सोमवार, 13 जुलाई 2020

लोकतंत्र का एनकाउंटर / संजय त्रिपाठी




एनकाउंटर या लोेकतंत्र की हत्या

संजय त्रिपाठी

कानपुर वाला विकास दुबे का एनकाउंटर मौजुदा समय में कई तरह के सवाल पैदा कर दिया है। कुछ लोग एक दुर्दांत अपराधी को एनकाउंटर में मार गिराना जायज बता रहे हैं, तो कुछ लोग इस एनकाउंटर पर सवाल खड़ा कर रहे है। देखा जाय तो यह एनकाउंटर बड़े पैमाने पर जातिगत रूप लेता जा रहा। कई तरह के मुद्दे इस अपराधी और इसके साथ हुए एनकाउंटर को लेकर उठा हुआ है। हालांकि देखा जाए तो ऐसा मुद्दा उठना भी चाहिए और इस पर बहस भी होना चाहिए, ताकि इतनी बड़ी जनसंख्या वाली देश में कुछ ऐसा निकल कर सामने आये जो आम आदमी के रक्षा के लिए सार्थक हो। बहुत से विद्वान राजनीतिक और अपराधी के गठजोड़ पर कई विचार दिये हैं और उम्मीद है जब - जब ऐसी स्थिति पैदा होगी तब - तब अपनी विचार देते रहेंगे। लेकिन आज के समय में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या एसटीएफ द्वारा किया गया विकास दुबे का यह एनकाउंटर सही है और क्या इससे आगे विकास दुबे पैदा नहीं होगे? यह तो मानना पड़ेगा कि कानून और न्यायिक प्रक्रिया लचर होने के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद होते जा रहे है। परन्तु हम सबको इसका भी गहन अध्ययन करना चाहिए कि आखिर यह हालात कैसे पैदा हो रहा है? इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि कभी भी यह समाज अपराध मुक्त नहीं हो सकता । अपराधी हर युग में रहें है और आगे भी रहेंगे, लेकिन जब भी शासन से इन्हें संरक्षण प्राप्त होने लगेगा इनका आकार और स्वरूप जरूर विशला हो जायेगा। अगर हम कहते हैं कि कानून और न्यायिक प्रक्रिया लचर होने से इनका साम्राज्य बढ़ता जाता है तो पहले यह साफ होना चाहिए कि दोनों की स्थिति लचर क्यो हुई। हमारा देश तो संविधान के तहत चल रहा और जब कानून और न्यायपालिका गैर जिम्मेदार हुई तो यह प्रक्रिया लचर हुई और इसमें सुराग हो गये जिसका नतीजा हुआ कि बड़े - बड़े अपराधी विधानसभा और लोकसभा तक बकायदा चुन कर पहुंच गये। आज हम सब विकास दुबे के एनकाउंटर को जायज ठहराते हैं तो एक दिन इसी तरह हथियारबंद पुलिस महकमा भी निरंकुश हो जायेगा तब हर आदमी विकास दुबे बन जायेगा। जब भी कानून के नियम की धज्जियां उड़ाई जाती है तो थोड़े देर के लिए वह जायज या सही कदम कहा जाता है, लेकिन बाद में वह ऐसा नासूर बन जाता है जो रात और दिन का चैन छिन लेता है। जब सारे फैसले आॅन द स्पाॅट करना है तो पूरे देश में न्यायालयों और लंबी - चैड़ी खर्च की क्या आवश्यकता हैं । जरा सोचे जिस व्यक्ति ने अपने आप को सरेंडर कर दिया और उसे सुरक्षा देने की जिम्मेदारी अब एसटीएफ पर है वही एसटीएफ ऐसी बहाना बना कर मार दे तब क्या कहा जायेगा ? हैदराबाद एनकाउंटर पर भी लोगों ने सवाल उठाया था, वह भी सरासर गलत था क्योंकि हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है - ‘ कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा कोई भी व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। ’’ इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को अपने जीवन से वंचित करने से पहले, राज्य को आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार मुकदमा चलाना होगा। मुकदमे में, अभियुक्त को पहले उसके खिलाफ आरोपों के बारे में सूचित करना होगा, फिर खुद का (वकील के माध्यम से) बचाव करने का अवसर दिया जाना होगा, और उसके बाद यदि वह दोषी पाया गया, तभी उसे दोषी करार देकर अदालत मृत्युदंड दे सकती है। ऐसे में तो पुलिस खुद ही न्यायालय बनती जा रही है। अब प्रश्न उठता है कि पुलिस ने इस एनकाउंटर के लिए जो कहानी तैयार की है उसमें झोल ही झोल दिख रहा जिसे एक आदमी भी उजागर कर रहा। हालांकि इस पूरे प्रकरण की जांच पूर्व न्यायधीश शशिकांत अग्रवाल की अध्यक्षता में की जायेगी। परन्तु इस घटना ने राजनीति के अपराधीकरण और अपराध की राजनीतिकरण पर एक बहस तो पैदा कर ही दिया है। राजनेताओं को वोट के लिए अपराधियों पर निर्भर होना पड़ता है, अपराधी पुलिस के लिए कमाउं पुत होता है और पुलिस अपराधी को निरकुंश होने का अधिकार देता है। अगर हमें बहस ही करना है तो जाति - पाति से उपर उठकर समाज और संविधान पर बहस करें ताकि समाज निरंकुश न बन पाएं। याद है पिछले दिनों माॅब लिचिंग की घटनाएं जिस तरह शुरू हुई उसका अंत साधु - महात्माओं पर जाकर हुआ । यह संयोग की बात है कि हम और आप उसका शिकार नहीं हुए लेकिन जब ऐसा समाज हम अपनी सोच और कार्य से बना देंगे तो क्या हम और आप बच जायेंगे ? यह है आज बहस का मुद्दा । यह है सोचने वाली बात कि अगर हर अपराधी को इसी तरह एनकाउंटर के माध्यम से पुलिस सजा देने लगे तो एक दिन निरपराध भी इसका शिकार नहीं हो जायेगा। याद करें कनाॅट प्लेस की वह घटना जब एक व्यवसायी को दिल्ली पुलिस ने एनकाउंटर में गाड़ी के अंदर ही उड़ा दिया। इस घटना का इतना विरोध हुआ कि दिल्ली पुलिस कुछ समय तक एनकाउंटर करना ही छोड़ दी थी। विकास दुबे के एनकाउंटर में कई ऐसे मामले साफ दिख रहे हैं जिससे ऐसा लगता है कि यह एनकाउंटर सिर्फ और सिर्फ बदला लेने के लिए किया गया है। गाडी बदलने का मामला सामने आ रहा, गाड़ी पलटने का, हथकड़ी लगा था या नहीं अगर लगा था तो रिवाल्वर कैसे छीन लिया, पलटी गाड़ी से सबसे पहले वह निकल कर कैसे भाग गया जबकि उसके दोनों पैरों में लोहे के राॅड पड़े हुए थे। यह तमाम प्रश्न है जो अभी अनुतरीत है। मैं ऐसे अपराधी का बचाव नहीं कर रहा, ब्राह्मण होने के नाते उसके पक्ष में नहीं बोल रहा। इतने बड़े अपराधी को सजा तो जरूर मिलनी चाहिए वह भी मौत की, लेकिन इस तरह पुलिस की अपनी मनमर्जी की नहीं क्योंकि यह कदम गलत हैं और आगे भविष्य में आम आदमी इसका शिकार हो सकता है।

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