बुधवार, 8 जुलाई 2020

शेखावटी की नायाब कला / अरविंद कुमार सिंह




शेखावाटी की नायाब धरोहर

1750 की बनी राजा शार्दुल सिंह की छतरी

ताले में बंद यह जो छतरी आप देख रहे हैं यह बाहर से बहुत सामान्य दिखती है। लेकिन भीतर से देखिएगा तो पाएंगे कि भारत में ऐसी शानदार छतरी कम मिलेगी। तमाम लोग यही देख कर भ्रम खा जाते हैं कि इसमें क्या होगा। गेट पर ताला भी बंद रहता है। लिहाजा आवाजाही कम लोगों की ही होती है। लेकिन यह 1750 की बनी छतरी है जिसमें प्राकृतिक रंगों का उपयोग हुआ है। कितनी बारिश, धूल अंधड़ और तपती गरमी को झेलते हुए कलाकारों की बनाई यह नायाब धरोहर अपनी जगह कायम है। राजस्थान के शेखावाटी इलाके की यह नायाब धरोहर राजा शार्दुल सिंह की छतरी है। इसे देखते रहिए,निहारते रहिए, जल्दी समझना कठिन है कि कलाकारों ने  छतरी के भीतर क्या-क्या बना डाला है।


शेखावाटी का मतलब है राव शेखा का बगीचा। राव शेखा ने ने 1471 में विद्रोह करके इलाके पर अपनी सत्ता कायम की। उनके ही आठवें वंशज थे राजा शार्दुल सिंह। उऩ्होंने कई जगह भित्तिचित्र बनवाए। लेकिन झुंझनू जिले के परसरामपुरा गांव में बनी उनकी छतरी अनूठी है। यह शेखावाटी के सबसे पुराने भित्तिचित्रों वाली ऐसी धरोहरों में है जिनमें प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया था। शेखावाटी इलाका झुंझुनू, सीकर और चुरू के कुछ हिस्से में फैला है। यहां के 20 छोटे-बड़े क़स्बों में एक से एक शानदार हवेलियां हैं। लेकिन फिलहाल इसी छतरी पर चर्चा होगी। बीते कई दशको में यहां की धरोहरों की बेकदरी किसी से छिपी नहीं है। शुरुआती दौर के भित्तिचित्र प्राकृतिक रंगों से बने। यानि पौधों की छाल, जड़े, फल-फूल, पत्तियों और खनिजों की मदद से। इनको बनाने में महीनों लग जाते थे। रंगों के लिए बहुत से प्रयोग हुए लेकिन इनका 90 फीसदी हिस्सा पेड़ पौधों से ही मिलता था। कुछ जगह काले रंग के लिए काजल, तो सफेद रंग के लिए चूना, नीले के लिए देशी नील, लाल के लिए गेरू, नारंगी के लिए केसर आदि का भी प्रयोग हुआ। बहुत से रंग फूल पत्तियों को पीस कर बने। 19वीं सदी में रासायनिक रंग आने तक ये तकनीक जारी रही। इंग्लैंड और जर्मनी के रंगों ने देसी रंगों की धकिया दिया।


राजस्थान में अलग-अलग काल खंडों में भित्तिचित्रों की नौ शैलियां विकसित हुई थीं जिसमें से शेखावाटी शैली नवीनतम और सबसे लोकप्रिय है। हालांकि ये  जयपुर और अलवर शैली से मिलती है। यहां के घरों, झरोखों, मंदिरों, छतरियों, कुओं, बावड़ियों, हवेलियों, महलों, अटारियों और गलियों में अनूठे भित्तिचित्र बने। शेखावाटी में हवेलियां ही हवेलियां हैं। इनकी आत्मा ये भित्तिचित्र ही हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन इनका संरक्षण किया जाना जरूरी है। दुनिया की इस नायाब धरोहर को खड़ा करने वाले चेजारों यानि कारीगरों ने अपनी सोच और कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन यहां भित्तिचित्रों में किया है। कारीगर हिंदू और मुसलमान दोनों थे। हवेलियों और इस इलाके पर काफी कुछ सामग्री और तस्वीरें अपने पास हैं। क्योंकि यहां मैं 1988 से लगातार दो तीन साल के अंतराल पर आता जाता ही हूं। लेकिन फिलहाल शार्दुल सिंह की इस छतरी के भीतर का कमाल देखिए और उन कलाकारों को याद कीजिए जिन्होंने 1750 में जो बनाया था वह कैसे अभी भी इस रुप में कायम है।


(C) अरविंद कुमार सिंह


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