शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

अमिताभ बच्चन से बातचीत / दया शंकर पाण्डेय


अमिताभ बच्चन के साथ

अमिताभ बच्चन अब तो जब-तब लखनऊ आते रहते हैं। पर पहले ऐसा नहीं था। बहरहाल वह जब 1996 में एक बार लखनऊ आए थे तब मैं ने उन से एक लंबा इंटरव्यू लिया था। हिंदी फ़िल्मों में ऊट-पटांग ट्रीटमेंट पर जब बात की तो वह अपनी तरफ से कुछ कहने के बजाय हरिवंश राय बच्चन की शरण में चले गए। बोले, 'बाबू जी कहते हैं कि हिंदी फ़िल्में पोयटिक जस्टिस करती हैं।' और भी बहुतेरी बातें अमिताभ ने बताईं। जिन सब का व्योरा दे पाना यहां मुमकिन नहीं है। हां पूरी बातचीत में उन की अतिशय विनम्रता ने मुझे बहुत चकित किया। क्यों कि बहुतेरे फ़िल्मी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों,राजनितिग्यों या और अन्य तमाम लोगों से मिलने बतियाने का मुझे मौका मिलता रहा है। दिलीप कुमार तक से दो बार मिला हूं। वह कलफ़ लगी उर्दू ही बोलते हैं या फिर अंगरेजी। और उन के मिलने-बतियाने में भी वह कलफ़ उतरती नहीं है। बल्कि और चढ जाती है। ज़्यादातर लोगों का मिजाज बहुत दिखावे वाला होता है। उपेक्षित भाव से मिलते हैं।कई बार अपमानित करने का भाव भी मिल जाता है। लेकिन भीतर से। बाहर से तो वह हंसते हुए ही मिलते हैं। पर पता तो चल ही जाता है।पर तब मैं ने पाया कि अमिताभ बच्चन इस से बिलकुल उलट हैं। उन की अतिशय विनम्रता से जब मैं अफना गया तो उन से पूछ ही लिया इंटरव्यू खत्म होने के बाद कि,'यह जो आप की अतिशय विनम्रता है, वह ओढी हुई है, अभिनय है या सचमुच ही आप इतने विनम्र हैं?' यह सवाल सुन कर कोई भी भडक सकता है। पर यह देखिए अमिताभ बच्चन बिलकुल नहीं भडके। उलटे और विनम्र हो गए। हाथ जोड कर बोले, 'अब आप जो समझ लें।' यह कह कर मुसकुरा पडे। बहुत बाद में जब कौन बनेगा करोडपति आया तब भी सब के साथ उन की विनम्रता की वही भंगिमा, विनय की उसी भाषा से हम बार-बार परिचित होते रहे। तो क्या अमिताभ बच्चन तमाम अंतरविरोधों के बावजू्द इस लिए सफल हैं कि वह विनय की भाषा जानते हैं और कि अतिशय विनम्र हैं? मित्रो, आप की क्या राय है?

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