बुधवार, 8 जुलाई 2020

मजदूरों की व्यथा की कथा / वीरेंद्र सेंगर





■ घरार नदी के मेहनतकश मजदूरों की कथा व्यथा ~ 6
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● भाँवरपुर गाँव की घरार नदी की रार अभी भी बरकरार ~ नदी को नाला क्यों बताया, श्रमदान को क्यों नकारा ?
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● लगभग एक माह पूरा हो रहा है, जब बाँदा जिले के नरैनी ब्लाक के भाँवरपुर गाँव मे मेहनतकश मजदूरों ने श्रमदान करके अपनी उस "घरार नदी" को पुनर्जीवित कर लिया, जो एक दशक पहले लुप्त हो कर मर गयी थी। मजदूरों के इस अभूतपूर्व श्रमदान और अद्भुत सफलता की विस्तृत चर्चा  प्रमुख समाजसेवी संजय सिंह और राजा भइया, वरिष्ठ पत्रकारों तथा बार एसोसिएशन के अध्यक्षों के जरिए केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री से भी साझा हो चुकी है। मुख्यमंत्री द्वारा इन श्रमदानी मजदूरों को शीघ्र ही "भगीरथ सम्मान" से सम्मानित भी किया जाने वाला है।
● इसी बीच मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से घबराए और बौखलाए बीडीओ ने लगातार दो इतनी बड़ी भूलें कर दीं कि पूरे भाँवरपुर गाँव मे और मेहनतकश श्रमदानी मजदूरों मे गंभीर आक्रोश व्याप्त हो गया और मजदूरों ने मुख्यमंत्री के पास लखनऊ तक पैदल मार्च की घोषणा कर दी। बीडीओ नरैनी की पहली भूलचूक या गल्ती ये रही कि उन्होंने ~ श्रमदान स्थल पर मनरेगा योजना का बोर्ड लगाकर यह जताने की कोशिश की कि यह खुदाई का काम मनरेगा योजना का है, श्रमदान नही है, दूसरी चूक यह कि अति प्राचीन घरार नदी को नाला घोषित कर दिया।
● इन दोनों करतूतों का आक्रोश पूरे जिले में फैल गया। बाँदा मुख्यालय में बार एसोसिएशन के दो पूर्व अध्यक्षों, आनंद सिन्हा एवं अशोक त्रिपाठी जीतू तथा तहसील नरैनी के बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने संपूर्ण प्रकरण जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को न्यायिक समीक्षा के लिए सौंप दिया। इस नाते जिला जज का सीधा हस्तक्षेप होना स्वाभाविक ही है। इसके अलावा बाँदा, कानपुर, लखनऊ, झांसी तथा दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकारों ने भी भाँवरपुर गाँव पहुँच कर रिपोर्ट छापना शुरू कर दीं।
● शोरगुल बढ़ गया। श्रमदानी लखनऊ और दिल्ली मार्च के लिए तैयार हो गये, तो जिलाधिकारी के माध्यम से जिला प्रशासन ने जाँच और कार्यवाही का आश्वासन देकर पैदल मार्च 8 जून तक के लिए स्थगित करा दिया।
● 5 जून को जाँच दल ने जाँच पूरी कर ली, लेकिन जाँच का परिणाम अब तक सामने नहीं आया है, इसलिए समझौता तिथि की समाप्ति के बाद अब 8 जून को मजदूरों के जत्थे लखनऊ और दिल्ली के लिए शांतिपूर्वक पैदल मार्च करेंगे और अपनी व्यथा कथा मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को सुनाएंगे। श्रमदानी मजदूरों और उनके समर्थकों का स्पष्ट कहना है कि ~ "हमारे पैदल मार्च का कोई राजनीतिक उद्देश्य नही है और न ही कोई धरना या प्रदर्शन करना है। बहुत सहज और सामान्य ढंग से हमे अपनी पीड़ा अपने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को बतानी है।"
● मजदूरों ने उत्साहित मुद्रा में कहा कि~ "प्रधानमंत्री ने "मन की बात" मे भी और फिर गाँव प्रधानों को प्रेषित अपने पत्र में भी अपनी पीड़ा उन तक पहुँचाने का निमंत्रण दिया है ~ इसलिए अब हम सभी पैदल मार्च करते हुए लखनऊ और दिल्ली जाने को तैयार हैं।"
● पैदल मार्च के दौरान अपनी विशिष्ट पहचान के लिए ये मेहनतकश मजदूर सर पर पीली पगड़ी बाँधे होंगे और अर्ध नग्न वेशभूषा में होंगे।
● चर्चा है कि श्रमदानी मजदूरों का पैदल मार्च जिला प्रशासन के गले की हड्डी बन गया है~ श्रमदानी मजदूरों के सच को स्वीकार करें या बीडीओ की रक्षा करें ••••?

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