बुधवार, 8 जुलाई 2020

सूरमा भोपाली की अदा को लोग कभी भूल नहीं पाएंगे /रतन भूषण





हंसाकर रुला गए सूरमा भोपाली....

इधर सिनेमा के कई सितारों ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अब हास्य अभिनेता जगदीप इस फानी दुनिया से कूच कर गए। जगदीप को देश और दुनिया में सूरमा भोपाली के नाम से जाना जाता था। यह नाम उन्हें फ़िल्म शोले से मिला था। जगदीप ने 81 साल की उम्र में मुंबई में अपने घर में अंतिम सांस ली।उन्होंने दशकों तक बॉलीवुड पर राज किया। उनका असली नाम सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी था, लेकिन हिंदी फिल्मों में आने के बाद उन्होंने अपना नाम जगदीप रख लिया था।
जगदीप ने तीन सौ इक्यानवे फिल्मों में काम किया था। उन्होंने फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट की थी। फिर तमाम फिल्मों में उन्होंने  अहम रोल निभाया। शम्मी कपूर की फिल्म ब्रह्मचारी से उनका बतौर कॉमेडियन अभिनय सफर शुरू हुआ। जगदीप के बेटे जावेद जाफरी और नावेद जाफरी भी मनोरंजन जगत में सक्रिय हैं। उनके पोते मीजान ने फिल्म मलाल से हिंदी सिनेमा में बतौर अभिनेता अपनी शुरुआत की। उनकी एक बेटी मुस्कान है जो उनकी दूसरी पत्नी से है। पिछले साल उन्हें आइफा समारोह में भारतीय सिनेमा में अतुल्य योगदान के लिए सम्मानित किया गया था। अभिनेता जगदीप बहुत खुशमिजाज और जिंदादिल इंसान थे। फिल्मों में अपने बेहतरीन काम से दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाले इस अभिनेता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वे कह रहे हैं, आओ हंसते हंसते और जाओ हंसते हंसते...। दरअसल जगदीप का यह वीडियो उनके बेटे जावेद जाफरी ने साल 2018 में अपने ट्विटर से ट्वीट किया था, जिसमें वे कहते हैं, आप लोगों ने मुझे विश किया। सबका शुक्रिया। बहुत बहुत धन्यवाद। या तो दीवाना हंसे या वो, जिसे तौफीक दे, वरना इस दुनिया में आकर मुस्कुराता कौन है? मैं मुस्कुराहट हूं। जगदीप हूं। आओ हंसते हंसते और जाओ हंसते हंसते। हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसे ही नहीं है, अब आप समझ लो...। जगदीप ने अपने फिल्मी जीवन में करीब 400 फिल्मों में काम किया, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें सूरमा भोपाली नाम से ही पहचाना जाता रहा। वे साल 2017 में आखिरी बार फिल्म रामभजन ज़िंदाबाद में नजर आए थे। इसमें उनके साथ थे अभिनेता ओमपुरी।
जगदीप का जन्म 29 मार्च 1939 को मध्यप्रदेश के दतिया में हुआ था। उन्होंने फिल्मों में आने के बाद अपना नाम बदल दिया। जगदीप के पिता का नाम सैयद यावर हुसैन जाफरी और माता का नाम कनीज हैदर था। पिता के निधन के बाद वे मां के साथ तब की मुम्बई आ गए। मुंबई में उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। पैसा कमाने के लिए मां ने एक अनाथालय में खाना बनाने का काम शुरू कर दिया। मां का इस तरह से काम करना जगदीप को बिलकुल पसंद नहीं था। इस वजह उन्होंने स्कूल छोड़कर सड़क पर सामान बेचना शुरू कर दिया। तभी उन्हें फिल्मों में पहला काम मिला। उन्होंने बतौर बाल कलाकार बी आर चोपड़ा की फिल्म से शुरुआत की थी। यह फ़िल्म उन्हें सड़क पर खिलौने बेचते हुए मिली।
