सोमवार, 13 जुलाई 2020

मोदीजी का विकासवादी विस्तार / ऋषभदेव शर्मा




विस्तार बनाम विकास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लेह में भारतीय सैनिकों को संबोधित करते हुए जहाँ एक ओर जवानों का हौसला बढ़ाया, वहीं देशवासियों को भरोसा भी दिलाया कि सरहदें हर तरह सुरक्षित हैं। लेकिन उनके भाषण की जो अन्योक्ति बिना नाम लिए भी चीन को संबोधित थी, उसकी चोट भी सीधे निशाने पर लगी। 'विस्तारवादी' सुनते ही चीन चोर की दाढी में तिनके वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए चिल्लाने लगा। किंतु, अब दुनिया उसके विस्तारवादी और साम्राज्यवादी चरित्र को पहचान चुकी है। इतिहास साम्यवाद के ताबूत में कील ठोकने का श्रेय शायद चीन को ही देगा!

फिलहाल मुद्दे की बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने विस्तार के समांतर विकास की बात रख कर आज की दुनिया के दो ध्रुवों की पहचान करा दी है। एक तरफ विस्तारवाद है, तो दूसरी तरफ विकासवाद। उन्होंने ठीक ही याद दिलाया कि "विस्तारवाद का युग खत्म हो चुका है। अब विकासवाद का समय आ गया है। तेजी से बदलते हुए समय में विकासवाद ही प्रासंगिक है। विकासवाद के लिए अवसर है और विकासवाद ही भविष्य का आधार है।" यहाँ याद रखना ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री के इस विकासवाद में आत्मनिर्भरता और शौर्य केंद्र में हैं। इसीलिए उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि  देश के वीर सपूतों ने गलवान घाटी में जो अदम्य साहस दिखाया, वह पराक्रम की पराकाष्ठा है। देश को अपनी सेनाओं पर गर्व  और शहीदों पर नाज़ है। कहना न होगा कि वीरों के सिंहनाद से धरती के डोलने की चर्चा करके वे वास्तव को चीन को संदेश दे रहे थे कि अगर युद्ध हुआ, तो वह भारत और चीन की सरहदों तक सीमित नहीं रहेगा, उसकी धमक पूरी दुनिया को डोलने के लिए मजबूर कर देगी। उन्होंने सही ही याद दिलाया कि विश्व शांति हमारा जीवन दर्शन अवश्य है, लेकिन शांति के लिए भी शक्ति और शौर्य की ज़रूरत होती है। दुनिया में शक्ति संतुलन के लिए शांति और शौर्य दोनों एक साथ चाहिए तथा आत्मनिर्भर भारत इसी दिशा में अग्रसर है। इसके लिए उन्होंने भगवान कृष्ण की दो छवियों का बहुत सटीक उल्लेख किया। कृष्ण के दो रूप हैं। एक गोपाल कृष्ण और दूसरा वासुदेव कृष्ण। एक में वे वंशीधर हैं, तो दूसरे में चक्रधर। बाँसुरी प्रेम का प्रतीक है, तो चक्र शौर्य का। बाँसुरी शांति की धुन बजाती है, तो चक्र   युद्ध में विजय का आधार बनता है। यानी, आधुनिक भारत की शांति का स्रोत उसका शौर्य है!  संभवतः इसीलिए प्रधानमंत्री ने सीमा और सेना के संदर्भ में भारतीय विकासवाद की सोदाहरण व्याख्या करना ज़रूरी समझा और बताया कि किस तरह हम अपने रक्षा संसाधनों का विकास कर रहे हैं और किस तरह सीमावर्ती इलाकों में यातायात और संचार की अरसे से लंबित पड़ी योजनाओं को पूरा करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि सेनाओं के लिए जरूरी हथियार हो या फिर सैनिकों के लिए साजो-समान, इन सब पर हम बहुत ध्यान देते रहे हैं; तथा कि अब देश में बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को तीन गुना कर दिया गया है।

संकेत साफ है कि चीन किसी मुगालते में न रहे। यह 2020 है, 1962 नहीं। मानना पड़ेगा कि यह संकेत चीन ने सुना भी और समझा भी। तभी तो चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहना ज़रूरी समझा कि चीन और भारत सैन्य तथा राजनयिक माध्यमों से एक दूसरे के साथ संपर्क में हैं और  किसी भी पक्ष को ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए जो सीमा पर हालात को जटिल बना दे। इसके अलावा दिल्ली में चीनी दूतावास के प्रवक्ता जी रोंग ने एक तरह से स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि चीन को 'विस्तारवादी' के तौर पर देखना 'आधारहीन' (?) है और दावा किया है कि चीन ने अपने 14 में से 12 पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से सीमांकन किया है!  लेकिन उनके इन बयानों से यह सच्चाई नहीं बदल जाने वाली कि चीन लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत-चीन सीमा के साथ छेड़छाड़ करने का आदी हो चुका है और दक्षिणी चीन सागर से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक की हलचलें उसके विस्तारवादी चरित्र को उजागर करने के लिए काफी हैं!
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