉ  जांगिड़ मेरे गुरु रहे है . Iimc  में हिंदी पत्रकारिता (PG) डिप्लोमा के पहले बैच का छात्र होने का अलग सुख गौरव औऱ सम्मान  है.  डॉ  साहब के इस सफर को सम्मान के साथ पेश  है.
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कल गुरु पूर्णिमा थी। रविवार, विक्रमी सवंत 2077 के आषाढ़ मास की पूर्णिमा। पंद्रह हजार वर्षों से भी पहले शिव ने गुरु पूर्णिमा के दिन सात ऋषियों को शिष्य बनाया था और उन्हें योग विज्ञान की शिक्षा दी थी। 2600 साल पहले गुरु पूर्णिमा के दिन गौतम बुद्ध ने वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के पास सारनाथ में 5 भिक्षुओं को पहला उपदेश दिया था। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने गुरु पूर्णिमा इंद्र भुति गौतम को पहला शिष्य बनाया था।
 इसलिए राजस्थान के राजभवन में प्रवेश की कहानी सुनाने के पहले यह बताना ठीक रहेगा कि मैं पत्रकारिता का गुरु कैसे बना ? 26 जून 1979 को 'हिन्दुस्तान' (हिन्दी दैनिक), नई दिल्ली में भारत सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत 1965 में स्थापित भारतीय जन संचार संस्थान का 4 पदों के लिए विज्ञापन छपा। इनमें से दूसरा पद था - भाषा पत्रकारिता में रीडर (हिन्दी)। इसके लिए दो अनिवार्य योग्यताएं थी और दो वांछित योग्यताएं। पहली अनिवार्य योग्यता थी - किसी विश्वविद्यालय की मास्टर्स डिग्री। मेरे पास एम•ए• और पी•एच•डी• दो डिग्रिया थी। दूसरी अनिवार्य योग्यता थी - हिन्दी पत्रकारिता में दस वर्षों का अनुभव। मेरे पास 20 वर्षों का अनुभव था। 12 वर्षों का 'हिन्दुस्तान' (हिन्दी दैनिक) में काम करने का और 8 वर्षों तक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में। इस प्रकार था - अनिवार्य योग्यता की दूसरी शर्त से दुगना अनुभव। पहली वांछित योग्यता थी- प्रकाशन कार्य। थीसिस के अलावा मेरी 6 पुस्तकें छप चुकी थीं। इनमें से एक पुस्तक को राजस्थान साहित्य अकादमी ने वर्ष 1964 की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक घोषित कर दिया था। दूसरी वांछित योग्यता थी- अध्यापन का अनुभव। 3 योग्यताएं पूरी होने पर चयन मंडल चौथी योग्यता हटा सकता है। भारत भर से लगभग साठ अर्जियां आई थीं। मगर किसी के पास केवल अनुभव था, एम•ए• की डिग्री नहीं थी और किसी के पास केवल एम•ए• की डिग्री थी मगर हिन्दी पत्रकारिता का 10 सालों का अनुभव नहीं था। संस्थान में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में पढ़ाना था। किसी की अंग्रेजी कमजोर थी, किसी की हिन्दी। किसी का सामान्य ज्ञान गड़बड़ था। किसी के पास प्रकाशित पुस्तकें नहीं थी। संस्थान के चयन मंडल को लगा कि केवल मैं दोनों अनिवार्य योग्यता और पहली वांछित योग्यता पूरी कर रहा हूं। इसलिए संस्थान ने मुझे 19 नवंबर 1979 को नौकरी ज्वाइन करने का प्रस्ताव भेज दिया। इसके बाद संस्थान के तत्कालीन निदेशक श्री एच• वाई• शारदा प्रसाद के फोन अगले 22 दिनों तक आते रहे- "आप कब ज्वाइन करेंगे।" इसलिए मैंने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के कार्यकारी अध्यक्ष श्री सुंदर लाल खुराना (सेवानिवृत) आई•ए•एस• से मुझे शीघ्र रिलीव करने का आग्रह किया। उन्होंने तत्कालीन सम्पादक से सलाह ली और मुझे रिलीव करने से मना कर दिया। मुझे बुलाकर सम्पादक जी ने कहा - आप राजनीति, साहित्य, कला, विज्ञान, नाटक, सिनेमा, अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध, आर्थिक मुद्दों सम्बन्धी, खेल, शिक्षा सब तरह की खबरें सम्पादित कर सकते हैं और उन पर लिख सकते हैं। पूरे सम्पादकीय विभाग में दूसरा पत्रकार ये सारे क्षेत्र कवर नहीं कर सकता। लिहाजा आपको रिलीव नहीं किया जा सकता है। इसलिए मैंने ही खुराना जी से कहा कि वह आपको रिलीव ना करें। अखबार के हित में। तब मैंने राजनीतिक दबाव डलवाने का फैसला किया। क्योंकि शारदा प्रसाद जी हर हाल में मुझे संस्थान में रखना चाहते थे।
 स्वर्गीय गोविन्द वल्लभ पंत की जीवनी लिखते समय मेरा परिचय उनके पुत्र श्री कृष्ण चंद्र पंत से हो गया था। वह उस समय मोरारजी देसाई सरकार में योजना मंत्री बन गए थे और योजना भवन में बैठते थे। मैं उनसे मिला और कहा- लोग आपके पास नौकरी लगाने के लिए आते हैं। मैं अपनी नौकरी छुड़वाने का आग्रह लेकर आया हूं। कृपया श्री खुराना से कहें कि वह मुझे तुरंत रिलीव कर दें। क्योंकि भारतीय जन संचार संस्थान के निदेशक श्री एच• वाई• शारदा प्रसाद बार-बार पूछ रहे हैं कि आप कब ज्वाइन करेंगे और मैं उन्हें कोई उत्तर नहीं दे पा रहा हूं। पंत जी ने कृपा करके खुराना जी को फोन कर दिया और मुझे जल्दी से जल्दी रिलीव करने को कह दिया। तीन का अंक मेरे लिए शुभ रहा है। मुझे 1979 के बारहवें महीने की 12 तारीख को (1+2 = 3) रिलीव कर दिया गया। मैंने शारदा प्रसाद जी को फोन कर बता दिया। उन्होंने कहा- "बड़ी खुशी की बात है। तुरंत चले आइए।" मैं दोपहर 12 बजकर 12 मिनट (1+2=3) पर शारदा प्रसाद जी के कार्यालय में पहुंचा। उन्होंने कहा- "लिखिए प्रातः 10:00 बजे ज्वाइन किया।" मैंने कहा - "क्यों ?" उन्होंने कहा - "आप प्राइवेट नौकरी करते रहे हैं। आपको सरकारी कानून कायदे मालूम नहीं है। दोपहर 12 बजकर 12 मिनट पर ज्वाइन किया लिखेंगे तो आधे दिन का वेतन कट जाएगा।"
( डॉक्टर रामजीलाल जांगिड, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता विभाग के संस्थापक अध्यक्ष रहे। अपने कई दशकों के शिक्षण काल में उन्होंने हजारों पत्रकारों को प्रशिक्षित किया है जो देश दुनिया के मीडिया संस्थानों में शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं।  )

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