हुआ यह कि छोटे जगदीप को एक आदमी ने पूछा कि फिल्मों में काम करोगे? काम क्या करना होगा? जगदीप ने पूछा, तो उन्होंने कहा, कैमरे के सामने काम करना है। तुम्हारी फोटो खिंचेगी। नन्हा जगदीप ने पूछा, कितने पैसे दोगे? जवाब मिला, 3 रुपये।
अगले दिन आकर वहीं से वह सिनेमा वाला जगदीप को स्टूडियो ले गया। नहला धुला और कपड़े पहनाकर कैमरे के सामने खड़ा कर दिया। सीन था कि स्टेज पर नाटक हो रहा है और दर्शकों में कुछ बच्चे बैठे हैं। काम इतना ही था।
कुछ देर बाद यह कहा गया कि इन बच्चों में से कौन है जो संवाद बोल सके। कोई तैयार नहीं हुआ, क्योंकि वह उर्दू में था, तो जगदीप ने पूछा, यह क्या होता है? उस आदमी ने कहा, अरे भाग्य खुल जाएंगे अगर बोल दिया तो। रुपये भी ज्यादा मिलेंगे, 6 रुपये। जगदीप ने कहा, मैं बोलूंगा।
उसे सिखाया गया, तो उसने जल्द सीख लिया और बोल भी दिया। फ़िल्म थी यश चोपड़ा निर्देशित अफसाना। इसके अलावा उन्होंने अब दिल्ली दूर नहीं, आर पार, दो बीघा जमीन और हम पंछी एक डाल के जैसी फिल्मों में काम किया और नाम कमाया। हम पंछी एक डाल के देखने के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनकी तारीफ की थी।
 इसके अलावा जगदीप बहुत सी फिल्मों में नजर आए, लेकिन फिल्म शोले में निभाए गए उनके किरदार सूरमा भोपाली ने उनकी शोहरत घर घर तक पहुंचा दी। जगदीप ने बाद में इसी नाम की एक फिल्म का निर्देशन भी किया। बतौर कॉमेडियन जगदीप ने फिल्मों में ऐसे किरदार निभाए जो हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।
अभिनेता जगदीप ने रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी फिल्म शोले में सूरमा भोपाली का किरदार निभाया था। बस यहीं से जगदीप सूरमा भोपाली बन गए। उनका यह किरदार बड़ा ही दिलचस्प था। साथ ही साथ उनका जगदीप से सूरमा भोपाली बनने का किस्सा भी बेहद अजीब, जिसके बारे में उन्होंने खुद ही एक इंटरव्यू के दौरान बताया था। एक इंटरव्यू में जगदीप से पूछा गया कि आप जगदीप हैं। आपको आपके असली नाम से कम ही लोग जानते हैं। आपके जेहन में यह कैसे आया कि भोपाल की भाषा को दुनिया भर में मशहूर कर दें? जगदीप ने कहा, यह बड़ा दिलचस्प किस्सा है। सलीम और जावेद की एक फिल्म थी सरहदी लुटेरा। इस फिल्म में मैं हास्य रोल में था। मेरे डायलॉग बहुत बड़े थे, तो मैं फिल्म के डायरेक्टर सलीम के पास गया और उन्हें बताया कि ये डायलॉग बहुत बड़े हैं। तो उन्होंने कहा कि जावेद बैठा है उससे कह दो। जगदीप ने अपनी बात आगे रखते हुए कहा, मैं जावेद के पास गया और मैंने उनसे कहा तो उन्होंने बड़ी ही फुर्ती से डायलॉग को पांच लाइन में समेट दिया। मैंने कहा कमाल है यार, तुम तो बड़े ही अच्छे राइटर हो। इसके बाद हम शाम के समय साथ बैठे, किस्से कहानी और शायरियों का दौर चल रहा था। उसी बीच जावेद ने बीच में एक लहजा बोला, क्या जाने, किधर कहां- कहां से आ जाते हैं। मैंने पूछा, अरे ये क्या कहां से लाए हो? तो वे बोले कि भोपाल का लहजा है।
