रविवार, 12 जुलाई 2020

ओडियन मे देवानंद / विवेक शुक्ला



Navbharatimes

ओडियन में  देव आनंद

अपनी दिल्ली के पहले एयरकंडीशन और शीला के बाद दूसरे 70 एमएम स्क्रीन वाले ओडियन के आगे-पीछे छाई उदासी डराती है। यहां की स्थायी रौनक पर कोरोना का ग्रहण लगा हुआ है। ओडियन का सन्नाटा देखा देखा नहीं जाता। आखिर इस साल ये 80 का हो गया है। अगर सब कुछ सामान्य होता तो ओडियन में जश्न मनाया जा रहा होता।

देव आनंद के लिए ओडियन सच में बड़ा लकी रहा ।यहां उनकी हम दोनों,    ज्वैल थीफ,गाइड, पेइंग गेस्ट, मुनीमजी, काला पानी जैसी बहुत सी फिल्मों को दिल्ली ने दिल से सराहा और बार-बार देखा। देव साहब के बड़े भाई चेतन आनंद की 1962 की जंग पृष्ठभूमि पर बनी हकीकत भी ओडियन में प्रदर्शित हुई थी। उसे देखकर दिल्ली ना जाने कितनी बार भावुक होकर रोई थी।

असल में, ओडियन 1940 में बन गया था। इधर शुरू में हॉलीवुड की फिल्में ही प्रदर्शित  की जाती थीं। तब तक कनॉट प्लेस में मोटा-मोटी गोरे ही शॉपिंग या फिल्में देखने आते थे। पर देश के आजाद होने के बाद रावलपिंडी से आए साहनी परिवार ने ओडियन को 1951 में लीज पर लिया। देखा जाए तो तब से इसकी किस्मत खुली। फिर यहां नया दौर, नवरंग, झनक-झनक पायल बाजे और कोहिनूर जैसी अपने दौर की मकबूल फिल्में भी लगीं और हिट हुईं। यहां दर्शक आने लगे क्योंकि ओडियन की लोकेशन कमाल की थी ही। इसके ठीक आगे तक फटफटिया और टांगे आ जाते थे।

ओडियन 1961 में रेनोवेशन के लिए कुछ महीने के लिए बंद रहा। ये जब 1962 में खुला तो इसकी नई बॉलकनी में करीब 300 सीटें जुड़ गईं। तब यहां पहली पिक्चर लगी कम सेपटंबर । नए ओडियन का श्रीगणेश हुआ तो फिल्म को देखने के लिए राष्ट्रपत्ति सर्वपल्ली राधाकृष्नन भी दर्शक दीर्घा में विराजमान थे।

वक्त के गुजरने के साथ ओडियन राजधानी के सबसे पसंदीदा सिनेमाघर के रूप में अपनी जगह बनाता रहा। जब भी कोई बड़ी फिल्म रीलिज होती तो यहां अवश्य प्रदर्शित होती। पाकीजा, कभी-कभी,कूली जैसी सफल फिल्में यहां लंबे समय तक दिखाई जाती रहीं। जिन दिनों यहां कभी-कभी लगी हुई थी तो एक दिन अचानक से कुर्ता-पायजामा पहने शशि कपूर आ गए। उन्होंने शॉल ओढ़ा हुआ था। वे फिल्म के खत्म होने के बाद ओडियन से निकले तो खूबसूरत और शालीन शशि कपूर को उनके चाहने वालों ने घेर लिया। तब स्टार्स के साथ भारी-भरकम सिक्युरिटी गॉर्ड नहीं चला करते थे। जिंदगी  थोड़ी सुकून भरी हुआ करती थी। अभावों में भी दुनिया मस्त थी। शशि कपूर ने कइयों को आटोग्राफ दिए और वहां से निकले।

हां,ओडियन को दो-तीन बार झटका लगा जब इधर बॉबी,  सत्यम शिवम सुंदरम और शोले प्रदर्शित नहीं हुईं। पहली दो फिल्में रीगल में और शोले प्लाजा में लगी। लेकिन, ओडियन ने राज कपूर की मृत्यु के बाद उनकी तमाम फिल्में प्रदर्शित करके अपने चाहने वालों की शिकायत को दूर कर दिया। दो साल पहले यानी 2018 में ओडियन भी मल्टीप्लेस में तब्दील हो गया।

 पर इससे पहले यहां सल्लू भाई की चोरी-चोरी चुपके-चुपके और नो एंट्री को भारी सफलता मिली थी। नो एंट्री में सलमान खान की एंट्री पर ओडियन सीटियों और तालियों से गूंजने लगता था। और ओडियन में फिल्म देखने वाले इसके ठीक आगे बैठने वाले मुच्छड़ के वर्क लगे मीठे पान को मुंह में दबाकर ही फिल्म देखना पसंद करते रहे हैं।  समाप्त।
ये लेख नव भारत टाइम्स मेें गुजरे हफ्ते पब्लिश हुआ था।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कितनी बदल गयी दिल्ली / विवेक शुक्ला

 दिल्ली 1947- 2021 कितनी बदली   साउथ दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव के करीब हुमायूंपुर में मिजो फूड तथा मयूर विहार में मलयाली रेस्तरांओं के साइन...