जगदीप आगे बताते हैं, मैंने कहा भोपाल से यहां कौन है, मैंने तो ये कभी नहीं सुना। इस पर उन्होंने कहा कि ये भोपाल की औरतों का लहजा है। वो इसी तरह बात करती हैं। तो मैंने कहा मुझे भी सिखाओ। इस वाकये के 20 साल बीत जाने के बाद फिल्म शोले शुरू हुई। मुझे लगा सलीम या जावेद मुझे शूटिंग के लिए बुलाएंगे, लेकिन मुझे किसी ने बुलाया नहीं। फिर एक दिन रमेश सिप्पी का मेरे पास फोन आया। वो बोले शोले में काम करना है तुम्हें। मैंने कहा, उसकी तो शूटिंग भी खत्म हो गई। तब उन्होंने कहा कि नहीं नहीं, यह सीन फ़िल्म में अहमीयत रखता है और इसकी शूटिंग अभी बाकी है। यहीं से शुरू हुआ जगदीप से सूरमा भोपाली बनने का सफर और यह रोल मुझे जावेद की वजह से मिला।
जगदीप अपने जमाने के बेहतरीन कॉमेडियन रहे। उन्होंने सूरमा भोपाली बन अपनी एक पहचान तो बनाई ही। साथ ही भोपाल शहर की बोली के अंदाज़ को भी लोगों में मशहूर किया।
हास्य कलाकार के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में निर्माताओं के हमेशा पसंदीदा रहे जगदीप। कॉमेडी में उन्होंने खुद को इस तरह स्थापित किया था कि कोई दूसरा कलाकार उनकी जगह नहीं ले पाया। वे अपने जैसे खुद ही थे। भले ही आज जगदीप हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए ये कुछ किरदार हमेशा याद किए जाएंगे।
फिल्म दो बीघा जमीन का लालू उस्ताद। उस समय जगदीप एक बाल कलाकार के रूप में काम करते थे। निर्देशक बिमल राय ने फणि मजुमदार की फिल्म धोबी डॉक्टर में उन्हें रोते हुए देखा। वहीं से बिमल राय ने जगदीप को पसंद किया और अपनी इस फिल्म में एक जूते पॉलिश करने वाले का किरदार दिया। यह एक कॉमेडी किरदार था, जिसमें जगदीप लोगों को चुटीले संवाद बोलकर जूते पॉलिश करवाने के लिए बुलाते हैं। साथ ही अपनी बिरादरी वालों पर रौब भी जमाते हैं। इस रोल के लिए उन्हें 300 रुपये मिले थे।
फिल्म आर पार का इलाइची। अजीब से नाम से ही अंदाजा हो जाता है कि जगदीप ने इसमें भी एक कॉमेडियन का किरदार ही किया होगा। गुरु दत्त के निर्देशन में बनी इस फिल्म में जगदीप ने गुरु दत्त के पार्टनर का किरदार निभाया। शुरुआत से लेकर अंत तक दोनों एक साथ रहते हैं। उनके किरदार की खास बात यह है कि गुरु दत्त वयस्क हैं और जगदीप एक बालक। फिर भी बुजुर्गों जैसी बात करते हैं। यही बात उनके किरदार को बड़ा बनाती है।
फिल्म हम पंछी एक डाल के का महमूद। बच्चों के बेहतरीन काम की वजह से सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का फिल्मफेयर जीतने वाली इस फिल्म में जगदीप ने मुख्य किरदार राजेंद्र मेहरा (मास्टर रोमी) के सहपाठी का किरदार निभाया है। कई और दोस्तों के साथ मिलकर राजेंद्र और महमूद बाहर घूमने चले जाते हैं। राजेंद्र घर से रूठकर आया था, तो महमूद ऐसा दोस्त था जो उसे बुजुर्गों की तरह समझाया करता था। इस किरदार के लिए जगदीप की बहुत तारीफ हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें इस रोल के लिए पुरस्कृत किया था।
फिल्म शोले का सूरमा भोपाली। रमेश सिप्पी की फिल्म शोले का तो हर किरदार लोगों को जुबानी याद हैं। यहां से ही जगदीप को सूरमा भोपाली के नाम से ही जाना जाने लगा था। फिल्म में एक फेंकू मिजाज का लकड़ी बेचने वाले के रूप में जगदीप के किस्से सुनने बहुत से लोग जमा रहते हैं। वह डींगें हांकता रहता है और लोग सुनते रहते हैं। जगदीप का यह रूप लोगों की तब बहुत पसंद आया। आज भी आता है।
फिल्म पुराना मंदिर का मच्छर सिंह। उस समय की डरावनी फिल्में जिन्हें देखना पसंद हैं, उन्होंने यह फिल्म तो जरूर देखी होगी। हॉरर फिल्म में भूत को मारने वाला हीरो होता है, लेकिन इस फिल्म में तो जगदीप ही नजर आते है। हॉरर फिल्म में इस तरह की कॉमेडी की उम्मीद सिर्फ जगदीप से ही की जा सकती है। गब्बर सिंह से प्रेरित डकैत के रूप में जगदीप दर्शकों को पूरा हंसाते हैं।
फिल्म सूरमा भोपाली का सूरमा भोपाली। शोले के किरदार सूरमा भोपाली से जगदीप इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इसको लेकर अपने निर्देशन में एक अलग फिल्म ही बना डाली। इसमें उन्होंने खुद को मुख्य किरदार के रूप में सामने रखा। जगदीप को इस फिल्म के लिए खरीदार भी नहीं मिले, लेकिन फिर भी जगदीप बहुत संतोष में थे। उन्होंने इस फिल्म को जबरदस्ती बेचने के कोई बाजारू हथकंडा भी नहीं अपनाया।
फ़िल्म भाभी का बलदेव यानी बिल्लू । कमाल की इस पारिवारिक फ़िल्म में उनकी भूमिका बलराज साहनी के एक भाई की थी। उनके अपोजिट फ़िल्म में स्टार हीरोइन नंदा थीं, जिनके साथ फ़िल्म में एक गाना चली चली रे पतंग मेरी चली रे... फिल्माया गया था।
फिल्म : निगाहें का मुंशी जी। अलौकिक शक्तियों से प्रेरित इस फिल्म में लोग सनी देओल और श्रीदेवी को देखते हैं, लेकिन मामूली सी जो हंसी इस फिल्म में लोगों के चेहरों पर आती है, वह फिल्म के मुंशी जी यानी जगदीप की वजह से आती है। फिल्म में उन्होंने श्रीदेवी के यहां एक खानदानी नौकर का किरदार निभाया है, जो उनके परिवार की वर्षों से देख-रेख कर रहा है। उस जमाने में वह गुजरे जमाने की बातें करते हुए बहुत मजाकिया लगते हैं। उनका अभिनय निराला है।
फिल्म अंदाज अपना अपना का बांकेलाल भोपाली।
कॉमेडी के लिए मशहूर इस फिल्म में आमिर खान और सलमान खान की जोड़ी दर्शकों को बहुत पसंद आई। सलमान के पिता के रूप में जगदीप उनकी खूब खिंचाई करते हैं। बाप बेटे की प्यारी नोंकझोंक से दर्शकों का खूब मनोरंजन होता है, जो कि आजकल की फिल्मों में तो शायद ही देखने को मिले। वे फ़िल्म में अपने बेटे को सुधारने और सही रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं।
फिल्म चाइना गेट का सूबेदार रमैय्या। कुछ बुजुर्ग हो चुके लोगों की टोली जब फिल्म के मुख्य विलेन जगीरा को मारने निकलती है, तो उस टोली में सूबेदार रमैया यानी जगदीप भी होते हैं। फिल्म में वे दिखते जरूर डरपोक हैं लेकिन उनकी शहादत बहुत बहादुरी से होती है। अपने दोस्त की जान बचाते हुए वे अपनी जान दे देते हैं। अमरीश पुरी, डैनी डेन्जोंगपा, नसीरुद्दीन शाह जैसे शानदार कलाकरों के साथ जगदीप भी अपनी भूमिका से छाप छोड़ते हैं।
फिल्म बॉम्बे टू गोआ ( नई ) का लतीफ खेड़का। आटा चक्की के मालिक लतीफ खेड़का जब अपनी खोई हुई बेटी की रिपोर्ट लिखवाने पुलिस स्टेशन पहुंचते हैं, तो कॉमेडी भरपूर होती है। वे अपनी बेटी की ऐसी फोटो थानेदार के सामने पेश करते हैं, कि उसमें उसका चेहरा ही नहीं दिख रहा होता है। सभी में बुर्का पहना होता है। उस छोटे से सीन से भी वे लोगों की नजर में आ जाते हैं। वे इसमें कमाल का अभिनय करते हैं।
जगदीप ने सभी फिल्मों में अपने काम से लोगों को खूब हंसाया। वे जब भी पर्दे पर आए, लोगों ने सिर्फ उन्हें ही देखा। लोग उन्हें कभी भूल पाएंगे, ऐसा मुमकिन नहीं, लेकिन सच यही है कि अब लोगों को रुलाकर चला गया है हंसाने वाला जगदीप...।


-रतनभूषण



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